श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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सकता ही न था, करधनी पहनी तो भीतर से सरसराकर हवा ऊपर की ओर चढ़ने लगी – देह में सोना छू गया न? जरा देर रखकर उसे खोल डाला। नहीं तो उसे तोड़ डालना पड़ता।
“धनियाखाली का कोईचूर (एक तरह की मिठाई), खानाकुल कृष्णनगर का सरभाजा (एक तरह की मिठाई) खाने की भी इच्छा हुई थी। (सब हँसते हैं।)
“शम्भू के चण्डी-गीत सुनने की इच्छा हुई थी। उसके सुन लेने के बाद फिर राजनारायण के चण्डी-गीतों के सुनने की इच्छा हुई। उसके गीतों को भी मैंने सुना।
“उस समय बहुत से साधु आते थे। इच्छा हुई कि उनकी सेवा के लिए एक अलग भण्डार किया जाय। सेजो बाबू ने वैसा ही किया। उसी भण्डार से साधुओं को सीधा, लकड़ी आदि सब दिया जाता था।
“एक बार जी में आया कि खूब अच्छा जरी का साज पहनूँ और चाँदी की गुड़गुड़ी में तम्बाकू पीऊँ। सेजो बाबू ने नया साज, गुड़गुड़ी सब भेज दिया। साज पहना, गुड़गुड़ी कितनी ही तरह से पीने लगा। एक बार इस ओर से, एक बार उस ओर से – खड़ा होकर और बैठकर। तब मैंने कहा, मन, देख ले, इसी का नाम है चाँदी की गुड़गुड़ी में तम्बाकू पीना। बस इतने से ही गुड़गुड़ी का त्याग हो गया। साज थोड़ी देर में खोल डाला – पैरों से उसे रौंदने लगा – कहा, इसी का नाम है साज! इसी पोशाक के कारण रजोगुण बढ़ता है।”
बलराम के साथ राखाल वृन्दावन में हैं। पहले-पहल वे वृन्दावन की बड़ी तारीफ करके चिट्ठी लिखते थे। मास्टर को चिट्ठी लिखी थी – ‘यह बड़ी अच्छी जगह है – मोर नाचते रहते हैं – और नृत्य गीत, सदा ही आनन्द होता है!’ इसके पश्चात् उन्हें बुखार आया, वृन्दावन का बुखार! श्रीरामकृष्ण को बड़ी चिन्ता रहती है। उनके लिए चण्डी के नाम पर उन्होंने मन्नत की है। श्रीरामकृष्ण राखाल की बातें कर रहे हैं – “यहाँ बैठकर पैर दबाते समय राखाल को पहले-पहल भाव हुआ था। एक भागवती पण्डित इस कमरे में बैठा हुआ भागवत की बातें कह रहा था। उन्हीं बातों को सुन-सुनकर राखाल सिहर-सिहर उठता था। इसके बाद वह बिलकुल स्थिर हो गया।
“दूसरी बार बलराम के घर में भाव हुआ था। भावावेश में लेट गया था।
“राखाल साकार की श्रेणी का है, निराकार की बात सुनकर उठ जायगा।
“उसके लिए मैंने चण्डी की मन्नत की। उसने घर-द्वार सब छोड़कर मेरा सहारा लिया था न? उसकी स्त्री के पास उसे मैं ही भेज दिया करता था, भोग कुछ बाकी रह गया था।
“वृन्दावन से इन्हें लिख रहा है, यह बड़ा अच्छा स्थान है – मोरों का नृत्य हुआ करता है। अब मोरों ने विपत्ति में डाल दिया।
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"वहाँ बलराम के साथ है। अहा, बलराम का क्या स्वभाव है! मेरे लिए उस देश में नहीं जाता। उसके भाई ने उसे मासिक व्यय देना बन्द कर दिया था और लिखा था - 'तुम यहाँ आकर रहो, वाहियात क्यों इतना रुपया खर्च करते हो!' परन्तु उसने उसकी बात नहीं सुनी, मुझे देखने के लिए।
"कैसा स्वभाव है! दिन-रात केवल देवताओं को लेकर रहता है। माली फूलों की माला बनाते ही रहते हैं। रुपये बचेंगे, इस विचार से दो महीने वृन्दावन में रहेगा। दो सौ का मुसहरा पाता है।
"लड़कों को क्यों प्यार करता हूँ? - उनके भीतर कामिनी और कांचन का प्रवेश अब तक नहीं हो पाया। मैं उन्हें नित्यसिद्ध देखता हूँ!
"नरेन्द्र जब पहले-पहल आया, एक मैली चादर ओढ़े हुए था, परन्तु उसका मुँह और उसकी आँखें देखकर जान पड़ता था कि उसके भीतर कुछ है। तब ज्यादा गाने न जानता था। दो एक गाने।
"जब आता था तब घर भर आदमी रहते थे, परन्तु मैं उसी की ओर नजर करके बातचीत करता था। जब वह कहता था - 'इससे भी बातचीत कीजिये' - तब दूसरे लोगों से बातचीत करता था।
"यदु मल्लिक के बगीचे में रोया करता था - उसे देखने के लिए मैं पागल हो गया था। यहाँ भोलानाथ का हाथ पकड़कर मैं रोने लगा! भोलानाथ ने कहा, एक कायस्थ के लड़के के लिए आपको इस तरह का रोना शोभा नहीं देता। मोटे ब्राह्मण ने एक दिन हाथ जोड़कर कहा - 'वह बहुत कम पढ़ा-लिखा है, उसके लिए भी आप इतना रोते हैं?'
"भवनाथ नरेन्द्र की जोड़ी है - दोनों जैसे पति-पत्नी। इसीलिए भवनाथ से मैंने नरेन्द्र के पास ही मकान भाड़े पर लेने को कहा। वे दोनों ही अरूप के दर्जे के हैं।
संन्यासियों का कठिन नियम। लोकशिक्षार्थ त्याग
"मैं लड़कों को मना कर देता हूँ जिससे वे औरतों के पास आया-जाया न करें।
"हरिपद एक घोषाल-औरत के फेर में पड़ा है। वह वात्सल्यभाव करती है। हरिपद बच्चा है, कुछ समझता तो है नहीं, मैंने सुना, हरिपद उसकी गोद में सोता है। और वह अपने हाथ से उसे भोजन कराती है। मैं उससे कह दूँगा, यह सब अच्छा नहीं। इसी वात्सल्यभाव से फिर हीन भाव पैदा हो जाते हैं।
"उन लोगों की वर्तमान साधना आदमी को लेकर की जाती है। आदमी को वे लोग श्रीकृष्ण समझती हैं। वे उसे 'रागकृष्ण' कहती हैं। गुरु पूछता है, 'रागकृष्ण' तुझे मिले? वे कहती हैं हाँ, मिले।
"उसी दिन वह औरत आयी थी। उसकी चितवन का ढंग मैंने देखा, अच्छा नहीं
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हैं। उसी के भावों में उससे कहा, हरिपद के साथ जैसा चाहो करो; परन्तु बुरा भाव न लाना।
“लड़कों की यह साधना की अवस्था है। इस समय केवल त्याग करना चाहिए। संन्यासियों को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। मैं उनसे कहता हूँ, स्त्री अगर भक्त भी हो तो भी उसके पास बैठकर बातचीत न करनी चाहिए। खड़े होकर चाहे कुछ कह लिया जाय। सिद्ध होने पर भी इसी तरह चलना पड़ता है – अपनी सावधानी के लिए भी और लोकशिक्षा के लिए भी। औरतों के आने पर मैं थोड़ी ही देर में कहता हूँ, तुम लोग जाकर देवताओं के दर्शन करो। इससे भी अगर वे न उठीं तो मैं खुद उठ जाता हूँ। मुझे देखकर दूसरे शिक्षा ग्रहण करेंगे।
“अच्छा, ये जो सब लड़के आ रहे हैं, इसका क्या अर्थ है? और तुम लोग जो आ रहे हो, इसका भी क्या अर्थ है? इसके (अपने को दिखाकर) भीतर कुछ है जरूर, नहीं तो आकर्षण फिर कैसे होता?
“उस देश में जब मैं हृदय के घर में था, मुझे वे लोग श्यामबाजार ले गये थे। मैं समझा, गौरांग के भक्त हैं यहाँ। गाँव में घुसने से पहले ही मुझे माँ ने दिखा दिया – साक्षात् गौरांग! फिर वहाँ इतना आकर्षण हुआ कि सात दिन और सात रात लोगों की भीड़ लगी रही। सदा ही कीर्तन और आनन्द मचा हुआ था। इतने आदमी आये कि चार-दीवार और पेड़ों पर भी आदमी चढ़कर बैठे थे।
“मैं नटवर गोस्वामी के यहाँ गया था। वहाँ रातदिन भीड़ लगी रहती। मैं वहाँ से भागकर एक ताँती (जुलाहे) के यहाँ सुबह को बैठा करता था। फिर देखा, थोड़ी ही देर में सब लोग वहाँ भी पहुँच गये थे। सब खोल-करताल ले गये। – फिर ‘तिरकिट्-तिरकिट्’ कर रहे थे। भोजन आदि तीन बजे होता था।
“चारों ओर अफवाह फैल गयी थी कि एक ऐसा आदमी आया है जो सात बार मरकर सातों बार जी उठता है। मुझे सर्दी-गर्मी न हो जाय इस डर से हृदय मुझे बाहर मैदान में घसीट ले जाता था। वहाँ फिर चींटियों की पाँत की तरह आदमी उमड़ चलते थे – फिर वही खोल-करताल और ‘तिरकिट’। हृदय ने खूब फटकारा, कहा – ‘क्या हम लोगों ने कभी कीर्तन सुना नहीं?’
“वहाँ के गोस्वामी झगड़ा करने के लिए आये थे। उन्होंने सोचा था कि ये लोग हमारा चढ़ाव हड़पने के लिए आये हैं। उन्होंने देखा, मैंने एक जोड़ा धोती तो क्या एक ताग सूत भी नहीं लिया। किसी ने कहा ब्रह्मज्ञानी है। इस पर गोस्वामी सब थाह लेने के लिए आये। एक ने पूछा, इनके माला, तिलक क्यों नहीं हैं? उन्हीं में से किसी ने कहा, नारियल का पत्ता आप ही निकलकर गिर गया है। नारियल के पत्तेवाली बात मैंने वहीं सीखी थी। ज्ञान के होने पर उपाधियाँ आप छूट जाती हैं।
“दूर के गाँवों से लोग आकर इकट्ठे होते थे। वे लोग रात को वहीं रहते थे। जिस
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घर में हम लोग थे, उसके आंगन में रात को औरतें सोई हुई थीं। लघुशंका करने के लिए बाहर जा रहा था, उन लोगों ने कहा, पेशाब यहीं (आंगन में ही) करो।
"आकर्षण किसे कहते हैं, यह मैं वहीं समझा था। ईश्वर की लीला में योगमाया की सहायता से आकर्षण होता है, एक तरह का जादू-सा चल जाता है।"
(३)
श्रीरामकृष्ण और श्री राधिका गोस्वामी
दोनों मुखर्जी भाइयों से बातचीत करते हुए दिन के तीन बज गये। श्रीयुत राधिका गोस्वामी ने आकर प्रणाम किया। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को पहली ही बार देखा है। उम्र तीस के भीतर होंगी। गोस्वामी ने आसन ग्रहण किया।
श्रीरामकृष्ण – क्या आप लोग अद्वैत-वंश के हैं? – खानदान का गुण तो होता ही है।
"अच्छे आम के पेड़ में अच्छे ही आम लगते हैं। (सब हँसे।) खराब आम नहीं होते। केवल मिट्टी के गुण से कुछ छोटे-बड़े हो जाते हैं। आपकी क्या राय है?"
गोस्वामी – (विनयपूर्वक) – जी, मैं क्या जानूँ?
श्रीरामकृष्ण – तुम कुछ भी कहो, दूसरे आदमी क्यों छोड़ने लगे?
"ब्राह्मण में चाहे लाख दोष हों परन्तु उसे भरद्वाज गोत्र और शाण्डिल्य गोत्र का समझकर लोग उसकी पूजा करते हैं। (मास्टर से) शंखचीलवाली बात जरा सुना तो दो।"
मास्टर चुपचाप बैठे हुए हैं। यह देखकर श्रीरामकृष्ण स्वयं कह रहे हैं –
"वंश में अगर महापुरुष का जन्म हुआ हो तो वे खींच लेंगे, चाहे लाख दोष भी हों। जब गंधर्वों ने कौरवों को बाँध लिया तब युधिष्ठिर ने उन्हें मुक्त कर दिया। जिस दुर्योधन ने इतनी शत्रुता की थी, जिसके लिए युधिष्ठिर को वनवास भी सहना पड़ा, उसी को उन्होंने मुक्त कर दिया।
"इसके सिवा भेष का भी आदर किया जाता है। भेष देखकर सत्य वस्तु की उद्दीपना होती है। चैतन्य देव ने गधे को भेष पहनाकर साष्टांग प्रणाम किया था।
"शंखचील (सफेद परवाली चील) को देखकर लोग प्रणाम क्यों करते हैं? कंस जब मारने के लिए चला था तब भगवती शंखचील का रूप धारण कर उड़ गयी थीं। इसलिए अब भी जब लोग शंखचील देखते हैं, तो उसे प्रणाम करते हैं।
"चानक के पलटन के भीतर अंग्रेज को आते हुए देखकर सिपाहियों ने सलाम किया। कुँवर सिंह ने मुझे समझाया कि अंग्रेजों का राज्य है, इसीलिए अंग्रेजों को सलामी दी जाती है।
"शाक्तों का तन्त्र मत है। वैष्णवों का पुराण मत। वैष्णव जो साधना करते हैं उसके