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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४९

२८ नवम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५९ | ३४९

नहीं होता। उसकी पूजा लोग समझ भी नहीं पाते। फूल नहीं मिलते तो वह बिल्वपत्र और गंगाजल से ही पूजा कर लेता है। थोड़ेसे चावलों या दो बताशों का ही भोग लगा देता है। कभी कभी खीर पकाकर ही ठाकुरजी को निवेदित कर देता है।

“एक और है – त्रिगुणातीत भक्त। उसका स्वभाव बालकों जैसा होता है। ईश्वर का नाम लेना ही उसकी पूजा है। वह बस उनका नाम ही जपता रहता है।”

(५)

केशव के साथ वार्तालाप। ईश्वर के अस्पताल में आत्मा की रोगचिकित्सा

श्रीरामकृष्ण (केशव के प्रति सहास्य) – तुम्हें बीमारी हुई इसका अर्थ है। शरीर के भीतर कितने ही भावों का उदयास्त हो चुका है; इसीलिए ऐसा हुआ है। जब भाव होता है तब कुछ समझ में नहीं आता, बहुत दिनों के बाद शरीर पर झोंका लगता है। मैंने देखा है, बड़ा जहाज जब गंगा से चला जाता है, तब कुछ भी मालूम नहीं होता, परन्तु थोड़ी ही देर बाद देखा कि किनारों पर लहरें जोरों से थपेड़े जमा रही हैं, और पानी में उथल-पुथल मच जाती है। कभी कभी तो किनारों का कुछ अंश भी धँसकर पानी में गिर जाता है।

“किसी कुटिया में घुसकर हाथी उसे हिला-डुलाकर तहस-नहस कर देता है। भावरूपी हाथी जब देहरूपी कमरे में घुसता है, तो उसे डाँवाडोल कर देता है।

“इससे क्या होता है, जानते हो? आग लगने पर कुछ चीजों को वह जलाकर खाक कर देती है; एक महा ऊधम मचा देती है। ज्ञानाग्नि पहले काम, क्रोध आदि रिपुओं को जलाती है, फिर अहंबुद्धि को। इसके बाद एक बहुत बड़ी उथल-पुथल मचा देती है।

“तुम सोचते हो कि बस, सब मामला तय है। परन्तु जब तक रोग की कुछ कसर रहेगी, तब तक वे तुम्हें नहीं छोड़ सकते। अगर तुम अस्पताल में नाम लिखाओं तो फिर तुम्हें चले आने का अधिकार नहीं है। जब तक रोग में कोई त्रुटि पायी जाएगी, तब तक डाक्टर साहब तुम्हें आने नहीं देंगे। तुमने नाम क्यों लिखाया?” (सब हँसते हैं।)

केशव अस्पताल की बात सुनकर बार बार हँस रहे हैं। हँसी रोक नहीं सकते; रह-रहकर फिर हँसे रहे हैं। श्रीरामकृष्ण पुनः वार्तालाप करने लगे।

श्रीरामकृष्ण (केशव से) – हदू कहता था, न तो मैंने ऐसा भाव देखा है, और न ऐसा रोग! उस समय मैं बहुत बीमार था। क्षण क्षण में दस्त होते थे और बहुत अधिक मात्रा में। सिर पर जान पड़ता था दो लाख चीटियाँ काट रही हैं। परन्तु ईश्वरीय प्रसंग दिनरात जारी रहता था! नाटागढ़ का राम कविराज देखने के लिए आया। उसने देखा कि मैं बैठा हुआ विचार कर रहा हूँ। तब उसने कहा, 'क्या यह पागल है? दो हाड़ लेकर विचार कर रहा है!’

३५० श्रीरामकृष्णवचनामृत २८ नवम्बर, १८८३

(केशव से) – 'उसकी इच्छा। माँ, सब तुम्हारी ही इच्छा है।'

“‘ऐ तारा, तुम इच्छामयी हो, सब तुम्हारी ही इच्छा है। माँ, कर्म तुम्हारे हैं, करती भी तुम्हीं हो, परन्तु मनुष्य कहते हैं, मैं करता हूँ।’

“सर्दी लगाने के उद्देश्य से माली बसरा-गुलाब को छाँटकर उसकी जड़ खोल देता है। सर्दी लगने से पेड़ अच्छी तरह उगता है। शायद इसीलिए वह तुम्हारी जड़ खोल रही है। (श्रीरामकृष्ण और केशव हँसते हैं।) जान पड़ता है, अगली बार एक बड़ी घटना होनेवाली है।

“जब कभी तुम बीमार पड़ जाते हो तब मुझे बड़ी घबराहट होती है। पहली बार भी जब तुम बीमार पड़े थे, तब रात के पिछले पहर मैं रोया करता था। कहता था, माँ, केशव को अगर कुछ हो गया तो फिर किससे बातचीत करूँगा! तब कलकत्ता आने पर मैंने सिद्धेश्वरी को नारियल और चीनी चढ़ायी थी। माँ के पास मनौती मानी थी जिससे बीमारी अच्छी हो जाए।”

केशव पर श्रीरामकृष्ण के इस अकृत्रिम स्नेह और उनके लिए उनकी व्याकुलता की बात को लोग निर्वाक् होकर सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु इस बार उतना नहीं हुआ। मैं सच कहूँगा। हाँ, दो-तीन दिन कुछ थोड़ा कलेजा मसोसा करता था।

केशव जिस पूर्ववाले द्वार से बैठकखाने में आए थे, उसी द्वार के पास केशव की पूजनीय माता खड़ी हैं। वहीं से उमानाथ जरा ऊँचे स्वर में श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं, “माँ आपको प्रणाम कर रही हैं।”

श्रीरामकृष्ण हँसने लगे। उमानाथ कहते हैं, “माँ कह रही हैं, ऐसा आशीर्वाद दीजिए जिससे केशव की बीमारी अच्छी हो जाय।” श्रीरामकृष्ण ने कहा, “माँ आनन्दमयी को पुकारो, दुःख वही दूर कर सकती हैं।” श्रीरामकृष्ण केशव से कहने लगे –

“घर के भीतर इतना न रहा करो। पुत्र-कन्याओं के बीच में रहने से और डूबोगे, ईश्वरीय चर्चा होने पर और अच्छे रहोगे।”

गम्भीर भाव से ये बातें कहकर श्रीरामकृष्ण फिर बालक की तरह हँसने लगे। केशव से कह रहे हैं, “देखूँ, तुम्हारा हाथ देखूँ।” बालक की तरह हाथ लेकर मानो तौल रहे हैं। अन्त में कहने लगे, “नहीं, तुम्हारा हाथ हलका है, खलों का हाथ भारी होता है।” (लोग हँसते हैं।)

उमानाथ दरवाजे से फिर कहने लगे, “माँ कह रही हैं – केशव को आशीर्वाद दीजिए।”

श्रीरामकृष्ण (गम्भीर स्वरों में) – मेरी क्या शक्ति है! वे ही आशीर्वाद देंगी। 'माँ, अपना काम तुम करती हो, लोग कहते हैं, मैं कर रहा हूँ।'