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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ५६

परिच्छेद ५६

अधर के मकान पर दुर्गापूजा-महोत्सव में

(१)

जगन्माता के साथ वार्तालाप

श्री अधर के मकान पर नवमी-पूजा के दिन दालान में श्रीरामकृष्ण खड़े हैं। सन्ध्या के बाद श्रीदुर्गामाई की आरती देख रहे हैं। अधर के घर पर दुर्गापूजा का महोत्सव है। इसलिए वे श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रित करके लाए हैं।

आज बुधवार है। १० अक्टूबर १८८३ ई.। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ पधारे हैं। उनमें बलराम के पिता तथा अधर के मित्र स्कूल-इन्स्पेक्टर सारदाबाबू भी आए हैं। अधर ने पूजा के उपलक्ष्य में पड़ोसी तथा आत्मीयजनों को भी निमन्त्रण दिया है। वे भी आए हैं।

श्रीरामकृष्ण संध्या की आरती देखकर भावविभोर होकर पूजा के दालान में खड़े हैं। भावाविष्ट होकर माँ को गाना सुना रहे हैं।

अधर गृही भक्त हैं। और भी अनेक गृही भक्त उपस्थित हैं। वे सब त्रितापों से तापित हैं। सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण सभी के मंगल के लिए जगन्माता की स्तुति कर रहे हैं।

(संगीत का भावार्थ) – “हे तारिणि! मुझे तारो। अब की बार शीघ्र तारो। हे माँ, जीवगण यम से भयभीत हो गए हैं। हे जगज्जननि! संसार को पालनेवाली! लोगों को मोहनेवाली जगज्जननि! तुमने यशोदा की कोख में जन्म लेकर हरि की लीला में सहायता की थी; तुमने वृन्दावन में राधा बन ब्रजवल्लभ के साथ विहार किया। रास रचकर रसमयी तुमने रासलीला का प्रकाश किया। हे माँ, तुम गिरिजा हो, गोपतनया हो, गोविन्द की मनमोहिनी हो, तुम सद्गति देनेवाली गंगा हो। हे गौरि, सारा विश्व तुम्हारा गुणगान गाता है। हे शिवे! हे सनातनि! सदानन्दमयी सर्वस्वरूपिणि! हे निर्गुणे, हे सगुणे! हे सदाशिव की प्रिये! तुम्हारी महिमा को कौन जानता है!”

श्रीरामकृष्ण अधर के मकान के दुमँजले पर बैठकघर में बैठे हैं। कमरे में अनेक आमन्त्रित व्यक्ति आए हैं।

बलराम के पिता और सारदाबाबू आदि पास बैठे हैं।

१० अक्टूबर, १८८३

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श्रीरामकृष्ण अभी भी भावविभोर हैं। आमन्त्रित व्यक्तियों को सम्बोधित कर कह रहे हैं, “मैंने भोजन कर लिया है; अब तुम लोग भी भोजन करो।”

अधर की पूजा और नैवेद्य को माँ ने ग्रहण किया है; क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण जगन्माता के आवेश में आकर कह रहे हैं, ‘मैंने खा लिया है; अब तुम लोग भी प्रसाद पाओ’?

श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर जगन्माता से कह रहे हैं, “माँ! मैं खाऊँ? या तुम खाओगी? माँ, कारणानन्दरूपिणी।”

क्या श्रीरामकृष्ण जगन्माता को और अपने को एक ही देख रहे हैं! जो माँ हैं, क्या वही स्वयं लोकशिक्षा के लिए पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुई हैं? क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण भाव के आवेश में कह रहे हैं, मैंने भोजन कर लिया है?

इसी प्रकार भाव के आवेश में देह के बीच षट्चक्र और उसमें माँ को देख रहे हैं। इसलिए फिर भावविभोर होकर गाना गा रहे हैं -

(भावार्थ) - “हे माँ हरमोहिनी, तूने संसार को भुलावे में डाल रखा है। मूलाधार महाकमल में तू वीणावादन करती हुई चित्तविनोदन करती है। महामन्त्र का अवलम्बन कर तू शरीररूपी यन्त्र के सुषुम्नादि तीन तारों में तीन गुणों के अनुसार तीन ग्रामों में संचरण करती है। मूलाधारचक्र में तू भैरव राग के रूप में अवस्थित है; स्वाधिष्ठानचक्र के षड्दल कमल में तू श्री राग तथा मणिपूरचक्र में मल्हार राग है। तू वसन्त राग के रूप में हृदयस्थ अनाहतचक्र में प्रकाशित होती है। तू विशुद्धचक्र में हिण्डोल तथा आज्ञाचक्र में कर्णाटक राग है। तान-मान-लय-सुर के सहित तू मन्द्र-मध्य-तार इन तीन सप्तकों का भेदन करती है। हे महामाया, तूने मोहपाश के द्वारा सब को अनायास बाँध लिया है। तत्त्वाकाश में तू मानो स्थिर सौदामिनी की तरह विराजमान है। 'नन्दकुमार' कहता है कि तेरे तत्त्व का निश्चय नहीं किया जा सकता। तीन गुणों के द्वारा तूने जीव की दृष्टि को आच्छादित कर रखा है।”

(भावार्थ) - “माँ के गूढ़ तत्त्वों को सोचते सोचते प्राणों पर आ बीती। जिसके नाम से कालभय नष्ट होता है, जिसके चरणों के नीचे महाकाल है, उसका काला रूप क्यों हुआ? काले रूप अनेक हैं, पर यह बड़ा आश्चर्यजनक काला रूप है, जिसे हृदय के बीच में रखने पर हृदयरूपी पद्म आलोकित हो जाता है। रूप में काली है, नाम में काली है, काले से भी अधिक काली है। जिसने इस रूप को देखा है, वह मोहित हो गया है, उसे दूसरा रूप अच्छा नहीं लगता। 'प्रसाद' आश्चर्य के साथ कहता है कि ऐसी लड़की कहाँ थी, जिसे बिना देखे, केवल कान से जिसका नाम सुनकर ही मन जाकर उससे लिप्त हो गया!”

अभया की शरण में जाने से सभी भय दूर हो जाते हैं, सम्भव है इसीलिए वे भक्तों को अभयदान दे रहे हैं और गाना गा रहे हैं -

३२४श्रीरामकृष्णवचनामृत१० अक्टूबर, १८८३

(भावार्थ) - “मैंने अभय पद में प्राणों को सौंप दिया है” इत्यादि।

श्री सारदाबाबू पुत्रशोक से अत्यन्त व्यथित हैं। इसलिए उनके मित्र अधर उन्हें श्रीरामकृष्ण के पास लाये हैं। वे गौरांग के भक्त हैं। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण में श्रीगौरांग का उद्दीपन हुआ है। श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं -

(भावार्थ) - “मेरा अंग क्यों गौर हुआ?” इत्यादि।

अब श्रीगौरांग के भाव में आविष्ट हो गाना गा रहे हैं। कह रहे हैं, सारदाबाबू यह गाना बहुत चाहते हैं।

(भावार्थ) - “भावनिधि गौरांग का भाव होगा नहीं तो क्या? भाव में हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, गाते हैं। वन देखकर वृन्दावन समझते हैं। गंगा देख उसे यमुना मान लेते हैं। गौरांग सिसक-सिसककर रो रहे हैं। यद्यपि वे बाहर ‘गोर’ हैं तथापि भीतर वे ‘कृष्ण’ हैं।

(भावार्थ) - “माँ! पड़ोसी लोग हल्ला मचाते हैं। मुझे गौरकलंकिनी कहते हैं? क्या यह कहने की बात है? कहाँ कहूँगी? ओ प्यारी सखि, लज्जा से मरी जाती हूँ। एक दिन श्रीवास के मकान में कीर्तन की धूम मची हुई थी; गौररूपी चन्द्रमा श्रीवास के आँगन पर लोटपोट हो रहा था। मैं एक कोने में खड़ी थी। एक ओर छिपी हुई थी। मैं बेहोश हो गयी। श्रीवास की धर्मपत्नी मुझे होश में लायी। एक दिन गौर नगरकीर्तन कर रहे थे; चाण्डाल, यवन आदि भी गौर के साथ थे। वे ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहते हुए नदिया के बाजारों में से चले जा रहे थे। मैंने उनके साथ जाकर दो रक्तिम चरणों के दर्शन किए थे। एक दिन गंगातट पर घाट पर गौरांग प्रभु खड़े थे। मानो चन्द्र और सूर्य दोनों ही गौर के अंग में प्रकट हुए थे। गौर के रूप को देखकर शाक्त और शैव भूल गए। एकाएक मेरा घड़ा गिर पड़ा! दुष्ट ननदिया ने देख लिया था।”

बलराम के पिता वैष्णव हैं; सम्भव है इसीलिए अब श्रीरामकृष्ण गोपियों के दिव्य प्रेम का गाना गा रहे हैं।

(भावार्थ) - “सखि! श्याम को पा न सकी, तो फिर किस सुख से घर पर रहूँ? यदि श्याम मेरे सिर के केश होते तो हे सखि, मैं उसमें बकुल फूल पिरोकर यत्न के साथ वेणी बाँध लेती। श्याम यदि मेरे हाथ के कंगन होते, तो सदा बाँहों में लगे रहते। सखि, मैं कंगन हिलाकर, बाँह हिलाकर चली जाती। हे सखि! मैं श्यामरूपी कंगन को हाथ में पहनकर सड़कों पर से चली जाती। जिस समय श्याम अपनी बाँसुरी बजाता है, तो मैं यमुना में जल लेने आती हूँ। मैं भटकी हुई हरिणी की तरह इधर-उधर ताकती रहती हूँ।”

(२)

सर्वधर्म-समन्वय और श्रीरामकृष्ण

बलराम के पिता की उड़ीसा प्रान्त में भद्रक आदि कई स्थानों में जमींदारी है और