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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ६९

परिच्छेद ६९

जगद्गुरु श्रीरामकृष्ण

(१)

गूढ़ बातें

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥ (गीता १०।१३)

दूसरे दिन श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले में मणि के साथ एकान्त में बातचीत कर रहे हैं। सोमवार, २४ दिसम्बर १८८३। अगहन की कृष्णा दशमी। सुबह के आठ बजे होंगे।

आज मणि का प्रभु के सत्संग में वास करने का ग्यारहवाँ दिन है। शीत ऋतु है। पूर्व गगन में सूर्यनारायण अभी अभी उदित हुए हैं। झाऊतल्ले के पश्चिम ओर गंगाजी बह रही हैं। इस समय वे उत्तरवाहिनी हैं। ज्वार आयी है। चारों ओर वृक्ष और लताएँ हैं। थोड़ी ही दूर पर श्रीरामकृष्ण की साधना का स्थान – वह बिल्ववृक्ष – दिखायी दे रहा है। श्रीरामकृष्ण पूर्वाभिमुख हो वार्तालाप कर रहे हैं। मणि उत्तराभिमुख हो विनयपूर्वक सुन रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की दाहिनी ओर पंचवटी और हंस-पुष्करिणी है। सूर्य के प्रकाश में मानो जग बिहँस रहा है। श्रीरामकृष्ण ब्रह्मज्ञान की बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – निराकार भी सत्य है और साकार भी सत्य है।

“नागा उपदेश देता था; सच्चिदानन्द ब्रह्म कैसे हैं – जैसे अनन्त सागर है, ऊपर-नीचे, दाहिने-बायें, पानी ही पानी है। वह कारणसलिल है – स्थिर पानी है। कार्य के होने पर उसमें तरंगें उठने लगीं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय यही कार्य है।

“फिर कहता था, विचार जहाँ पहुँचकर रुक जाय, वही ब्रह्म है। जैसे कपूर जलाने पर उसका सर्वांश जल जाता है, जरा भी राख नहीं रह जाती।

“ब्रह्म मन और वचन के परे हैं। नमक का पुतला समुद्र की थाह लेने गया था। लौटकर उसने खबर नहीं दी। समुद्र में गल गया।

“ऋषियों ने राम से कहा था, – ‘राम, भरद्वाजादि तुम्हें अवतार कह सकते हैं, परन्तु हम लोग नहीं कहते। हम लोग शब्दब्रह्म की उपासना करते हैं। हम मनुष्य-स्वरूप

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४०२श्रीरामकृष्णवचनामृत२४ दिसम्बर, १८८३

को नहीं चाहते।' राम कुछ हँसकर प्रसन्न हो उनकी पूजा लेकर चले गए।

"परन्तु नित्यता जिनकी है, लीला भी उन्हीं की है। जैसे छत और सीढ़ियाँ।

"ईश्वरलीला, देवलीला, नरलीला, जगत्-लीला। नरलीला में ही अवतार होता है। नरलीला कैसी है, जानते हो? जैसे बड़ी छत का पानी नल से जोर-शोर से गिर रहा हो। वही सच्चिदानन्द हैं - उन्हीं की शक्ति एक रास्ते से - नल के भीतर से आ रही है। केवल भरद्वाजादि बारह ऋषियों ने ही राम को पहचाना था कि ये अवतारी पुरुष हैं। अवतारी पुरुषों को सभी पहचान नहीं सकते।"

श्रीरामकृष्ण (मणि से) - वे अवतीर्ण होकर भक्ति की शिक्षा देते हैं। अच्छा, मुझे तुम क्या समझते हो?

"मेरे पिता गया गए थे। वहाँ रघुवीर ने स्वप्न दिखलाया, मैं तेरा पुत्र बनकर जन्म लूँगा। पिता ने स्वप्न देखकर कहा, देव, मैं दरिद्र ब्राह्मण हूँ, मैं तुम्हारी सेवा कैसे करूँगा? रघुवीर ने कहा, सेवा हो जाएगी।

"दीदी - हृदय की माँ - पुष्प-चन्दन लेकर मेरे पैर पूजती थी। एक दिन उसके सिर पर पैर रखकर (मैंने) कहा, तेरी वाराणसी में ही मृत्यु होगी।

"मथुर बाबू ने कहा, 'बाबा, तुम्हारे भीतर और कुछ नहीं है, वही ईश्वर हैं। देह तो आवरण मात्र है, जैसे बाहर कद्दू का आकार है, परन्तु भीतर गूदा, बीज, कुछ भी नहीं है। तुम्हें देखा, मानो घूँघट डालकर कोई चला जा रहा है।'

"पहले ही से मुझे सब दिखा दिया जाता है। बटतल्ले में मैंने गौरांग के संकीर्तन का दल देखा था। उसमें शायद बलराम को देखा था और तुम्हें भी शायद देखा था।

"मैंने गौरांग का भाव जानना चाहा था। उसने दिखाया, उस देश में - श्यामबाजार में। पेड़ पर और चारदीवार पर आदमी ही आदमी - दिनरात साथ साथ आदमी! सात दिन शौच के लिए जाना भी मुश्किल हो गया! तब मैंने कहा, माँ, बस, अब रहने दो। इसीलिए अब भाव शान्त है।

"एक बार और आना होगा। इसीलिए पार्षदों को सब ज्ञान मैं नहीं देता। (हँसते हुए) तुम्हें अगर सब ज्ञान दे दें, तो फिर तुम लोग सहज ही मेरे पास क्यों आओगे?

"तुम्हें मैं पहचान गया, तुम्हारा चैतन्य-भागवत पढ़ना सुनकर। तुम अपने आदमी हो। एक ही सत्ता है, जैसे पिता और पुत्र। यहाँ सब आ रहे हैं, जैसे कल्मी की बेल, - एक जगह पकड़कर खींचने से सब आ जाता है। परस्पर सब आत्मीय हैं, जैसे भाई भाई। राखाल, हरीश आदि जगन्नाथ-दर्शन के लिए पुरी गए हैं, और तुम भी गए हो, तो क्या कभी ठहराव अलग अलग हो सकता है?

"जब तक तुम भूले हुए थे, अब अपने को पहचान सकोगे। वे गुरु के रूप में आकर जता देते हैं।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar