श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२४ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६९ | ४०७
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जागृत होती है। इसके बिना जागृत हुए ईश्वर के दर्शन नहीं होते। तुम एकाग्रता के साथ निर्जन में गाया करना -
‘‘‘जागो माँ कुलकुण्डलिनी! तुम नित्यानन्द-स्वरूपिणी!
प्रसुप्तभुजगाकारा आधारपद्मवासिनी!’
‘‘गाना गाकर ही रामप्रसाद सिद्ध हुए थे। व्याकुल होकर गाना गाने पर ईश्वरदर्शन होते हैं।’’
मणि – जी हाँ, यह सब एक बार करने से ही मन का खेद मिट जाता है।
श्रीरामकृष्ण – अहा! खेद मिट जाता है – सत्य है।
‘‘योग के सम्बन्ध की दो-चार बातें तुम्हें बतला देनी चाहिए।
गुरू ही सब करते हैं। नरेन्द्र स्वतः सिद्ध
‘‘बात यह है कि अण्डे के भीतर बच्चा जब तक बड़ा नहीं हो जाता तब तक चिड़िया उसे नहीं फोड़ती।
‘‘परन्तु कुछ साधना करनी चाहिए। गुरु ही सब कुछ करते हैं, परन्तु अन्त में कुछ साधना भी करा लेते हैं। बड़े पेड़ को काटते समय जब लगभग काटना समाप्त हो जाता है तो कुछ हटकर खड़ा हुआ जाता है। पेड़ फिर आप ही हरहराकर टूट जाता है।
‘‘जब नाली काटकर पानी लाया जाता है, और जब वह समय आता है कि थोड़ासा ही काटने से नहर के साथ नाली का योग हो जाय, तब नाली काटनेवाला कुछ हटकर खड़ा हो जाता है। तब मिट्टी भीगकर धँस जाती है और नहर का पानी हरहराकर नाली में घुस पड़ता है।
‘‘अहंकार, उपाधि, इन सब का त्याग होने के साथ ही ईश्वर के दर्शन होते हैं। मैं पण्डित हूँ, मैं अमुक का पुत्र हूँ, मैं धनी हूँ, मैं मानी हूँ, इन सब उपाधियों को त्याग देने से ही ईश्वर के दर्शन होते हैं।
‘‘ईश्वर ही सत्य हैं और सब अनित्य – संसार अनित्य है – इसे विवेक कहते हैं। विवेक के हुए बिना उपदेशों का ग्रहण नहीं होता।
‘‘साधना करते करते ही उनकी कृपा से लोग सिद्ध होते हैं। कुछ परिश्रम भी करना चाहिए। इसके बाद दर्शन और आनन्द।
‘अमुक स्थान पर सोने का घड़ा गड़ा हुआ है, यह सुनते ही मनुष्य दौड़ पड़ता है और खोदने लग जाता है। खोदते खोदते सिर से पसीना निकल जाता है। बहुत देर तक खोदने के बाद कहीं कुदार में ठनकार आती है। तब कुदार फेंककर वह देखने लगता है कि घड़ा निकला या नहीं? घड़ा अगर दीख पड़ा तब तो उसके आनन्द का पारावार नहीं रह जाता – वह नाचने लगता है।
४०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ दिसम्बर, १८८३
“घड़ा बाहर लाकर उसमें से मुहरें निकालकर वह गिनता है। तब कितना आनन्द होता है! दर्शन, स्पर्श और सम्भोग – क्यों?”
मणि – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप हो रहे। फिर कहने लगे –
“जो मेरे अपने आदमी हैं, उन्हें डाँटने पर भी वे आएँगे।
“अहा! नरेन्द्र का कैसा स्वभाव है! माँ काली को पहले उसके जी में जो आता था वही कहता था। मैंने चिढ़कर एक दिन कहा था ‘मूर्ख, तू अब यहाँ न आना।’ तब वह धीरे धीरे जाकर कुछ काम करने लगा। जो अपना आदमी है, उसको तिरस्कार करने पर भी वह नाराज नहीं होता – क्यों?”
मणि – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – नरेन्द्र स्वतःसिद्ध है। निराकार पर उसकी निष्ठा है।
मणि (सहास्य) – जब आता है तब एक महाभारत रच लाता है।
श्रीरामकृष्ण आनन्द से हँसते हुए कहते हैं – “हाँ सच हैं।”
(४)
दूसरे दिन मंगलवार, २५ दिसम्बर, कृष्णपक्ष की एकादशी है। दिन के ग्यारह बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण ने अभी भोजन नहीं किया। मणि और राखाल आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में बैठे हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण (मणि से) – एकादशी करना अच्छा है। इससे मन बहुत पवित्र होता है और ईश्वर पर भक्ति होती है, समझे?
मणि – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – धान की लाही और दूध – यही खाओगे, क्यों?