श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४७३
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श्रीरामकृष्ण – साधु को जब रुपये देने पड़ते हैं तब फिर वह नहीं भाता।
"राजेन्द्र मित्र की तनख्वाह आठ सौ रुपया महीना है – वह प्रयाग से कुम्भ मेला देखकर आया था। मैंने पूछा – 'क्यों जी, मेले में कैसे सब साधु देखे?' राजेन्द्र ने कहा – 'कहाँ? – वैसा साधु एक भी न देखा। एक को देखा था, परन्तु वह भी रुपया लेता था।'
"मैं सोचता हूँ, साधुओं को अगर कोई रुपया-पैसा न देगा तो वे खायेंगे क्या? यहाँ कुछ देना नहीं पड़ता, इसलिए सब आते हैं। मैं सोचता हूँ, इन लोगों को अपना पैसा बहुत प्यारा है। तो फिर रहें न उसी को लेकर।"
श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं। एक भक्त छोटी खाट पर बैठे हुए उनके पैर दबा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भक्त से धीरे धीरे कह रहे हैं, "जो निराकार हैं वही साकार भी हैं। साकाररूप भी मानना चाहिए। काली-रूप की चिन्ता करते हुए साधक काली-रूप के ही दर्शन पाता है। फिर वह देखता है कि वह रूप अखण्ड में लीन हो गया। जो अखण्ड सच्चिदानन्द हैं वही काली भी हैं।"
(३)
श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में महिमाचरण आदि के साथ हठयोगी की बातें कर रहे हैं। रामप्रसन्न भक्त कृष्णकिशोर के पुत्र हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण उन पर स्नेह करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – रामप्रसन्न उसी तरह अल्हड़पने में घूम रहा है। उस दिन यहाँ आकर बैठा, कुछ बोला भी नहीं; प्राणायाम साधकर श्वास चढ़ाये बैठा रहा। खाने को दिया, परन्तु खाया भी नहीं। एक और दूसरे दिन भी बुलाकर बैठाया। वह पैर पर पैर चढ़ाकर बैठा – कप्तान की ओर पैर करके। उसकी माँ का दुःख देखकर रोता हूँ।
(महिमाचरण से) "उस हठयोगी की बात तुमसे कहने के लिए उसने कहा था। प्रति दिन उसका साढ़े छः आने का खर्च है। इधर खुद कुछ न कहेगा!"
महिमा – कहने से सुनता कौन है! (श्रीरामकृष्ण और दूसरे हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर अपने आसन पर बैठे। पानिहाटी के श्रीयुत मणि सेन दो-एक मित्रों के साथ आये हैं, श्रीरामकृष्ण के हाथ टूटने के सम्बन्ध में पूछताछ कर रहे हैं। उनके साथियों में एक डाक्टर भी है।
श्रीरामकृष्ण आजकल डाक्टर प्रतापचन्द्र मजूमदार का इलाज कर रहे हैं। मणिबाबू के साथवाले डाक्टर ने उनकी चिकित्सा का अनुमोदन नहीं किया। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – "वह (प्रताप) कुछ बेवकूफ तो है नहीं, तुम क्यों ऐसी बात कह रहे हो?"
इसी समय लाटू ने जोर से पुकारकर कहा, "शीशी गिरकर फूट गयी है।"
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४७४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २३ मार्च, १८८४
मणि सेन हठयोगी की बात सुनकर कह रहे हैं - “हठयोगी किसे कहते हैं? हॉट (hot) का तो अर्थ है गरम!”
मणि सेन के डॉक्टर के सम्बन्ध में श्रीरामकृष्ण ने पीछे से कहा - “उसे जानता हूँ। यदु मल्लिक से मैंने कहा भी था, यह तुम्हारा डॉक्टर बिलकुल खोखला है - अमुक डॉक्टर से भी इसकी बुद्धि मोटी है!”
अभी सन्ध्या नहीं हुई है। श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठकर मास्टर से बातचीत कर रहे हैं। वे खाट के पास पाँवपोश पर पश्चिम की ओर मुँह करके बैठे हैं; इधर महिमाचरण पश्चिमवाले गोल बरामदे में बैठकर मणि सेन के डॉक्टर के साथ उच्च स्वर में शास्त्रालाप कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अपने आसन से सुन रहे हैं और कुछ हँसकर मास्टर से कह रहे हैं - “देखो, झाड़ रहा है; रजोगुण है। रजोगुण होने से कुछ पाण्डित्य दिखलाने और लेक्चर देने की इच्छा होती है। सतोगुण से मनुष्य अन्तर्मुख हो जाता है, खुद के गुण छिपा रखने की इच्छा होती है। पर आदमी खासा है - ईश्वर के नाम पर कितना उत्साह है!”
अधर आये, प्रणाम किया और मास्टर के पास बैठ गये। श्रीयुत अधर सेन डिप्टी मैजिस्ट्रेट हैं। उम्र तीस साल की होगी। दिन भर ऑफिस का काम करके, कितने ही दिनों से शाम के बाद श्रीरामकृष्ण के पास आ रहे हैं। इनका मकान कलकत्ते के शोभा बाजार बनियाटोले में है। कई दिनों से ये आये नहीं थे।
श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, इतने दिन क्यों नहीं आये?
अधर – कई कामों में फँसा था। स्कूलों की सभाओं और कुछ दूसरी मीटिंग में भी जाना पड़ा था।
श्रीरामकृष्ण – मीटिंग, स्कूल लेकर और सब बिलकुल भूल गये थे।
अधर – (विनयपूर्वक) – जी, नहीं, काम के कारण बाकी सब बातें दबी सी पड़ी थीं। आपका हाथ कैसा है?
श्रीरामकृष्ण – यह देखो, अभी तक अच्छा नहीं हुआ। प्रताप की दवा खा रहा था।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण एकाएक अधर से कहने लगे – “देखो, यह सब अनित्य है। मीटिंग, स्कूल, ऑफिस, यह सब अनित्य है। ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु। बस मन लगाकर उन्हीं की आराधना करनी चाहिए।”
अधर चुप है।
श्रीरामकृष्ण – यह सब अनित्य है। शरीर अभी अभी है, अभी अभी नहीं। जल्दी उन्हें पुकार लेना चाहिए।
“तुम लोगों को सब त्याग करने की आवश्यकता नहीं है। कछुए की तरह संसार में रहो। कछुआ स्वयं तो पानी में भोजन की तलाश करता है, परन्तु अपने अण्डे किनारे
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पर रखता है – उसका सब मन वहीं रहता है जहाँ उसके अण्डे हैं।
"कप्तान का स्वभाव अब अच्छा हो गया है। जब पूजा करने बैठता है तब बिलकुल ऋषि की तरह जान पड़ता है। इधर कपूर की आरती और बहुत ही सुन्दर स्तव पाठ करता है। पूजा करके जब उठता है, तब भाव के कारण उसकी आँखें सूज जाती हैं, मानो चींटियों ने काटा हो। और सारे समय गीता, भागवत यही सब पढ़ता रहता है। मैंने दो-चार अंग्रेजी शब्द कहे, इससे बिगड़ बैठा। कहा – अंग्रेजी पढ़नेवाले भ्रष्टाचारी होते हैं।"
कुछ देर बाद अधर ने बड़े विनीत भाव से कहा –
"हमारे यहाँ बहुत दिनों से आप नहीं पधारे हैं। बैठकखाने में मानो संसारीपन की दुर्गन्ध आती है और बाकी तो सब अँधेरा ही अँधेरा है।"
भक्त की यह बात सुनकर श्रीरामकृष्ण के स्नेह का सागर उमड़ पड़ा। भावावेश में वे उठकर खड़े हो गये। अधर और मास्टर के मस्तक और हृदय पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। स्नेहपूर्वक कहा – "मैं तुम लोगों को नारायण देख रहा हूँ। तुम्हीं लोग मेरे अपने आदमी हो।"
अब महिमाचरण भी कमरे में आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण – (महिमा से) – धैर्यरीता की बात उस समय जो तुम कह रहे थे, वह ठीक है। वीर्यधारण किये बिना इन सब बातों की धारणा नहीं होती।
"किसी ने चैतन्यदेव से कहा, 'आप इन भक्तों को इतना उपदेश दे रहे हैं, तो भी वे अपनी उतनी उन्नति क्यों नहीं कर पाते?'
"चैतन्यदेव ने कहा – 'ये लोग योषित्-संग करके सब अपव्यय कर देते हैं, इसीलिए धारणा नहीं कर सकते। फूटे घड़े में पानी रखने से क्रमशः सब निकल जाता है।'"
महिमा आदि भक्तगण चुपचाप बैठे हैं। कुछ देर बाद महिमाचरण ने कहा – ईश्वर के पास हम लोगों के लिए प्रार्थना कर दीजिये, जिससे हम लोगों को वह शक्ति प्राप्त हो।
श्रीरामकृष्ण – अब भी सावधान हो जाओ! सच है कि आषाढ़ का पानी है, रोकना मुश्किल है, परन्तु पानी निकल भी तो बहुत चुका है, अब बाँध बाँधने से रुक जायगा।
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