सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ६२

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

परिच्छेद ६२

दक्षिणेश्वर में अंतरंग भक्तों के साथ

प्रह्लादचरित्र-श्रवण तथा भावावेश। स्त्रीसंग-निन्दा

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में उसी पूर्वपरिचित कमरे में फर्श पर बैठे हुए प्रह्लाद-चरित्र सुन रहे हैं। दिन के आठ बजे होंगे। रामलाल 'भक्तमाल' ग्रन्थ से प्रह्लाद-चरित्र पढ़ रहे हैं।

आज शनिवार, अगहन की कृष्णा प्रतिपदा है, १५ दिसम्बर १८८३ ई.। मणि दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण की पदच्छाया में ही रहते हैं। वे भी श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए प्रह्लाद-चरित्र सुन रहे हैं। कमरे में राखाल, लाटू, हरीश भी हैं, – कोई बैठे हुए सुन रहे हैं, कोई आना-जाना कर रहे हैं। हाजरा बरामदे में हैं।

श्रीरामकृष्ण प्रह्लाद-चरित्र की कथा सुनते सुनते भावावेश में आ रहे हैं। जब हिरण्यकशिपु का वध हुआ, तब नृसिंह की रुद्र मूर्ति देख और उनका सिंहनाद सुनकर ब्रह्मादि देवताओं ने प्रलय की आशंका से प्रह्लाद को ही उनके पास भेज दिया। प्रह्लाद बालक की तरह स्तव कर रहे हैं। भक्तवत्सल नृसिंह बड़े प्रेम से प्रह्लाद की देह पर जीभ फिरा रहे हैं। 'अहा! भक्त पर कैसा प्यार है!' कहते हुए श्रीरामकृष्ण भावसमाधि में लीन हो गए। देह निःस्पन्द हो गयी है, आँखों की कोरों में प्रेमाश्रु दिखायी पड़ रहे हैं। भाव का उपशम हो जाने पर श्रीरामकृष्ण उसी छोटे तख्त पर जा बैठे। मणि फर्श पर उनके चरणों के पास बैठे। श्रीरामकृष्ण उनसे बातचीत कर रहे हैं। ईश्वर के मार्ग पर रहकर जो लोग स्त्रीसंग करते हैं, उनके प्रति श्रीरामकृष्ण घृणा और क्रोध प्रकट कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – लाज भी नहीं आती – लड़के हो गए फिर भी स्त्रीसंग! घृणा भी नहीं होती, – पशुओं का-सा व्यवहार! लार, खून, मल, मूत्र – इन पर घृणा भी नहीं होती! जो ईश्वर के पादपद्मों की चिन्ता करता है, उसे परम सुन्दरी स्त्री भी चिताभस्म के समान जान पड़ती हैं। जो शरीर नहीं रहेगा, जिसके भीतर कृमि, क्लेद, श्लेष्मा – सब तरह की नापाक चीजें भरी हुई हैं, उसी को लेकर आनन्द! लज्जा भी नहीं आती!

मणि चुपचाप सिर झुकाए हुए हैं। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे – “उनके प्रेम का एक बिन्दु भी यदि किसी को मिल गया तो कामिनी-कांचन अत्यन्त तुच्छ जान पड़ते हैं। जब मिश्री का शरबत मिल जाता है, तब गुड़ का शरबत नहीं सुहाता। व्याकुल होकर

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri

३७६श्रीरामकृष्णवचनामृत१५ दिसम्बर, १८८३

उनसे प्रार्थना करने पर, उनके नामगुण का सदा कीर्तन करने पर, क्रमश: उन पर वैसा ही प्यार हो जाता है।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त हो कमरे के भीतर नाचते हुए टहलने और गाने लगे –

(भावार्थ) – “सुरधुनी के तट पर कौन हरिनाम ले रहा है? शायद प्रेमदाता नित्यानन्द आए हैं। उनके बिना प्राण कैसे शीतल हों?”

करीब दस बजे होंगे। रामलाल ने कालीमन्दिर की नित्यपूजा समाप्त कर दी है। श्रीरामकृष्ण माता के दर्शन करने के लिए कालीमन्दिर जा रहे हैं। साथ मणि भी हैं। मन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण आसन पर बैठ गए। माता के चरणों पर दो-एक फूल उन्होंने अर्पित किए। अपने मस्तक पर फूल रखकर ध्यान कर रहे हैं। अब गीत गाकर माता की स्तुति करने लगे –

“हे शंकरि, मैंने सुना है तुम्हारा नाम भवहरा भी है। इसीलिए माँ, मैंने तुम्हें अपना भार दे दिया है, – तुम तारो चाहे न तारो।” ...

श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर से लौटकर अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में बैठे। दिन के दस बजे का समय होगा। अब भी देवताओं का भोग या भोग-आरती नहीं हुई। माता काली और श्रीराधाकान्त के प्रसादी फल-मूल आदि से कुछ लेकर श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा जलपान किया। राखाल आदि भक्तों को भी थोड़ा थोड़ा प्रसाद मिल चुका है।

श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए राखाल स्माइल की ‘सेल्फ-हेल्प’? (Smile's Self-help) पढ़ रहे हैं – लार्ड अर्सिकन (Lord Erskine) के सम्बन्ध में।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – इसमें क्या लिखा है?

मास्टर – साहब फल की आकांक्षा न करके कर्तव्य-कर्म करते थे – यही लिखा है। निष्काम-कर्म।

श्रीरामकृष्ण – तब तो अच्छा है। परन्तु पूर्ण ज्ञान का लक्षण है कि एक भी पुस्तक साथ न रहेगी। जैसे शुकदेव – उनका सब कुछ जिह्वा पर।

“पुस्तकों और शास्त्रों में शक्कर के साथ बालू भी मिली हुई है। साधु शक्कर भर का हिस्सा ले लेता है, बालू छोड़ देता है। साधु सार पदार्थ लेता है।”

शुकदेवादि का नाम लेकर क्या ठाकुर अपनी अवस्था समझाना चाहते हैं?

वैष्णवचरण कीर्तनिया (कीर्तन गानेवाले) आये हुए हैं; उन्होंने ‘सुबोल-मिलन’ नाम का कीर्तन गाकर सुनाया।

कुछ देर बाद रामलाल ने थाली में श्रीरामकृष्ण के लिए प्रसाद ला दिया। प्रसाद पाकर श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम करने लगे।

रात में मणि नौबतखाने में सोये। श्रीमाताजी जब श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए आती थीं तब इसी नौबतखाने में रहती थीं। कुछ मास हुए वे कामारपुकुर गयी हैं।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar