श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७३ ४२५
२ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७३ ४२५
“मैं व्याकुल होकर एकान्त में रोता था। ‘कहाँ हो नारायण’ कह कर रोता था। रोते-रोते बाह्य ज्ञान लुप्त हो जाता था। मैं महावायु में लीन हो जाता था।
“योग कैसे होता है? टेलिग्राफ का तार टूटा न रहने पर या उसमें कोई दोष न रहने पर होता है। विषयों के प्रति आसक्ति का एकदम त्याग।
“किसी प्रकार की कामना-वासना नहीं रखनी चाहिए। कामना-वासना रहने पर उसे सकाम भक्ति कहते हैं, निष्काम भक्ति को अहेतुकी भक्ति कहते हैं। तुम प्यार करो या न करो फिर भी मैं तुम्हें प्यार करता हूँ – इसीका नाम है अहेतुक प्रेम!
“बात यह है, – उनसे प्रेम करना। प्रेम गहरा होने पर दर्शन होता है। पति पर सती का आकर्षण, सन्तान पर माँ का आकर्षण और विषयप्रिय व्यक्ति का सांसारिक विषयों के प्रति आकर्षण – ये तीन आकर्षण यदि एक ही साथ हो तो ईश्वर का दर्शन होता है।”
जयगोपाल विषयप्रिय व्यक्ति है, क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण उन्हीं के योग्य ये सब उपदेश दे रहे हैं?
ज्ञान-पथ और विचार-पथ। भक्तियोग और ब्रह्मज्ञान
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हुए हैं। रात के आठ बजे होंगे। आज पूस की शुक्ला पञ्चमी है; बुधवार, २ जनवरी, १८८४। कमरे में राखाल और मणि हैं। श्रीरामकृष्ण के साथ रहने का मणि का आज इक्कीसवाँ दिन है।
श्रीरामकृष्ण ने मणि को तर्क-विचार करने से मना किया है।
श्रीरामकृष्ण – (राखाल से) – ज्यादा तर्क-विचार करना अच्छा नहीं। पहले ईश्वर है, फिर संसार। उन्हें पा लेने पर उनके संसार के सम्बन्ध में भी ज्ञान हो जाता है।
(मणि और राखाल से) “यदु मल्लिक से बातचीत करने पर उसके कितने मकान हैं, कितने बगीचे हैं, कम्पनी के कागजात कितने हैं – यह सब समझ में आ जाता है।
“इसीलिए तो ऋषियों ने वाल्मीकि को ‘मरा-मरा’ जपने के लिए उपदेश दिया था। इसका एक विशेष अर्थ है। ‘म’ का अर्थ है ईश्वर और ‘रा’ का अर्थ संसार, – पहले ईश्वर, फिर संसार।
“कृष्णकिशोर ने कहा था, ‘मरा-मरा’ शुद्ध मन्त्र है; क्योंकि वह ऋषि का दिया हुआ है। ‘म’ अर्थात् ईश्वर और ‘रा’ अर्थात् संसार।
“इसीलिए वाल्मीकि की तरह पहले सब कुछ छोड़कर निर्जन में व्याकुल हो रो-रोकर ईश्वर को पुकारना चाहिए। पहले आवश्यक है ईश्वर-दर्शन। उसके बाद है तर्क-विचार – शास्त्र और संसार के सम्बन्ध में।
(मणि के प्रति) “इसीलिए तुमसे कहता हूँ, अब और अधिक तर्क-विचार न करना। यही बात कहने के लिए मैं झाऊतल्ले से उठकर आया हूँ। ज्यादा तर्कविचार करने
४२६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जनवरी, १८८४
पर अन्त में हानि होती है। अन्त में हाजरा की तरह हो जाओगे। मैं रात में अकेला रास्ते पर रो-रोकर टहलता और कहता था, 'माँ, मेरी विचार-बुद्धि पर वज्रप्रहार कर दो।'
"कहो, अब तो तर्क-विचार न करोगे?"
मणि – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – भक्ति से ही सब कुछ प्राप्त होता है। जो लोग ब्रह्मज्ञान चाहते हैं, यदि वे भक्तिमार्ग पकड़े रहें, तो उन्हें ब्रह्मज्ञान भी हो जाता है।
"उनकी दया रहने पर क्या कभी ज्ञान का अभाव भी होता है? उस देश में (कामारपुकुर में) धान नापते हैं। जब राशि चुक जाती है, तब एक आदमी और धान ठेल देता है, इस तरह राशि फिर तैयार हो जाती है। माँ ही ज्ञान की राशि पूरी करती जाती हैं।
"उन्हें प्राप्त कर लेने पर पण्डितगण सब घास-पात की तरह जान पड़ते हैं। पद्मलोचन ने कहा था, तुम्हारे साथ अछूतों के घर की सभा में भी जाऊँगा, इसमें भला हर्ज ही क्या है? – तुम्हारे साथ चमार के यहाँ भी जाकर मैं भोजन कर सकता हूँ।
"भक्ति के द्वारा सब मिलते हैं। उन्हें प्यार कर सकने पर फिर किसी चीज का अभाव नहीं रह जाता। माता भगवती के पास कार्तिकेय और गणेश बैठे हुए थे। उनके गले में मणियों की माला पड़ी थी। माता ने कहा, जो पहले इस ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करके आ जायगा, उसी को मैं यह माला दे दूँगी। कार्तिक उसी समय फौरन ही मयूर पर चढ़कर चल दिये। गणेश ने धीरे-धीरे माता की परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया। गणेश जानते थे, माता के भीतर ही ब्रह्माण्ड है। माँ ने प्रसन्न होकर गणेश को हार पहना दिया। बड़ी देर बाद कार्तिक ने आकर देखा कि उनके दादा हार पहने हुए बैठे थे।
"मैंने माँ से रो-रोकर कहा था, 'माँ! वेद-वेदान्त में क्या है, मुझे बता दो, – पुराण-तन्त्रों में क्या है, मुझे बता दो।'
"उन्होंने मुझे सब कुछ बता दिया है – कितनी बातें दिखायी हैं।
"सच्चिदानन्द गुरु को रोज प्रातःकाल पुकारते हो न?"
मणि – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – गुरु कर्णधार हैं। फिर देखा, 'मैं' एक अलग हूँ, 'तुम' एक अलग। फिर कूदा और मछली बन गया। देखा कि सच्चिदानन्द-समुद्र में आनन्दपूर्वक विचर रहा हूँ।
"ये सब बड़ी ही गुह्य कथाएँ हैं। तर्क-विचार करके क्या समझोगे? वे जब दिखा देते हैं, तब सब प्राप्त होता है, किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता।"
शुक्रवार, ४ जनवरी १८८४ ई.। दिन के चार बजे के समय श्रीरामकृष्ण पंचवटी में बैठे हैं। मुख पर हँसी है और साथ हैं मणि, हरिपद आदि। हरिपद के साथ स्व. आनन्द चॅटर्जी के बारे में बातें हो रही हैं और घोषपाड़ा के साधन-भजन की बातें।