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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१५ अप्रैल, १८८३ | परिच्छेद ३० | १८९

१५ अप्रैल, १८८३ | परिच्छेद ३० | १८९

इन्द्रियों ने उत्तर दे दिया, तो मैं ही अकेली क्यों रह गयी?”

अन्त में श्रीराधा-कृष्ण दोनों के एक दूसरे से मिलन का कीर्तन होने लगा –

“राधिकाजी श्रीकृष्ण को पहनाने के लिए माला गूँथ ही रही थीं कि अचानक श्रीकृष्ण उनके सामने आकर खड़े हो गए।”

युगल-मिलन के संगीत का आशय यह है –

“कुंजवन में श्याम-विनोदिनी राधिका कृष्ण के भावावेश में विभोर हो रही है। दोनो में से न तो किसी के रूप की उपमा हो सकती है और न किसी के प्रेम की ही सीमा है। आधे में सुनहली किरणों की छटा है और आधे में नीलकान्त मणि की ज्योति। गले के आधे हिस्से में वन के फूलों की माला है और आधे में गज-मुक्ता। कानों के अर्धभाग में मकरकुण्डल हैं और अर्धभाग में रत्नों की छबि। अर्धललाट में चन्द्रोदय हो रहा है। और आधे में सूर्योदय। मस्तक के अर्धभाग में मयूरशिखण्ड शोभा पा रहा है और आधे में वेणी। कनककमल झिलमिला रहे हैं, फणी मानो मणि उगल रहा है।”

कीर्तन बन्द हुआ। श्रीरामकृष्ण 'भागवत, भक्त, भगवान्' इस मन्त्र का बार बार उच्चारण करते हुए भूमिष्ठ हो प्रणाम कर रहे हैं। चारों ओर के भक्तों को उद्देश्य करके प्रणाम कर रहे हैं और संकीर्तन-भूमि की धूलि लेकर अपने मस्तक पर रख रहे हैं।

.(३)

श्रीरामकृष्ण और साकार-निराकार

रात के साढ़े नौ बजे का समय होगा। अन्नपूर्णा देवी दालान को आलोकित कर रही है। सामने श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ खड़े हुए है। सुरेन्द्र, राखाल, केदार, मास्टर, राम, मनोमोहन तथा और भी अनेक भक्त हैं। उन लोगों ने श्रीरामकृष्ण के साथ ही प्रसाद पाया है। सुरेन्द्र ने सब को तृप्तिपूर्वक भोजन कराया है। अब श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर लौटनेवाले हैं। भक्तजन भी अपने अपने घर जाएँगे। सब लोग दालान में आकर इकट्ठे हुए हैं।

सुरेन्द्र – (श्रीरामकृष्ण से) – परन्तु आज मातृवन्दना का एक भी गाना नहीं हुआ।

श्रीरामकृष्ण (देवीप्रतिमा की ओर उँगली उठाकर) – अहा! दालान की कैसी शोभा हुई है! माँ मानो अपनी दिव्य छटा छिटकाकर बैठी हुई हैं। इस रूप के दर्शन करने पर कितना आनन्द होता है! भोग की इच्छा, शोक, ये सब भाग जाते हैं। परन्तु क्या निराकार के दर्शन नहीं होते? नहीं, होते हैं। हाँ, जरा भी विषय-बुद्धि के रहते नहीं होते। ऋषियों ने सर्वस्वत्याग करके 'अखण्ड-सच्चिदानन्द' में मन लगाया था।

“आजकल ब्रह्मज्ञानी उन्हें 'अचल-धन' कहकर गाते हैं, – मुझे अलोना लगता है। जो लोग गाते हैं, वे मानो कोई मधुर रस नहीं पाते। शीरे पर ही भूले रहे, तो मिश्री की खोज

१९०श्रीरामकृष्णवचनामृत१५ अप्रैल, १८८३

करने की इच्छा नहीं हो सकती।

“तुम लोग देखते हो – बाहर कैसे सुन्दर दर्शन हो रहे हैं, और आनन्द भी कितना मिलता है। जो लोग निराकार निराकार करते, कुछ नहीं पाते, उनके न है बाहर और न है भीतर।”

श्रीरामकृष्ण माता का नाम लेकर इस भाव का गीत गा रहे हैं, – “माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना। मेरा मन तुम्हारे उन दोनो चरणों के सिवा और कुछ नहीं जानता। मैं नही जानता, धर्मराज मुझे किस दोष से दोषी बतला रहे हैं। मेरे मन में यह वासना थी कि तुम्हारा नाम लेता हुआ मैं भवसागर से तर जाऊँगा। मुझे स्वप्न में भी नहीं मालूम था कि तुम मुझे असीम सागर में डुबा दोगी। दिनरात मैं दुर्गानाम जप रहा हूँ, किन्तु फिर भी मेरी दुःखराशि दूर न हुई। परन्तु हे हरसुन्दरी, यदि इस बार भी मैं मरा तो यह निश्चय है कि संसार में फिर तुम्हारा नाम कोई न लेगा।”

श्रीरामकृष्ण फिर गाने लगे। गीत इस आशय का है –

“मेरे मन! दुर्गानाम जपो। जो दुर्गानाम जपता हुआ रास्ते में चला जाता है, शूलपाणि शूल लेकर उसकी रक्षा करते है। तुम दिवा हो, तुम सन्ध्या हो, तुम्ही रात्रि हो; कभी तो तुम पुरुष का रूप धारण करती हो, कभी कामिनी बन जाती हो। तुम तो कहती हो कि मुझे छोड़ दो, परन्तु मैं तुम्हें कदापि न छोड़ूँगा, – मैं तुम्हारे चरणों में नूपुर होकर बजता रहूँगा, – जय दुर्गा, श्रीदुर्गा कहता हुआ! माँ, जब शंकरी होकर तुम आकाश में उड़ती रहोगी तब मैं मीन बनकर पानी में रहूँगा तुम अपने नखों पर मुझे उठा लेना। हे ब्रह्ममयी, नखों के आघात से यदि मेरे प्राण निकल जायें, तो कृपा करके अपने अरुण चरणों का स्पर्श मुझे करा देना।”

श्रीरामकृष्ण ने देवी को फिर प्रणाम किया। अब सीढ़ियों से उतरते समय पुकारकर कह रहे हैं – “ओ रा – जू – हैं?” (ओ राखाल! जूते सब हैं?)

श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर चढ़े। सुरेन्द्र ने प्रणाम किया। दूसरे भक्तों ने भी प्रणाम किया। चाँदनी अभी भी रास्ते पर पड़ रही है। श्रीरामकृष्ण की गाड़ी दक्षिणेश्वर की ओर चल दी।