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सर्वकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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६८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२

मैं देखूँ।

सब भक्तों के चटाई पर बैठने के बाद श्रीरामकृष्ण आनन्द से देखने और उनसे बातचीत करने लगे। नरेन्द्र ने साधना की बात छेड़ी।

वीरभाव की साधना कठिन है। सन्तानभाव अतिशुद्ध है।

श्रीरामकृष्ण (नरेन्द्र आदि से) – भक्ति ही सार वस्तु हैं। ईश्वर को प्यार करने से विवेक-वैराग्य आप ही आप आ जाते हैं।

नरेन्द्र – एक बात पूछूँ – क्या औरतों से मिलकर साधना करना तन्त्रों में कहा गया है?

श्रीरामकृष्ण – वे सब अच्छे रास्ते नहीं; बड़े कठिन हैं, और उनसे प्रायः पतन हुआ करता है। तीन प्रकार की साधनाएँ हैं – वीरभाव, दासीभाव और मातृभाव। मेरी मातृभाव की साधना है। दासीभाव भी अच्छा है। वीरभाव की साधना बड़ी कठिन है। सन्तानभाव बड़ा शुद्ध भाव है।

नानकपन्थी साधुओ ने आकर श्रीरामकृष्ण को 'नमो नारायण' कहकर अभिवादन किया। श्रीरामकृष्ण ने उनसे बैठने को कहा।

ईश्वर के लिए सभी कुछ सम्भव है

श्रीरामकृष्ण कहते हैं – “ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं। उनका यथार्थ स्वरूप कोई नहीं बता सकता। सभी सम्भव है। दो योगी थे, ईश्वर की साधना करते थे। नारद ऋषि जा रहे थे। उनका परिचय पाकर एक ने कहा 'तुम नारायण के पास से आते हो? वे क्या कर रहे हैं?' नारदजी ने कहा, 'मैं देख आया कि वे एक सुई के छेद में ऊँट-हाथी घुसाते हैं और फिर निकालते हैं।' उस पर एक ने कहा, 'इसमें आश्चर्य ही क्या है? उनके लिए सभी सम्भव है।' पर दूसरे ने कहा, 'भला ऐसा कभी हो सकता है? तुम वहाँ गए ही नहीं।'

दिन के नौ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हैं। कोन्नगर से मनोमोहन सपरिवार आए हैं। उन्होंने प्रणाम करके कहा, “इन्हें कलकत्ते ले जा रहा हूँ!” कुशल प्रश्न पूछने के बाद श्रीरामकृष्ण ने कहा, “आज माह का पहला दिन है और तुम तो कलकत्ते जा रहे हो; – क्या जाने कहीं कुछ खराबी न हो!” यह कहकर जरा हँसे और दूसरी बात कहने लगे।

नरेन्द्र को मग्न होकर ध्यान करने का उपदेश

नरेन्द्र और उनके मित्र स्नान करके आए। श्रीरामकृष्ण ने व्यग्र होकर नरेन्द्र से कहा, “जाओ, बट के नीचे जाकर ध्यान करो। आसन दूँ?”