श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२८ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १४ | ९९
२८ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १४ | ९९
दो-तीन अँगुठियाँ, मकान की चीजें बड़ी साफ, दीवार पर क्वीन (रानी) की तस्वीर, राजपुत्र की तस्वीर, किसी बड़े आदमी की तस्वीर। मकान चूने से पुता हुआ – कहीं एक दाग तक नहीं। तरह तरह की अच्छी पोशाक। नौकरों के भी वर्दियाँ। – आदि आदि।
“संसारियों के तमोगुण के लक्षण हैं – निद्रा, काम-क्रोध, अहंकार – यही सब।
“और भक्ति का भी सत्त्व है। जिस भक्त में सत्त्वगुण है वह एकान्त में ध्यान करता है। कभी तो वह मसहरी के भीतर ध्यान करता है। लोग समझते हैं कि आप सो रहे हैं, शायद रात को आँख नहीं लगी, इसलिए आज उठने में देर हो रही है। इधर शरीर का ख्याल बस भूख मिटाने तक, साग-पात पाने ही से चल गया। न भोजन में भरमार, न पोशाक में टीम-टाम और न घर में चीजों का जमघट और फिर सतोगुणी भक्त कभी खुशामद करके धन नहीं कमाता।
“भक्ति का रज जिस भक्त को होता है वह तिलक लगाता है, रुद्राक्ष की माला पहनता है, जिसके बीच बीच सोने के दाने जड़े रहते हैं (सब हँसते हैं।) जब पूजा करता है तब पीताम्बर पहन लेता है!”
(३)
क्लैब्यं मास्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप।। (गीता, २।३)
श्रीरामकृष्ण – जिसे भक्ति का तम होता है उसका विश्वास अटूट है। इस प्रकार का भक्त हठपूर्वक ईश्वर से भिड़ जाता है, मानो डाका डालकर धन छीन लेता है। 'मारो, काटो, बाँधो'! इस तरह डाका डालने का भाव है।
नाममाहात्म्य तथा पाप
श्रीरामकृष्ण ऊर्ध्वदृष्टि हैं, प्रेमरस से भरे मधुर कण्ठ से गा रहे हैं, भाव यह है: –
“ 'काली काली' जपते हुए यदि मेरे शरीर का अन्त हो तो गया गंगा-काशी-कांची-प्रभास आदि की परवाह कौन करता है ? हे काली, तुम्हारा भक्त पूजा-सन्ध्यादि नहीं चाहता, सन्ध्या खुद उसकी खोज में फिरती है, पर पता नहीं लगा सकती। दया-व्रत-दान आदि पर उसका मन नहीं जाता। मदन के याग-यज्ञ ब्रह्ममयी के रक्तिम चरणों में होते हैं। काली के नाम का गुण, जिसे देवाधिदेव महादेव पाँचों मुख से गाते हैं, कौन जान सकता है ?
श्रीरामकृष्ण भावोन्मत्त हो मानो अग्निमन्त्र से दीक्षित होकर गाने लगे। गीत का आशय यह है :–
“ 'यदि मैं 'दुर्गा दुर्गा' जपता हुआ मरूँ तो अन्त में इस दीन को, हे शंकरी, देखूँगा तुम कैसे नहीं तारती हो।' ”
श्रीरामकृष्ण – “क्या! मैंने उनका नाम लिया है – मुझे पाप! मैं उनकी सन्तान हूँ
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- उनके ऐश्वर्य का अधिकारी हूँ!” इस प्रकार की जिद चाहिए।
“तमोगुण को ईश्वर की ओर फेर देने से ईश्वर-लाभ होता है। उनसे हठ करो; वे कोई दूसरे तो नहीं, अपने ही तो हैं।
“फिर देखो, यह तमोगुण दूसरों के हित पर लगाया जा सकता है। वैद्य तीन प्रकार के होते हैं; – उत्तम, मध्यम और अधम। जो वैद्य नाड़ी देखकर ‘दवा खा लेना’ कहकर चला जाता है, वह अधम वैद्य है। रोगी ने दवा खाई या नहीं, इसकी खबर वह नहीं लेता। जो वैद्य रोगी को दवा खाने के लिए तरह तरह से समझाता बुझाता है, मीठी बातों से कहता है, ‘अजी दवा नहीं खाओगे तो अच्छे किस तरह होगे! भैया, खा लो, अच्छा मैं खुद खरल करके खिलाता हूँ’, वह मध्यम वैद्य है और जो वैद्य रोगी को किसी तरह दवा न खाते हुए देखकर छाती पर चढ़ बैठ जबरदस्ती दवा खिलाता है, वह उत्तम वैद्य है। यह वैद्यों का तमोगुण है, इस गुण से रोगी का उपकार होता है, अपकार नहीं।
तीन प्रकार के आचार्य
“वैद्यों के समान तीन प्रकार के आचार्य भी हैं। धर्मोपदेश देकर जो शिष्यों की फिर कोई खबर नहीं लेते वे आचार्य अधम हैं। जो शिष्यों के हित के लिए बार बार उन्हें समझाते हैं जिससे कि वे उपदेशों की धारणा कर सकें, बहुत विनय-प्रार्थना करते हैं, प्यार करते हैं, – वे मध्यम आचार्य हैं। और जब शिष्यों को किसी तरह उपदेश न सुनते देख कोई कोई आचार्य बलपूर्वक उन्हें राह पर लाते हैं, तो उन्हें उत्तम आचार्य समझना चाहिए।”
(४)
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। (तैत्तिरीय उपनिषत् २/४)
ब्रह्म का स्वरूप अनिर्वचनीय है
एक ब्राह्मभक्त ने पूछा – ईश्वर साकार हैं या निराकार ?
श्रीरामकृष्ण – उनकी इति नहीं की जा सकती। वे निराकार हैं, फिर साकार भी हैं। भक्तों के लिए वे साकार हैं। जो ज्ञानी हैं – संसार को जिन्होंने स्वप्नवत् मान लिया है, उनके लिए वे निराकार हैं। भक्त का यह विश्वास है कि मैं एक पृथक् सत्ता हूँ तथा संसार एक पृथक सत्ता; इसलिए भक्त के निकट ईश्वर ‘व्यक्ति’ (Personal God) के रूप में आते हैं। ज्ञानी – जैसे वेदान्तवादी – सिर्फ ‘नेति नेति’ विचार करता है। विचार करने पर उसे यह बोध होता है कि मैं मिथ्या हूँ, संसार भी मिथ्या – स्वप्नवत् है। ज्ञानी ब्रह्म को बोधरूप देखता है परन्तु वे क्या हैं, यह मुँह से नहीं कह सकता।
“वे किस तरह हैं, जानते हो ? मानो सच्चिदानन्द समुद्र है जिसका ओर-छोर नहीं।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar