श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५१९
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हूँ, यन्त्री तुम हो, तब जीव संसार-यन्त्रणाओं से मुक्ति पाता है। तभी उसकी मुक्ति होती है, फिर इस कर्मक्षेत्र में उसे नहीं आना पड़ता।”
एक भक्त – जीव का अहंकार कैसे दूर हो?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर के दर्शन के बिना अहंकार दूर नहीं होता। यदि किसी का अहंकार मिट गया हो, तो उसे अवश्य ही ईश्वर के दर्शन हुए होंगे।
भक्त – महाराज, किस तरह समझ में आये कि ईश्वर के दर्शन हो चुके हैं?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर-दर्शन के कुछ लक्षण हैं। श्रीमद्भागवत में कहा है, जिस आदमी को ईश्वर के दर्शन हुए हैं उसके चार लक्षण हैं – बालवत्, पिशाचवत्, जड़वत् तथा उन्मत्तवत्।
“जिसे ईश्वर के दर्शन हुए होंगे, उसका स्वभाव बालक की तरह का हो जायेगा। वह त्रिगुणातीत हो जाता है। किसी गुण को गाँठ नहीं बाँधता, शुचि और अशुचि भी उसके पास बराबर हैं। इसीलिए वह पिशाचवत् है, और पागल की तरह कभी हँसता है, कभी रोता है। देखते ही देखते बाबुओं की तरह सजावट कर लेता है और फिर सब कपड़े बगल में दबाकर बिलकुल नंगा होकर घूमता है, इस तरह वह उन्मत्तवत् हो जाता है। और कभी यही है कि जड़ की तरह कहीं चुपचाप बैठा हुआ है, इसलिए जड़वत्।”
भक्त – ईश्वर-दर्शन के बाद क्या अहंकार बिलकुल चला जाता है?
श्रीरामकृष्ण – कभी कभी वे अहंकार बिलकुल पोंछ डालते हैं, जैसे समाधि की अवस्था में। कभी अहंकार कुछ रख भी देते हैं; परन्तु उस अहंकार में दोष नहीं। जैसे बालक का अहंकार। पाँच वर्ष का बच्चा मैं-मैं करता है, परन्तु किसी का अनिष्ट करना वह नहीं जानता।
“पारस पत्थर के छू जाने पर लोहा भी सोना हो जाता है। लोहे की तलवार सोने की तलवार हो जाती है। परन्तु तलवार का आकार मात्र रह जाता है, वह किसी का अनिष्ट नहीं कर सकती।”
(६)
जीवन का उद्देश्य – कर्म अथवा ईश्वरलाभ?
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – तुम विलायत गये थे, वहाँ क्या क्या देखा?
प्रताप – आप जिसे कांचन कहते हैं, विलायत के आदमी उसी की पूजा करते हैं; परन्तु कोई कोई अच्छे, अनासक्त मनुष्य भी हैं। यों तो आदि से अन्त तक सब रजोगुण की ही महिमा है। अमेरिका में भी मैंने यही देखा।
श्रीरामकृष्ण – (प्रताप से) – विषयकार्यों में केवल विलायतवालों को ही आसक्ति नहीं है, सभी जगह यही हाल है। परन्तु, बात यह है कि कर्मकाण्ड को आदिकाण्ड कहा
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५२० श्री रामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८४
है। सतोगुण (भक्ति, विवेक, वैराग्य, दया आदि सब) के बिना ईश्वर नहीं मिल सकते। रजोगुण में कर्म का आडम्बर होता है, इसीलिए रजोगुण से तमोगुण आ जाता है। ज्यादा कर्म में फँसने पर ही ईश्वर को मनुष्य भूल जाता है। तब कामिनी-कांचन में भी आसक्ति बढ़ जाती है।
"परन्तु कर्मों का बिलकुल त्याग कोई नहीं कर सकता। तुम्हारी प्रकृति खुद तुमसे कर्म करा लेगी, तुम अपनी मर्जी से करो या न करो। इसीलिए कहा है, अनासक्त होकर कर्म करो, अर्थात् कर्म-फल की आकांक्षा न करो; जैसे, पूजा, जप, तप, यह सब कर रहे हो, परन्तु सम्मान या पुण्य के लिए नहीं।
"इस तरह अनासक्त होकर कर्म करने का ही नाम कर्मयोग है। यह बड़ा कठिन है। एक तो कलिकाल है, सहज ही आसक्ति आ जाती है। सोच रहा हूँ, अनासक्त होकर काम कर रहा हूँ, परन्तु न जाने किधर से आसक्ति आ जाती है, समझ में नहीं आता। कभी पूजा और महोत्सव किया या बहुत से कंगालों को खिलाया, सोचा, अनासक्त होकर मैं यह सब कर रहा हूँ, परन्तु फिर भी न जाने किधर से लोक-सम्मान की इच्छा आ जाती है, पता नहीं। बिलकुल अनासक्त होना उसके लिए सम्भव है जिसे ईश्वर के दर्शन हो चुके हैं।"
एक भक्त – जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त नहीं किया, उनके लिए क्या उपाय है? क्या वे विषय-कर्म छोड़ दें?
श्रीरामकृष्ण – कलिकाल के लिए भक्तियोग है, नारदीय भक्ति। ईश्वर का नाम-गुणगान और व्याकुल होकर प्रार्थना करना – 'हे ईश्वर, मुझे ज्ञान दो, भक्ति दो, मुझे दर्शन दो।' कर्मयोग बड़ा कठिन है। इसीलिए प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे ईश्वर, मेरे कर्म घटा दो और जितने कर्म तुमने रखे हैं, उन्हें तुम्हारी कृपा से अनासक्त होकर कर सकूँ और अधिक कर्म लपेटने की मेरी इच्छा न हो!'
"कर्म कोई छोड़ नहीं सकता। 'मैं सोच रहा हूँ', 'मैं ध्यान कर रहा हूँ' – ये भी कर्म हैं। भक्ति पा लेने पर विषयकर्म आप ही आप घट जाते हैं। तब वे अच्छे नहीं लगते। मिश्री का शरबत मिल जाय, तो फिर सीरा कौन पीता है?"
एक भक्त – विलायत के आदमी 'कर्म करो – कर्म करो' कहा करते हैं, तो क्या कर्म जीवन का उद्देश्य नहीं है?
श्रीरामकृष्ण – जीवन का उद्देश्य है ईश्वर-लाभ। कर्म तो आदिकाण्ड है, वह जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता। निष्काम कर्म एक उपाय हो सकता है, परन्तु वह भी उद्देश्य नहीं हैं।
"शम्भू कहता था, अब ऐसा आशीर्वाद दीजिये कि जो रुपये हैं, उनका सद्व्यय कर सकूँ। अस्पताल, दवाखाना, रास्ताघाट, कुआँ इनके तैयार करने में लग जाय। मैंने
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar