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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद २६

परिच्छेद २६

दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव

(१)

प्रभात में भक्तों के साथ

कालीमन्दिर में आज श्रीरामकृष्ण का जन्मोत्सव है। फाल्गुन की शुक्ला द्वितीया है, दिन रविवार, ११ मार्च १८८३ ई.। आज श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त उन्हें लेकर जन्मोत्सव मनायेंगे।

सबेरे से भक्त एक एक करके एकत्र हो रहे हैं। सामने माता भवतारिणी का मन्दिर है। मंगलारती के बाद ही प्रभाती रागिणी में मधुर तान लगाती हुई नौबत बज रही है। वसन्त का सुहावना मौसम है, लता-वृक्ष नये कोमल पल्लवों से लहराते हुए दीख पड़ते हैं। इधर श्रीरामकृष्ण के जन्मदिन की याद करके भक्तों के हृदय में आनन्द-सिन्धु उमड़ रहा है। चारों ओर आनन्द-समीरण बह रहा है। मास्टर ने देखा, इतने सबेरे ही भवनाथ, राखाल, भवनाथ के मित्र कालीकृष्ण आ गये हैं। श्रीरामकृष्ण पूर्ववाले बरामदे में बैठे हुए इनसे प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं। मास्टर ने श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – “तुम आये हो! (भक्तों से) लज्जा, घृणा, भय इन तीनों के रहते काम सिद्ध नहीं होता। आज कितना आनन्द होगा! परन्तु जो लोग भगवन्नाम में मत्त होकर नृत्य-गीत न कर सकेंगे, उनका कहीं कुछ न होगा। ईश्वरी चर्चा में कैसी लज्जा और कैसा भय? अच्छा, अब तुम लोग गाओ।”

भवनाथ और कालीकृष्ण गा रहे हैं। गीत इस आशय का है : –

“हे आनन्दमय! आज का दिन धन्य है! हम सब तुम्हारे सत्य-धर्म का भारत में प्रचार करेंगे। हरएक हृदय में तुम्हीं विराजित हो, चारों ओर तुम्हारे ही पवित्र नाम की ध्वनि गूँजती है, भक्त-समाज तुम्हारी स्तुति करते हैं। हे प्रभो, हमें धन, जन और मान न चाहिए, दूसरी कामना भी नहीं है, विकल जन तुम्हारी प्रार्थना कर रहे हैं। हे प्रभो, तुम्हारे चरणों में शरण ली तो फिर न विपत्ति में भय है, न मृत्यु में; मुझे तो अमृत मिल गया। तुम्हारी जय हो!”

१५६श्रीरामकृष्णवचनामृत११ मार्च, १८८३

हाथ जोड़कर बैठे हुए मन लगाकर श्रीरामकृष्ण गाना सुन रहे हैं। गाना सुनते सुनते आपका मन सीधे भावराज्य में पहुँच गया है। श्रीरामकृष्ण का मन सूखी दियासलाई है। एक बार घिसने से उद्दीपना होती है। प्राकृत मनुष्यों का मन भीगी दियासलाई है, कितनी ही घिसो पर जलती नहीं, क्योंकि वह विषयासक्त है। श्रीरामकृष्ण बड़ी देर तक ध्यान में लगे हुए हैं। कुछ देर बाद कालीकृष्ण भवनाथ से कुछ कह रहे हैं।

पहले हरिनाम या मजदूरों की शिक्षा

कालीकृष्ण श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उठे। श्रीरामकृष्ण ने विस्मित होकर पूछा, “कहाँ जाओगे?”

भवनाथ – कुछ काम है, इसीलिए वे जा रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – क्या काम है?

भवनाथ – श्रमजीवियों के शिक्षालय में (Baranagore Workingmen's Institute) जा रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – भाग्य ही में नहीं है। आज हरिनाम-कीर्तन में कितना आनन्द होता है, देखा नहीं। उसके भाग्य ही में नहीं था।

(२)

जन्मोत्सव में भक्तों के संग – संन्यासियों के कठिन नियम

दिन के साढ़े-आठ या नौ बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण ने आज गंगा में स्नान नहीं किया, शरीर कुछ अस्वस्थ है। घड़ा भरकर पानी बरामदे में लाया गया। भक्त उनको स्नान करा रहे हैं। नहाते हुए श्रीरामकृष्ण ने कहा, “एक लोटा पानी अलग रख दो।” अन्त में वही पानी सिर पर डाला। आज आप बड़े सावधान हैं, एक लोटे से ज्यादा पानी सिर पर नहीं डाला।

स्नान के बाद मधुर कण्ठ से भगवान् का नाम ले रहे हैं। धोया हुआ कपड़ा पहने, एक-दो भक्तों के साथ आँगन से होते हुए कालीमाता के मन्दिर की ओर जा रहे हैं। मुख से लगातार नाम उच्चारण कर रहे हैं। चितवन बाहर की ओर नहीं है – अण्डे को सेते समय चिड़िया की दृष्टि जिस प्रकार होती है उसी के सदृश हो रही है।

कालीमाता के मन्दिर में जाकर आपने प्रणाम और पूजा की। पूजा का कोई नियम न था – गन्ध-पुष्प कभी माता के चरणों में देते हैं और कभी अपने सिर पर। अन्त में माता का निर्माल्य सिर पर रख भवनाथ से कहा, “यह लो डाब*।” माता का प्रसादी डाब था।


* कच्चा नारियल