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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

परिच्छेद ७२

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परिच्छेद ७२

दक्षिणेश्वर में राखाल, राम, केदार प्रभृति के साथ

ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में वार्तालाप

(१)

श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठ रहे हैं। कालीमाता के दर्शन के लिए कालीघाट जाएँगे। श्री अधर सेन के घर होकर जायेंगे वहाँ से अधर भी साथ जायेंगे। आज शनिवार, अमावस्या है २९ दिसम्बर, १८८३। दिन के एक बजे का समय होगा।

गाड़ी उनके कमरे के उत्तर के तरफ के बरामदे के पास आकर खड़ी है। मणि गाड़ी के द्वार के पास आकर खड़े हुए।

मणि (श्रीरामकृष्ण से) – क्या मैं भी चलूँ?

श्रीरामकृष्ण – क्यों?

मणि – एक बार कलकत्ते के मकान से होकर आता।

श्रीरामकृष्ण (चिन्तित होकर) – फिर जाओगे? क्यों? यहाँ अच्छे तो हो।

मणि घर लौटेंगे, कुछ घण्टों के लिए; परन्तु श्रीरामकृष्ण की इसके लिए सम्मति नहीं है।

(२)

आज रविवार, ३० दिसम्बर, पूस की शुक्ला प्रतिपदा है। दिन के तीन बजे होंगे। मणि पेड़ के नीचे अकेले टहल रहे हैं। एक भक्त ने आकर कहा, “प्रभु बुलाते हैं।” कमरे में श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। मणि ने जाकर प्रणाम किया और जमीन पर भक्तों के बीच बैठ गए।

कलकत्ते से राम, केदार आदि भक्त आये हुए हैं। उनके साथ एक वेदान्तवादी साधु भी आए हैं। श्रीरामकृष्ण जिस दिन रामचन्द्र का बगीचा देखने गए थे उस दिन उस साधु से भेंट हुई थी। साधु पासवाले बगीचे में एक पेड के नीचे अकेले एक चारपाई पर बैठे हुए थे। राम आज श्रीरामकृष्ण की आज्ञा से उस साधु को अपने साथ लेते आए हैं। साधु ने भी श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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४२० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० दिसम्बर, १८८३

श्रीरामकृष्ण उस साधु के साथ आनन्दपूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं। उन्होंने अपने पास छोटे तख्त पर साधु को बैठाया है। बातचीत हिन्दी में हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – यह सब तुम्हें कैसा जान पड़ता है?

साधु – यह सब स्वप्नवत् है।

श्रीरामकृष्ण – ब्रह्म सत्य और संसार मिथ्या, यही न? अच्छा जी, ब्रह्म कैसा है?

साधु – शब्द ही ब्रह्म है। अनाहत शब्द।

श्रीरामकृष्ण – परन्तु शब्द का प्रतिपाद्य भी तो एक है। क्यों जी?

साधु – वही वाच्य है और वही वाचक भी है।

यह बात सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गए। चित्रवत् स्थिर बैठे हुए हैं। साधु और भक्तगण आश्चर्यचकित होकर श्रीरामकृष्ण की यह समाधि-अवस्था देख रहे हैं। केदार साधु से कह रहे हैं, “यह देखिए, इसे समाधि कहते हैं”।

साधु ने ग्रन्थों में ही समाधि की बात पढ़ी थी। समाधि कैसे होती है, यह उन्होंने कभी नहीं देखा था।

श्रीरामकृष्ण धीरे धीरे अपनी प्राकृत अवस्था में आ रहे हैं। अभी जगन्माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। कहते हैं – “माँ, अच्छा हो जाऊँ, बेहोश न कर देना। साधु के साथ सच्चिदानन्द की बातें करूँगा। सच्चिदानन्द की बातें करते हुए आनन्द मनाऊँगा।”

साधु निर्वाक् होकर देख रहे हैं और ये सब बातें सुन रहे हैं। अब श्रीरामकृष्ण साधु से बातचीत करने लगे। कहते हैं – अब तुम ‘सोऽहम्’ उड़ा दो। अब ‘हम और तुम’ लेकर विलास करें।

जब तक ‘हम’ और ‘तुम’ यह भाव है, तब तक माँ भी हैं। आओ, उन्हें लेकर आनन्द किया जाय। श्रीरामकृष्ण के कथन का शायद यही मर्म है।

कुछ देर इस तरह बातचीत हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण पंचवटी में टहलने चले गए। राम, केदार, मास्टर आदि उनके साथ हैं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – साधु को तुमने कैसा देखा।

केदार – उसका शुष्क ज्ञान है। अभी उसने हण्डी चढ़ायी भर है – अभी चावल नहीं चढ़ाए गए।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है, परन्तु है त्यागी। जिसने संसार को त्याग दिया है, वह बहुत-कुछ आगे बढ़ गया है।

“साधु अभी प्रवर्त्तक है। उन्हें अगर कोई प्राप्त न कर सका, तो उसका कुछ भी नहीं हुआ। जब उनके प्रेम में मस्त हुआ जाता है, तब और कुछ नहीं सुहाता। तब तो – ‘आदरणीय श्यामा माँ को बड़े यत्न से हृदय में धारण किए रहो। मन तू देख और मैं देखूँ, और कोई न देखने पाए।’ ”

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar