श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६२१
१९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६२१
कहने में दोष नहीं है। तान्त्रिक को सब कुछ गुप्त रखना पड़ता है। इसीलिए तान्त्रिक को अच्छी तरह कोई समझ नहीं सकता।
(गोस्वामी से) “आप लोग अच्छे हैं। कितना जप करते हैं? और हरिनाम की संख्या क्या है?”
गोस्वामी - (विनय भाव से) - जी, मैं क्या करता हूँ। मैं अत्यन्त अधम - नीच हूँ।
श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - दीनता, यह अच्छा तो है। एक भाव और है - 'मैं उनका नाम ले रहा हूँ, मुझे फिर पाप कैसा!' जो लोग, दिन रात 'मैं पापी हूँ, मैं अधम हूँ' ऐसा किया करते हैं, वे वैसे ही हो जाते हैं। कितना अविश्वास है! उनका इतना नाम ले करके भी पाप-पाप कहता है!
गोस्वामी यह बात आश्चर्यचकित हो सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण - मैंने भी वृन्दावन में भेष (वैष्णवों का) धारण किया था। पन्द्रह दिन तक रखा था। (भक्तों से) सब भावों की उपासना कुछ-कुछ दिनों तक करता था। तब शान्ति होती थी।
(सहास्य) “मैंने सब तरह किया है - सब शास्त्रों को मानता हूँ। शाक्तों को भी मानता हूँ और वैष्णवों को भी। उधर वेदान्तवादियों को भी मानता हूँ। यहाँ इसीलिए सब मतों के आदमी आया करते हैं। और सब यही सोचते हैं कि ये हमारे मत के आदमी हैं। आजकल के ब्राह्म-समाजवालों को भी मानता हूँ।
“एक आदमी के पास एक रंग का गमला था। उस गमले में एक बड़े आश्चर्य का गुण यह था कि जिस किसी रंग में वह कपड़े रँगना चाहता था, उसी रंग में कपड़े रंग जाते थे।
“परन्तु किसी होशियार आदमी ने कहा, तुमने इसमें जो रंग घोला है वही रंग मुझे दो। (श्रीरामकृष्ण और सब हँसते हैं।)
“एक ही ढर्रे का मैं क्यों हो जाऊँ? 'अमुक मत के आदमी फिर न आयेंगे' मुझे इसका भय नहीं है। कोई आये चाहे न आये, मुझे इसकी जरा भी परवाह नहीं है। लोग मेरी मुट्ठी में रहेंगे, ऐसी कोई बात मेरे मन में है ही नहीं। अधर सेन ने बड़ी नौकरी के लिए माँ से कहने के लिए कहा था - उसको वह काम नहीं मिला। वह अगर इसके लिए कुछ सोचे तो मुझे इसकी जरा भी परवाह नहीं है।
“केशव सेन के घर जाने पर एक और भाव हुआ। वे लोग निराकार-निराकार किया करते हैं। इस पर, जब भावावेश हुआ तो मैंने कहा - माँ, यहाँ न आना, ये लोग तेरे रूप को नहीं मानते।”
साम्प्रदायिकता के विरोध की बात सुनकर गोस्वामीजी चुपचाप बैठे हुए हैं।
६२२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ सितम्बर, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – विजय इस समय बहुत अच्छा हो गया है।
“हरिनाम करते हुए जमीन पर गिर जाता है।
“प्रातः चार बजे तक कीर्तन और ध्यान, यह सब लेकर रहता है। इस समय गेरुआ पहने हुए है। देव-विग्रह देखता है तो एकदम साष्टांग प्रणाम करता है।
“जहाँ गदाधर* की पाठशाला थी वहाँ विजय को ले गया था और कहा, यहीं वे ध्यान करते थे। बस कहने के साथ ही उसने साष्टांग प्रणाम किया।
“चैतन्यदेव के चित्र के सामने फिर साष्टांग प्रणाम किया।”
गोस्वामी – राधाकृष्ण की मूर्ति के सामने ?
श्रीरामकृष्ण – साष्टांग प्रणाम! और बड़ा आचारी है।
गोस्वामी – अब समाज में लिया जा सकता है।
श्रीरामकृष्ण – लोग क्या कहेंगे, इसकी उसे कोई चिन्ता नहीं है।
गोस्वामी – ऐसे आदमी को प्राप्त कर समाज भी कृतार्थ हो सकता है।
श्रीरामकृष्ण – मुझे बहुत मानता है।
“उसे पाना ही मुश्किल हो रहा है। आज ढाके से बुलावा आता है तो कल किसी दूसरी जगह से; इस तरह सदा ही काम में उलझा रहता है।
“उसके समाजवालों में बड़ी गडबड़ी मची हुई है।”
गोस्वामी – क्यों?
श्रीरामकृष्ण – उसे लोग कह रहे हैं, तुम साकारवादियों के साथ मिल रहे हो, तुम पौत्तलिक हो।
“और बड़ा उदार और सरल है। सरल हुए बिना ईश्वर की कृपा नहीं होती।”
'गृहस्थ, आगे बढ़ो।' अभ्यासयोग
अब श्रीरामकृष्ण मुखर्जियों से बातचीत कर रहे हैं। महेन्द्र उनमें बड़े हैं, व्यवसाय करते हैं, किसी की नौकरी नहीं करते। छोटे प्रियनाथ इंजीनियर थे, अब उन्होंने कुछ धनोपार्जन कर लिया है, अब नौकरी नहीं करते। बड़े भाई की उम्र ३५-३६ के लगभग होगी। उनका मकान केडेटी मौजे में है। कलकत्ते के बागबाजार में भी उनका अपना मकान है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कुछ उद्दीपना हो रही है, यह देखकर चुप्पी न साध जाना। बढ़ जाओ! चन्दन की लकड़ी के बाद और भी चीजें हैं – चाँदी की खान – सोने की खान!
प्रिय – (सहास्य) – जी, पैरों में जो बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं, उनके कारण बढ़ा नहीं
* एक प्रसिद्ध वैष्णव साधु