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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४८५

५ अप्रैल, १८८४ | परिच्छेद ७९ | ४८५
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बतलाओ कि हाथ कैसे अच्छा हो। अब बस यही सोचता हूँ कि हाथ कैसे अच्छा हो।*

त्रैलोक्य के गाने की बात चली। त्रैलोक्य केशव के समाज में भगवत्-गुणानुवाद-कीर्तन करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – अहा! त्रैलोक्य का क्या ही सुन्दर गाना है!

राम – क्या सब बिलकुल ठीक होता है?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, बिलकुल ठीक। अगर वैसा न होता तो मन को इतना क्यों खींचता?

राम – आप ही के सब भाव लेकर गीतों की रचना की गयी है। केशव सेन उपासना के समय उन्हीं सब भावों का वर्णन करते थे और त्रैलोक्य बाबू उसी तरह के पद जोड़ते थे। देखिये, एक गाना है –

(भावार्थ) 'प्रेम के बाजार में आनन्द का मेला लगा हुआ है। भक्तों के संग हरि अपनी मौज में कितने ही खेल खेल रहे हैं।'

"आप भक्तों के साथ आनन्द करते हैं, यह देखकर इस गाने की रचना हुई है।"

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – तुम अब जलाओ मत। मुझे भला क्यों लपेटते हो? (सब हँसते हैं।)

गिरीन्द्र – ब्राह्मगण कहते हैं, परमहंसदेव में Faculty of organisation नहीं है।

श्रीरामकृष्ण – इसका क्या मतलब?

मास्टर – आप संगठन करना नहीं जानते, आप में बुद्धि कम है, यह कहते हैं।

श्रीरामकृष्ण – (राम से) – अब यह बतलाओ, मेरा हाथ क्यों टूटा? तुम इसी विषय पर एक लेक्चर दो। (सब हँसते हैं।)

"ब्राह्मसमाजी निराकार-निराकार कहा करते हैं। खैर, कहें। उन्हें अन्दर से पुकारने ही से हुआ। अगर अन्तर की बात हो तो वे तो अन्तर्यामी हैं, वे अवश्य समझा देंगे, उनका स्वरूप क्या है।

"परन्तु यह अच्छा नहीं – यह कहना कि हम लोगों ने जो कुछ समझा है, वही ठीक है, और दूसरे जो कुछ करते हैं, सब गलत। हम लोग निराकार कह रहे हैं, अतएव वे साकार नहीं, निराकार हैं; हम लोग साकार कह रहे हैं, अतएव वे साकार हैं, निराकार नहीं! मनुष्य क्या कभी उनकी इति कर सकता है?

"इसी तरह वैष्णवों और शाक्तों में भी विरोध है। वैष्णव कहता है 'हमारे केशव ही एकमात्र उद्धारकर्ता हैं' और शाक्त कहता है, 'बस हमारी भगवती एकमात्र उद्धार करनेवाली है।'


* उनके टूटे हाथ से मतलब है।

४८६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अप्रैल, १८८४

“मैं वैष्णवचरण को सेजो बाबू* के पास ले गया था। वैष्णवचरण वैरागी है, बड़ा पण्डित है, परन्तु कट्टर वैष्णव है। इधर सेजो बाबू भगवती के भक्त हैं। अच्छी बातें हो रही थीं, इसी समय वैष्णवचरण ने कह डाला, ‘मुक्ति देनेवाले तो एक केशव ही हैं।’ केशव का नाम लेते ही सेजो बाबू का मुँह लाल हो गया और वे बोले, ‘तू साला!’ (सब हँस पड़े।) मथुर बाबू शाक्त जो थे! उनके लिए यह कहना स्वाभाविक ही था। मैंने इधर वैष्णवचरण को खींच लिया।

“जितनें आदमियों को देखता हूँ, धर्म-धर्म करके एक दूसरे से झगड़ा किया करते हैं। हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मसमाजी, शाक्त, वैष्णव, शैव, सब एक दूसरे से लड़ाई-झगड़ा करते हैं यह बुद्धिमानी नहीं है। जिन्हें कृष्ण कहते हो, वे ही शिव, वे ही आद्याशक्ति हैं, वे ही ईसा हैं और वे ही अल्लाह हैं। एक राम उनके हजार नाम।

“वस्तु एक ही है, केवल उसके नाम अलग अलग हैं। सब लोग एक ही वस्तु की चाह कर रहे हैं। अन्तर इतना ही है कि देश अलग है, पात्र अलग और नाम अलग। एक तालाब में बहुत से घाट हैं। हिन्दू एक घाट से पानी ले रहे हैं, घड़े में भरकर कहते हैं, ‘जल’। मुसलमान एक दूसरे घाट से पानी भर रहे हैं, चमड़े के बैग में – कहते हैं, ‘पानी’। क्रिस्टान तीसरे घाट से पानी ले रहे हैं – वे कहते हैं ‘वाटर’ (Water)। (सब हँसते हैं।)

“अगर कोई कहे, नहीं यह चीज जल नहीं है, यह पानी है या वाटर नहीं जल है, तो यह हँसी की ही बात होगी। इसीलिए दल, मतान्तर और झगड़े होते हैं। धर्म के नाम पर लठ्ठम लट्ठा, मार-काट? यह सब अच्छा नहीं है। सब उन्हींके पथ पर जा रहे हैं। आन्तरिकता होने पर, व्याकुलता आने पर – उन्हें मनुष्य प्राप्त करेगा ही। (मणि से) तुम यह सुनते जाओ – वेद, पुराण, तन्त्र-शास्त्र उन्हींको चाहते हैं; वे किसी दूसरे को नहीं चाहते। सच्चिदानन्द बस एक ही हैं। जिन्हें वेदों में ‘सच्चिदानन्द ब्रह्म’ कहा है, तन्त्र में उन्हींको ‘सच्चिदानन्द शिव’ कहा है, उन्हींको उधर पुराणों में ‘सच्चिदानन्द कृष्ण’ कहा है।”

श्रीरामकृष्ण ने सुना, राम घर में कभी कभी स्वयं भोजन पकाते हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मणि से) – क्या तुम भी अपने हाथ से भोजन पकाते हो?

मणि – जी नहीं।

श्रीरामकृष्ण – कोशिश करके देखो न जरा, थोड़ा सा गो-घृत छोड़ कर भोजन किया करो। शरीर और मन शुद्ध जान पड़ने लगेंगे।


* रानी रासमणि के दामाद श्रीयुत मथुरानाथ विश्वास।

५ अप्रैल, १८८४ परिच्छेद ७९ ४८७

राम की घर-गृहस्थी की बहुत सी बातें हो रही हैं। राम के पिता परम वैष्णव हैं। घर में श्रीधर की सेवा होती है। राम के पिता ने अपना दूसरा विवाह किया था उस समय राम की उम्र बहुत कम थी। पिता और विमाता राम के घर में ही थे, परन्तु विमाता के साथ रहकर राम सुखी नहीं रह सके। इस समय विमाता की उम्र चालीस साल की है। विमाता के कारण राम और उनके पिता में कभीकभी अनबन हो जाती थी। आज वे ही सब बातें हो रही हैं।

राम – बाबूजी की बुद्धि मारी गयी है।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – सुना? बाबूजी की बुद्धि मारी गयी है और आपकी बहुत अच्छी है।

राम – उनके (विमाता के) मकान में आने ही से अशान्ति होती है। एक न एक झंझट पैदा होती है। हमारा परिवार नष्ट होने पर आ गया। इसीलिए मैं कहता हूँ, वे अपने मायके में क्यों नहीं जाकर रहतीं?

गिरीन्द्र – (राम से) – अपनी स्त्री को उसी तरह मायके में क्यों नहीं रखते? (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – यह क्या कुछ हण्डी और घड़ा है? हण्डी एक जगह रही और उसका ढक्कन दूसरी जगह! शिव एक ओर तथा शक्ति दूसरी ओर!

राम – महाराज, हम लोग सुख से हैं, वे आयी नहीं कि तोड़फोड़ मचाया। ऐसी दशा में –

श्रीरामकृष्ण – हाँ, अलग एक मकान कर दो, यह एक बात हो सकती है। महीने-महीने सब खर्च देते जाना। पिता कितने बड़े गुरु हैं! राखाल मुझसे पूछता था, क्या मैं बाबूजी की थाली में खा लूँ? मैंने कहा, 'अरे, यह क्या? तुझे हो क्या गया है जो तू अपने बाप की थाली में न खायेगा?'

"परन्तु एक बात है। जो लोग सन्मार्ग में हैं, वे अपना जूठा किसी को खाने के लिए नहीं देते। यहाँ तक कि कुत्ते को भी जूठन नहीं दी जाती।"

गिरीन्द्र – महाराज, माँ-बाप ने अगर कोई घोर अपराध किया हो, कोई घोर पाप किया हो तो?

श्रीरामकृष्ण – तो वह भी सही। माता यदि व्याभिचारिणी हो तो भी उसका त्याग न करना चाहिए। अमुक बाबुओं की गुरुपत्नी का चरित्र नष्ट हो गया। तब उन्होंने कहा, उनका लड़का गुरु बनाया जाय। मैंने कहा, 'यह तुम क्या कहते हो? तुम सूरन को छोड़कर सूरन की आँख लोगे? नष्ट हो गयी तो क्या हुआ? तुम उसे ही अपना इष्ट समझो।' एक गाने में है – 'मेरे गुरु यद्यपि कलवार की दूकान पर जाया करते हैं, तथापि मेरे गुरु नित्यानन्द राय हैं।'

४८८श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अप्रैल, १८८४

चैतन्यदेव और माँ। मनुष्य के ऋण

“माँ-बाप क्या कुछ साधारण मनुष्य हैं? बिना उनके प्रसन्न हुए धर्म-कर्म कुछ भी नहीं होता। चैतन्यदेव प्रेम से पागल थे, परन्तु फिर भी संन्यास से पहले कुछ दिन लगातार उन्होंने अपने माता को समझाया था। कहा था - 'माँ! मैं कभी कभी आकर तुम्हें देख-दिखा जाया करूँगा।' (मास्टर से तिरस्कार करते हुए) और तुम्हारे लिए कहता हूँ, माँ-बाप ने तुम्हें आदमी बना दिया, अब कई लड़के-बच्चे भी हो गये हैं, इस पर बीबी को साथ लेकर निकल आना! माता-पिता को धोखा देकर बीबी-बच्चों को लेकर, वैष्णव-वैष्णवी बनकर निकलता है! तुम्हारे बाप को कोई कमी नहीं है, नहीं तो मैं कहता, धिक्कार है तुमको! (सब के सब स्तब्ध हैं।)

“कुछ ऋण हैं। देवऋण, ऋषिऋण; उधर मातृऋण, पितृऋण, स्त्री-ऋण। माता-पिता के ऋण का शोध किये बिना कोई काम नहीं होता। फिर पत्नी का भी ऋण है। हरीश पत्नी का त्याग करके यहाँ आकर रहता है। यदि उसकी स्त्री के भोजन की सुविधा न होती तो मैं कहता, साला बेईमान है।

“ज्ञान के पश्चात् उसी पत्नी को तुम साक्षात् भगवती देखोगे! सप्तशती में है, 'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।' वे ही माँ हुई हैं।

“जितनी स्त्रियाँ देखते हो, सब वे ही हैं; इसीलिए मैं वृन्दा (नौकरानी) को कुछ कह नहीं सकता। कोई-कोई लोग श्लोक झाड़ते हैं - लम्बी-लम्बी बातें बघारते हैं, परन्तु उनका व्यवहार कुछ और ही होता है। इस हठयोगी के लिए किसी तरह अफीम और दूध इकट्ठा हो, रामप्रसन्न बस इसी चिन्ता में मारामारा घूमता है। और वह यह भी कहता है कि मनु में साधु-सेवा का उल्लेख है। इधर बूढ़ी माँ खाने को नहीं पाती, सौदा खरीदने के लिए हाट-बाजार खुद जाया करती है। क्या कहूँ ऐसा क्रोध आता है!

“परन्तु एक बात और है। अगर प्रेमोन्मत्त अवस्था हो तो फिर कौन है बाप, कौन है माँ और कौन है स्त्री? ईश्वर पर इतना प्यार हो कि पागल हो जाय। फिर उसके लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं रह जाता। सब ऋणों से वह मुक्त हो जाता है। प्रेमोन्माद कैसा है, जानते हो? उस अवस्था के आने पर संसार भूल जाता है। अपनी देह जो इतनी प्यारी चीज है, वह भी भूल जाता है। यह अवस्था चैतन्यदेव की हुई थी। समुद्र में कूद पड़े, समुद्र का बोध ही नहीं। मिट्टी में बार-बार पछाड़ खा-खाकर गिरते हैं, न भूख है, न नींद; शरीर का बोध भी नहीं!”

श्रीरामकृष्ण 'हा चैतन्य' कह उठे।

(भक्तों के प्रति) “चैतन्य के माने अखण्ड चैतन्य। वैष्णवचरण कहता था, गौरांग अखण्ड चैतन्य की ही एक छटा हैं।