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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१४ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६१ | ३७३

१४ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६१३७३

उनके दोनों नेत्रों में शत धाराओं से होकर प्रेम बह रहा है। मत्त मातंग के सदृश श्रीगौरांग कभी तो प्रेमावेश में नाचते हुए गाते हैं, कभी धूल में लोटते हैं, कभी आँसुओं में बहते हैं। वे रोते हुए हरि को पुकार रहे हैं। उनका उच्च स्वर स्वर्ग और मत्यलोक को भी हिला रहा है। कभी वे दाँतों में तृण दबाकर, हाथ जोड़, बार बार दासता से मुक्त कर देने के लिए परमात्मा से प्रार्थना कर रहे हैं। अपने घुँघराले बालों को मुँड़ाकर उन्होंने योगी का वेश धारण किया है। उनकी भक्ति और प्रेमावेश को देखकर जी रो उठता है। जीवों के दुःख से दुःखी होकर, सर्वस्व त्यागकर वे प्रेम प्रदान करने के लिए आए हैं। 'प्रेमदास' की यही अभिलाषा है कि वह श्रीचैतन्यदेव के चरणों का दास होकर उनके साथ दर दर घूमे।”

रामलाल ने फिर एक गाना गाया। इसमें श्रीगौरांगदेव की माता शची का विलाप है।

इसके बाद श्रीरामकृष्ण के आदेशानुसार रामलाल ने कुछ और गाने गाए।

श्रीरामकृष्ण रामलाल से फिर 'गौरांग और नित्यानंद' वाला गाना गाने के लिए कह रहे हैं। इस बार रामलाल के साथ श्रीरामकृष्ण भी गा रहे हैं।

(भावार्थ) – “हे प्रभु श्रीगौरांग और नित्यानन्द, तुम दोनों भाई बड़े ही दयालु हो! यही सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। मैं काशी गया था। वहाँ विश्वेश्वरजी ने मुझसे कहा है, वे परब्रह्म इस समय शचीदेवी के घर में हैं। हे परब्रह्म! मैंने तुम्हें पहचान लिया है। मैं कितनी ही जगह गया, परन्तु इस तरह के दयासागर और कहीं मेरी दृष्टि में नहीं पड़े। तुम दोनों ब्रजमण्डल में कृष्ण बलराम थे। अब नदिया में आकर श्रीगौरांग और नित्यानन्द हुए हो! तुम्हारी ब्रज की क्रीड़ा थी दौड़धूप और अब यह नदिया में तुम्हारी क्रीड़ा है धूल में लोटपोट हो जाना। ब्रज में तुम्हारी क्रीड़ा जोर जोर की किलकारियाँ थीं और आज नदिया में तुम्हारी क्रीड़ा है, हरिनाम-कीर्तन। तुम्हारे सब और अंग तो छिप गए हैं, परन्तु दोनों बंकिम नेत्र अब भी हैं। तुम्हारा पतितपावन नाम सुनकर मेरे हृदय में बहुत बड़ा भरोसा हो गया है। मैं बड़ी आशा से यहाँ दौड़ा हुआ आया हूँ। तुम अपने चरणों की शीतल छाया में मुझे स्थान दो। जगाई और मधाई जैसे पाखण्डी भी तर गए हैं; प्रभो, यही भरोसा मुझे भी है। मैंने सुना है, तुम दोनों चाण्डालों को भी हृदय से लगा लेते हो, हृदय से लगाकर हरिनाम-कीर्तन करते हो।”

निर्जन में भक्तों की साधना

रात बहुत हो चुकी है। नौबतखाने के ऊपरवाले कमरे में मणि अकेले बैठे हुए हैं। आज अगहन की पूर्णिमा है। आकाश, गंगा, कालीमन्दिर, मन्दिरों के शिखर, उद्यानपथ, पंचवटी – सभी चन्द्रलोक से आलोकित हैं। मणि एकाकी श्रीरामकृष्ण का चिन्तन कर रहे हैं।

३७४ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर, १८८३

रात के करीब तीन बज गए। मणि उठे और उत्तराभिमुख हो पंचवटी की ओर जाने लगे। श्रीरामकृष्ण ने पंचवटी की बात कही है। नौबतखाना अब अच्छा नहीं लग रहा है। मणि ने पंचवटीवाले घर में रहने का निश्चय किया।

चारों ओर नीरवता है। रात के ग्यारह बजे गंगा में ज्वार आया था। बीच बीच में पानी की आवाज सुनायी दे रही है। मणि पंचवटी की ओर बढ़ने लगे। इतने में उन्हें दूर से एक आवाज सुनायी पड़ी। मानो कोई पंचवटी के वृक्षमण्डप के भीतर से आर्त स्वर से पुकार रहा है – 'कहाँ हो दादा मधुसूदन!'

आज पूर्णिमा होने के कारण वटवृक्ष की शाखा-प्रशाखाओं को भेदकर चन्द्र की किरणें प्रकाशित हो रहीं हैं।

कुछ और अग्रसर होकर मणि ने दूर से देखा कि पंचवटी में श्रीरामकृष्ण के एक भक्त बैठे हुए निर्जन में एकाकी पुकार रहे हैं – 'कहाँ हो दादा मधुसूदन!' मणि निःस्तब्ध हो देखते रहे।