श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०५
२५ मई, १८८४ | परिच्छेद ८१ | ५०५
आओ, इस तरह पैर भी मजे में झुला सकोगे!
सुरेन्द्र ऊपर चले गये। भवनाथ कुर्ता पहने हुए बैठे हैं, यह देखकर सुरेन्द्र ने कहा, 'क्यों जी, आप विलायत जा रहे हैं क्या?'
श्रीरामकृष्ण हँसते हुए कहते हैं, हमारा विलायत ईश्वर के पास है।
श्रीरामकृष्ण भक्तों से अनेक विषयों पर बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – मैं कभी कभी धोती-कपड़ा फेंककर आनन्दमय होकर घूमता था। शम्भू ने एक दिन कहा, 'क्यों जी, तुम इसीलिए कपड़े फेंककर घूमते हो! – बड़ा आराम मिलता है! – मैंने एक दिन ऐसा करके देखा था।'
सुरेन्द्र – आफिस से लौटकर कपड़े उतारता हुआ कहता हूँ, माँ, तुमने कितने बन्धनों से जकड़ रखा है।
श्रीरामकृष्ण – अष्टपाशों से बाँध रखा है। लज्जा, घृणा, भय, जाति-अभिमान, संकोच, छिपाने की इच्छा आदि सब।
श्रीरामकृष्ण गाने लगे। पहले गाने का भाव है – 'माँ, मुझे यही खेद है कि तुम्हारे जैसी माता के रहते भी मेरे जागते हुए घर में चोरी हो।' दूसरे गाने का अर्थ है – 'माँ, तुम इस संसार में खूब पतंग उड़ा रही हो। आशा की वायु पर पतंग उड़ रही है, उसमें माया की डोर लगी हुई है।'
श्रीरामकृष्ण – माया की डोर स्त्री-पुत्र हैं। विषय से वह डोर मांजी गयी है, इसीलिए उसमें इतनी तेजी आ गयी है। विषय अर्थात् कामिनी-कांचन।
श्रीरामकृष्ण फिर गाने लगे। गीत का भाव – “संसार में पासा खेलने के लिए आना है। यहाँ आकर मैंने बड़ी-बड़ी आशाएँ की थीं। आशा की आशा भग्न दशा ही है। पहले मेरे हक में पंजा आया। पौबारह! अठारह, सोलह, जिस तरह फिर फिरकर आया करते हैं, उसी तरह मैं भी युग और युगांतरों में आता गया। कच्चे बारह के पड़ने पर, माँ, पंजे और छक्के में मुझे बंध जाना पड़ा। छः दो आठ, छः चार दस, माँ, ये कोई मेरे वंश में नहीं हैं। इस खेल में मुझे कोई यश न मिला। अब तो बाजी भी खतम होनी चाहती है।”
श्रीरामकृष्ण – पंजा अर्थात् पञ्चभूत। पंजे और छक्के में बँध जाना, अर्थात् पञ्चभूतों और षड्रिपुओं के वश में आना। छः तीनों नौ को अंगूठा दिखाना, अर्थात् छः रिपुओं के बस में न आना और तीनों गुणों के पार हो जाना।
“सत्त्व, रज और तम, इन तीनों गुणों ने आदमी को अपने वश में कर रखा है। तीनों भाई-भाई हैं। सत्त्व के रहने पर वह रज को बुला सकता है और रज के रहने पर वह तम को बुला सकता है। तीनों गुण चोर हैं। तमोगुण विनाश करता है, रजोगुण बद्ध करता है, सतोगुण बन्धन तो जरूर खोलता है, परन्तु वह ईश्वर के पास तक नहीं ले जा सकता।”
विजय – (सहास्य) – सत् भी चोर है न?
५०६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २५ मई, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – वह ईश्वर के पास नहीं ले जा सकता, परन्तु रास्ता दिखा देता है।
भवनाथ – वाह! कैसी सुन्दर बात है!
श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह बड़ी ऊँची बात है।
भक्तगण ये सब बातें सुनकर आनन्द मना रहे हैं।
(२)
कामिनी-कांचन के सम्बन्ध में उपदेश
श्रीरामकृष्ण – बन्धन का कारण कामिनी-कांचन है। कामिनी-कांचन ही संसार है। कामिनी-कांचन ही हमें ईश्वर को देखने नहीं देता।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने अंगौछे से मुख छिपा लिया। फिर कहा, “क्या अब तुम लोग मुझे देख रहे हो? यही आवरण है। यह कामिनी-कांचन का आवरण दूर हुआ नहीं कि चिदानन्द मिले।
“देखो न, जिसने स्त्री का सुख छोड़ा उसने संसार का सुख छोड़ा, ईश्वर उसके बहुत निकट हैं।”
कोई भक्त बैठे, कोई खड़े ये सब बातें सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (केदार, विजय आदि से) – स्त्री का सुख जिसने छोड़ा, उसने संसार का सुख छोड़ा। यह कामिनी-कांचन ही आवरण है। तुम्हारे इतनी बड़ी बड़ी मूंछें हैं, तो भी तुम लोग उसी में हो! कहो, मन ही मन विचार करके देखो।
विजय – जी हाँ, यह सच है।
केदार चुप हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे – “सभी को देखता हूँ, स्त्रियों के वशीभूत हैं। मैं कप्तान के घर गया था। वहाँ से होकर राम के घर जाना था। इसलिए कप्तान से कहा – 'गाड़ी का किराया दे दो।' कप्तान ने अपनी स्त्री से कहा। वह स्त्री भी वैसी ही थी – 'क्या हुआ' 'क्या हुआ' करने लगी! अन्त में कप्तान ने कहा, 'खैर वे ही लोग (राम आदि) दे देंगे।' गीता-भागवत-वेदान्त सब स्त्री के सामने झुकते हैं। (सब हँसते हैं।)
“रुपया-पैसा और सर्वस्व बीबी के हाथ में! और फिर कहा जाता है – 'मैं दो रुपये भी अपने पास नहीं रख सकता – न जाने मेरा स्वभाव कैसा है।'
“बड़े बाबू के हाथ में बहुत से काम हैं, परन्तु वे किसी को देते नहीं। एक ने कहा गुलाब-जान के पास जाकर सिफारिश कराओ तो काम हो जायगा। गुलाब-जान बड़े बाबू की रखेली है।
“पुरुषों में यह समझ नहीं रह गयी कि देखें कि वे स्त्रियों के कारण कितना उतर