श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
३ जुलाई, १८८४ | परिच्छेद ८६ | ५६५
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शिवः केवलः – केवलः शिवः। पुराणों में हैं – ॐ सच्चिदानन्दः कृष्णः। उसी एक सच्चिदानन्द की बात वेदों, पुराणों और तन्त्रों में है। और वैष्णव-शास्त्र में भी है कि कृष्ण स्वयं काली हुए थे।”
(२)
श्रीरामकृष्ण की परमहंस अवस्था - बालकवत् और उन्मादवत्
श्रीरामकृष्ण जरा बरामदे की ओर जाकर फिर कमरे की ओर चले आये। बाहर जाते समय विश्वम्भर की लड़की ने उन्हें नमस्कार किया था, उसकी उम्र छः-सात साल की होगी। कमरे में उनके चले जाने पर लड़की उनसे बातचीत कर रही है। उसके साथ और भी दो-तीन उसी की उम्र के लड़के-लड़कियाँ हैं।
विश्वम्भर की लड़की – (श्रीरामकृष्ण से) – मैंने तुम्हें नमस्कार किया, तुमने देखा भी नहीं!
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कहाँ, मैंने नहीं देखा।
कन्या – तो खड़े हो जाओ, फिर नमस्कार करूँ। खड़े हो जाओ, इधर से भी करूँ।
श्रीरामकृष्ण हंसते हुए बैठ गये और जमीन तक सिर झुकाकर कुमारी को प्रतिनमस्कार किया। श्रीरामकृष्ण ने लड़की को गाने के लिए कहा। लड़की ने कहा – भाई-कसम, मैं गाना नहीं जानती।
उससे अनुरोध करने पर उसने कहा, भाई-कसम कहने पर फिर कभी कहा जाता है? श्रीरामकृष्ण उनके साथ आनन्द कर रहे हैं और गाना सुना रहे हैं, बच्चों के गीत।
बच्चे और भक्त गाना सुनकर हँस रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – परमहंस का स्वभाव बिलकुल पाँच साल के बच्चे का-सा होता है। वह सब चेतन देखता है।
“मैं जब उस देश में (कामारपुकुर में) रहता था तब रामलाल का भाई (शिवराम) ४-५ साल का था; तालाब के किनारे पतिंगे पकड़ने जा रहा था। एक पत्ता हिल रहा था। पत्ते की खड़खड़ाहट से शिकार कहीं भाग न जाय, इस विचार से वह पत्ते से कहने लगा – ‘अरे चुप! मैं पतिंगा पकडूूँगा।’ पानी बरस रहा था और आँधी भी चल रही थी। रह रहकर बिजली चमकती थी, फिर भी द्वार खोलकर वह बाहर जाना चाहता था। डाटने पर फिर बाहर न गया, झाँक-झाँककर देखने लगा, बिजली चमक रही थी, तो कहा – चाचा, फिर चकमकी घिस रहा है!
“परमहंस बालक की तरह होते हैं – उनके लिए न कोई अपना है, न कोई पराया। सांसारिक सम्बन्ध की कोई परवाह नहीं है। रामलाल के भाई ने एक दिन कहा, तुम चाचा
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हो या मौसा?
"परमहंसों का चाल-चलन भी बालकों का-सा होता है; कोई हिसाब नहीं रहता कि कहाँ जायें। सब ब्रह्ममय देखते हैं। कहाँ जा रहे हैं, कहाँ चल रहे हैं, कुछ हिसाब नहीं। रामलाल का भाई हृदय के यहाँ दुर्गापूजा देखने गया था। हृदय के यहाँ से आप ही आप किसी तरफ चला गया। किसी को इसका पता भी न चला। चार वर्ष के लड़के को देखकर लोग पूछने लगे, तू कहाँ से आ रहा है? वह कुछ न कह सकता था। उसने सिर्फ कहा – चाला* अर्थात् जिस आठ चाले में पूजा हो रही है। जब लोगों ने पूछा, तू किसके यहाँ से आ रहा है? तब उसने कहा – दादा।
"परमहंसों की पागलों की-सी अवस्था भी होती है। दक्षिणेश्वर की मन्दिर-प्रतिष्ठा के कुछ दिन बाद एक पागल आया था। वह पूर्ण ज्ञानी था – फटे जूते पहने था, एक हाथ में बांस की एक कमची लिये था और दूसरे में गमले में लगा हुआ एक आम का पौधा। गंगा में डुबकी मारकर उठा, न सन्ध्या, न पूजन; कपड़े में कुछ लिये हुए था, वही खाने लगा। फिर कालीमन्दिर में जाकर स्तव करने लगा। मन्दिर काँप उठा था! हलधारी उस समय मन्दिर में था। अतिथिशाला में लोगों ने उसे खाने को नहीं दिया था, परन्तु उसने जरा भी परवाह नहीं की। जूठी पत्तलें खींच खींचकर उनमें जो कुछ लगा था, वही खाने लगा; जहाँ कुत्ते खा रहे थे वहीं कभी-कभी कुत्तों को हटाकर खाता था। कुत्तों ने उसका कुछ नहीं किया। हलधारी उसके पीछे-पीछे गया था। पूछा – 'तुम कौन हो? क्या तुम पूर्ण ज्ञानी हो?' तब उसने कहा था – 'मैं पूर्ण ज्ञानी हूँ! चुप!!'
"मैंने हलदारी से जब ये सब बातें सुनीं, मेरा कलेजा दहलने लगा, मैं हृदय से लिपट गया। माँ से कहा – 'माँ, तो क्या वही अवस्था मेरी भी होगी?' हम लोग उसे देखने गये। हम लोगों से खूब ज्ञान की बातें करता था, दूसरे आदमी आते तो वही पागलपन शुरू कर देता था। जब वह गया, तब हलधारी बहुत दूर तक उसके साथ गया था। फाटक पार करते समय उसने हलधारी से कहा था, 'तुझे मैं क्या कहूँ? जब तलैया और गंगाजी के पानी में भेद-बुद्धि न रह जाय, तब समझना कि पूर्ण ज्ञान हुआ।' इतना कहकर उसने अपना सीधा रास्ता पकड़ा।"
पाण्डित्य की अपेक्षा तपस्या का प्रयोजन। साधना
श्रीरामकृष्ण मास्टर से बातचीत कर रहे हैं। पास ही भक्तगण भी बैठे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – शशधर को तुम क्या समझते हो?
मास्टर – जी, बहुत अच्छा।
* बड़े बड़े छप्परों से छाये हुए बंगले को बंगाल में 'आठ चाला' अर्थात् आठ चालियों या छप्परोंवाला मकान कहते हैं।