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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—४८ देवता—विश्वेदेव

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सूक्त—४८ देवता—विश्वेदेव
कदु प्रियाय धाम्ने मनामहे स्वक्षत्राय स्वयशसे महे वयम्.
आमेन्यस्य रजसो यदभ्र आँ अपो वृणाना वितनोति मायिनी.. (१)
हम सबके प्रिय विद्युत्-संबंधी तेज की स्तुति कब करेंगे? बल एवं यश उसका आधार हैं
एवं वह सबका पूज्य है. वह शक्ति सब ओर से परिमित लगने वाले आकाश में वर्षा का
विस्तार करती है. वह प्रज्ञावती एवं आकाश को ढकने वाली है. (१)
ता अतन्त वयुनं वीरवक्षणं समान्या वृतया विश्वमा रज:.
अपो अपाचीरपरा अपेजते प्र पूर्वाभिस्तिरते देवयुर्जन:.. (२)
क्या उषाएं ऋत्विजों द्वारा धारण करने योग्य ज्ञान का विस्तार करती हैं? वे एक रूप
वाली आवरण शक्ति से सारे संसार को ढक लेती हैं. देवों की अभिलाषा करने वाले लोग
पूर्ववर्तिनी एवं भविष्य में आने वाली उषाओं को छोड़कर सामने उपस्थित वर्तमान उषाओं से
अज्ञान को लांघते हैं. (२)
आ ग्रावभिरहन्येभिरक्तुभिर्वरिष्ठं वज्रमा जिघर्ति मायिनि.
शतं वा यस्य प्रचरन्त्स्वे दमे संवर्तयन्तो वि च वर्तयन्नहा.. (३)
पत्थरों द्वारा रात एवं दिन में तैयार किए गए सोमरस से प्रसन्न होकर इंद्र मायावी वृत्र
को मारने के लिए वज्र को तेज बनाते हैं. इंद्ररूपी सूर्य की सैकड़ों किरणें दिनों को लाती एवं
विदा करती हुई आकाश में घूमती हैं. (३)
तामस्य रीतिं परशोरिव प्रत्यनीकमख्यं भुजे अस्य वर्पस:.
सचा यदि पितुमन्तमिव क्षयं रत्नं दधाति भरहूतये विशे.. (४)
अपने स्वामी का अभिमत पूरा करने वाले परशु के समान हम अग्नि की दीप्ति को
देखते हैं. इस रूपवान् सूर्य की किरणों का वर्णन हम सुख पाने के निमित्त करते हैं. अग्नि देव
हमारे सहायक होकर यज्ञशाला में आते हैं एवं यजमान को अन्न से भरा हुआ घर तथा उत्तम
धन देते हैं. (४)
स जिह्वया चतुरनीक ऋञ्जते चारु वसानो वरुणो यतन्नरिम्.
न तस्य विद्म पुरुषत्वता वयं यतो भग: सविता दाति वार्यम्.. (५)
अग्नि रमणीय तेज को धारण करते हुए अंधकाररूपी शत्रु का नाश करते हैं एवं चारों
दिशाओं में ज्वालारूपी लपटें फैला कर सुशोभित होते हैं. हम पुरुष के समान आचरण करने
वाले अग्नि को नहीं जानते, क्योंकि भगरूपी महान् सविता हमें उत्तम धन देते हैं. (५)
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सूक्त—४९ देवता—विश्वेदेव
देवं वो अद्य सवितारमेषे भगं च रत्नं विभजन्तमायोः.
आ वां नरा पुरुभुजा ववृत्यां दिवेदिवे चिदश्विना सखीयन्.. (१)
तुम यजमानों के कल्याण के लिए हम आज सविता एवं भग के समीप जाते हैं. ये दोनों
यजमानों को धन देते हैं. हे नेता एवं बहुत भोग करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारी मित्रता की
अभिलाषा करते हुए हम प्रतिदिन तुम्हारे सामने जाते हैं. (१)
प्रति प्रयाणमसुरस्य विद्वान्सूक्तैर्देवं सवितारं दुवस्य.
उप ब्रुवीत नमसा विजानञ्ज्र्यैषं च रत्नं विभजन्तमायोः.. (२)
हे अंतरात्मा! तुम शत्रुओं का नाश करने वाले सूर्यदेव को वापस आया जानकर
स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करो. उन्हें मानवों को उत्तम रत्न एवं धन बांटने वाला जानकर हव्य एवं
स्तुतियां समर्पित करो. (२)
अदत्रया दयते वार्याणि पूषा भगो अदितिर्वस्त उस्रः.
इन्द्रो विष्णुर्वरुणो मित्रो अग्निरहानि भद्रा जनयन्त दस्माः.. (३)
पोषणकर्त्ता, सेवा करने योग्य एवं टुकड़े न होने वाले अग्नि अपनी ज्वालाओं द्वारा
उत्तम लकड़ी को खाते हैं एवं तेज का विस्तार करते हैं. इंद्र, विष्णु, वरुण, मित्र, अग्नि आदि
दर्शनीय देवगण हमारे दिवसों को कल्याणमय बनाते हैं. (३)
तन्नो अनर्वा सविता वरूथं तत्सिन्धव इषयन्तो अनु ग्मन्.
उप यद्द्वोचे अध्वरस्य होता रायः स्याम पतयो वाजरत्नाः.. (४)
सविता देव का कोई तिरस्कार नहीं कर पाया. वे हमें उत्तम धन दें. बहती हुई नदियां
उसी धन के लिए गतिशील हों. हम यज्ञ के होता बनकर इसलिए स्तोत्र बोलते हैं कि हम धनों
के स्वामी बनें एवं हमारे पास उत्तम अन्न हो. (४)
प्र ये वसुभ्य ईवदा नमो दुर्ये मित्रे वरुणे सूक्तवाचः.
अवैत्वभ्वं कृणुता वरीयो दिवस्पृथिव्योरवसा मदेम.. (५)
जिन यजमानों ने वसुओं को गतिशील अन्न भेंट किया है एवं मित्र वरुण के प्रति
जिन्होंने स्तुतियां बोली हैं, उन्हें महान् तेज प्राप्त हो. हे देवो! तुम उन्हें श्रेष्ठ सुख दो. हम
धरती और आकाश की रक्षा पाकर प्रसन्न हों. (५)
सूक्त—५० देवता—विश्वेदेव
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विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरी॑त स॒ख्यम्.
विश्वो राय इषुध्यति द्यु॒म्नं वृणीत पुष्यसे.. (१)
सभी मनुष्य सविता देव से मित्रता की याचना करें, सब लोग उनसे धन की कामना करें
एवं पुष्टि के लिए धन पावें. (१)
ते ते देव नेतर्ये चेमाँ अनुशसे.
ते राया ते ह्मा३पृचे सचेमहि सचथ्यैः.. (२)
हे सविता देव! हम यजमान तथा होता आदि अन्य लोग जो स्तुतियां करते हैं, वे सब
तुम्हारी ही हैं. तुम हमारी अभिलाषाएं पूर्ण करो एवं दोनों प्रकार के लोगों को धनी बनाओ.
(२)
अतो न आ नूनतिथिंनतः पत्नीर्दशस्यत.
आरे विश्वं पर्थेष्ठां द्विषो युयोतु यूयुविः.. (३)
अतः इस यज्ञ के नेता एवं अतिथि के समान पूज्य देवों की सेवा करो एवं देवपत्नियों
की सेवा करो. सबको विभक्त करने वाले सविता दूरवर्ती भागों में उपस्थित बैरियों को हमसे
दूर रखें. (३)
यत्र वह्निरभिहितो दुद्रवद्द्रोण्यः पशुः.
नृमणा वीरपस्त्योऽर्णा धीरेव सनिता.. (४)
जिस यज्ञ में यज्ञ को धारण करने वाला एवं यूप से बांधने योग्य पशु यूप के पास जाता
है. उस यज्ञ में यजमान वीर पत्नियां, पुत्र, घर, धरती, धन आदि पाता है. (४)
एष ते देव नेता रथस्पतिः शं रयिः.
शं राये शं स्वस्तय इषः स्तुतो मनामहे देवस्तुतो मनामहे.. (५)
हे सविता देव! तुम्हारा यह रथ धन से युक्त एवं सबका पालन करने वाला है. यह हमारे
लिए सुख प्रदान करे. हम सुख, धन एवं अन्न पाने के लिए स्तुतियां करते हैं. हम स्तुति योग्य
सविता की स्तुति करते हैं. (५)
सूक्त—५१ देवता—विश्वेदेव
अग्ने सुतस्य पीतये विश्वैरूमेभिरा गहि.
देवेभिर्हव्यदातये.. (१)
हे अग्नि! तुम समस्त देवों के साथ सोमरस पीने के लिए हव्यदाता यजमान के पास
आओ. (१)
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ऋतधीतय आ गत सत्यधर्माणो अध्वरम्.
अग्नेः पिबत जिह्वया.. (२)
हे सच्ची स्तुतियों वाले देवो! तुम सत्यधारण करते हो. तुम हमारे यज्ञ में आओ और
अग्निरूपी जीभ से सोमरस पिओ. (२)
विप्रेभिर्विप्र सन्त्य प्रातर्यावभिरा गहि.
देवेभिः सोमपीतये.. (३)
हे मेधावी एवं सेवा करने योग्य अग्नि! तुम प्रातःकाल आने वाले के साथ सोमरस पीने
हेतु आओ. (३)
अयं सोमश्चमू सुतोऽमत्रे परि षिच्यते.
प्रिय इन्द्राय वायवे.. (४)
ये सोमरस एवं उसे निचोड़ने वाले पत्थर हैं. सोमरस निचोड़कर पात्र भरा गया है. यह
इंद्र एवं वायु के लिए प्रिय है. (४)
वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये.
पिबा सुतस्यान्धसो अभि प्रयः.. (५)
हे वायु! तुम हव्य दान करने वाले यजमान के प्रति प्रसन्न होकर सोमरस पीने हेतु आओ
एवं आकर निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (५)
इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हथः.
ताञ्जुषेथामरेपसावभि प्रयः.. (६)
हे वायु! तुम और इंद्र इस सोमरस को पीने की योग्यता रखते हो. तुम निर्बाध होकर
सोमरस का सेवन करो एवं इसी के उद्देश्य से यहां आओ. (६)
सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः.
निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः.. (७)
इंद्र एवं वायु के लिए दही मिला सोमरस तैयार किया है. वह सोम तुम्हारी ओर नीचे
बहने वाली सरिताओं के समान पहुंचे. (७)
सजूर्विश्वेभिर्देवैभिरश्विभ्यामुषसा सजूः.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (८)
हे अग्नि! तुम समस्त देवों के साथ आओ एवं अश्विनीकुमारों तथा उषा के साथ मित्रता
स्थापित करो. तुम यज्ञ में आकर सोमरस द्वारा उसी प्रकार प्रसन्न बनो, जिस प्रकार अत्रि
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ऋषि प्रसन्नता प्राप्त करते हैं. (८)
सजूर्मित्रावरुणाभ्यां सजूः सोमेन विष्णुना.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (९)
हे अग्नि! तुम मित्र, वरुण, सोम एवं विष्णु के साथ आओ तथा यज्ञ में निचोड़ा हुआ
सोमरस पीकर अत्रि ऋषि के समान प्रसन्न बनो. (९)
सजूरादित्यैर्वसुभिः सजूरिन्द्रेण वायुना.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (१०)
हे अग्नि! तुम आदित्य, वसुओं, इंद्र एवं वायु के साथ आओ एवं यज्ञ में निचोड़ा हुआ
सोमरस पीकर अत्रि ऋषि के समान प्रसन्न बनो. (१०)
स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः.
स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना.. (११)
अश्विनीकुमार, भग एवं अदितिदेवी हमारा कल्याण करें. सत्यशील एवं बलदाता पूषा
हमारा कल्याण करें. शोभन ज्ञानसंपन्न धरती-आकाश भी हमारा कल्याण करें. (११)
स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः.
बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः.. (१२)
हम कल्याण के लिए वायु की स्तुति करते हैं. सब लोकों के पालक सोम की भी हम
प्रार्थना करते हैं. हम देवसमूह के साथ बृहस्पति की स्तुति कल्याण के लिए करते हैं.
आदित्यगण हमारा कल्याण करें. (१२)
विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्तस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः.. (१३)
इस यज्ञ के पवित्र दिन सभी देव हमारा कल्याण करें. सभी मनुष्यों के नेता एवं घर देने
वाले अग्नि हमारा कल्याण करें. दीप्तिशाली ऋभुगण हमारी रक्षा एवं कल्याण करें. रुद्र
हमारा कल्याण करें एवं हमें पाप से बचावें. (१३)
स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति.
स्वस्ति न इन्द्राश्चाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृधि.. (१४)
हे मित्रवरुण! हमारा कल्याण करो. हे धन की स्वामिनी एवं मार्ग को हितकर बनाने
वाली देवी! तुम हमारा कल्याण करो. इंद्र तथा अग्नि हमारा कल्याण करें. हे अदिति तुम
हमारा कल्याण करो. (१४)
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सूक्त—५२ देवता—मरुद्गण

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स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव.
पुनर्ददताघ्नता जानता सं गमेमहि.. (१५)
जिस प्रकार सूर्य और चंद्र निर्बाधरूप से अपने मार्ग पर चलते हैं, उसी प्रकार हम भी
कल्याण मार्ग पर चलें. ऐसे बंधुमित्रों से हमारा मिलन हो, जो बहुत दिन से बिछुड़कर भी
क्रोधित नहीं हैं एवं हमारा स्मरण करते हैं. (१५)
सूक्त—५२ देवता—मरुद्गण
प्र श्यावाश्व धृष्णुयार्चा मरुद्भिर्ऋक्वभि:.
ये अद्रोधमनुष्वधं श्रवो मदन्ति यज्ञिया:.. (१)
हे ऋषि श्यावाश्व! तुम धीरतापूर्वक स्तुतिपात्र मरुतों की पूजा करो. वे यज्ञ के पात्र हैं
एवं प्रतिदिन हविरूपी अन्न को निर्बाध रूप में पाकर प्रसन्न होते हैं. (१)
ते हि स्थिरस्य शवस: सखाय: सन्ति धृष्णुया.
ते यामन्ना धृषद्विनस्तमना पान्ति शश्वत:.. (२)
वे धीर हैं एवं स्थिर शक्ति के मित्र हैं. वे मार्ग में भ्रमण करने वाले हैं एवं अपने आप
हमारी संतान की रक्षा करते हैं. (२)
ते स्पन्द्रासो नोक्षणोऽति ष्कन्दन्ति शर्वरी:.
मरुतामधा महो दिवि क्ष्मा च मन्महे.. (३)
गतिशील एवं जल बरसाने वाले मरुद्गण रात्रियों को लांघते हुए हमारे पास आते हैं,
इसी कारण मरुतों का तेज धरती एवं आकाश में व्याप्त तथा स्तुति योग्य है. (३)
मरुत्सु वो दधीमहि स्तोमं यज्ञं च धृष्णुया.
विश्वे ये मानुषा युगा पान्ति मर्त्यं रिष:.. (४)
हे अध्वर्यु एवं होताओ! तुम लोग धीरतापूर्वक मरुतों की स्तुति करते एवं हव्य देते हो.
इसका क्या कारण है? केवल यही कारण है कि वे मनुष्यों को हिंसक शत्रुओं से बचाते हैं.
(४)
अर्हन्तो ये सुदानवो नरो असामिशवस:.
प्र यज्ञं यज्ञियेभ्यो दिवो अर्चा मरुद्द्रय:.. (५)
हे होताओ! पूजा योग्य, शोभन दान वाले, यज्ञकर्म के नेता, पर्याप्त शक्तिशाली यज्ञ के
पात्र एवं दीप्तिशाली मरुतों की अर्चना यज्ञ साधनों द्वारा करो. (५)
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आ रुक्मैरा युधा नर ऋष्वा ऋष्टीरसृक्षत.
अन्वेनाँ अह विद्युतो मरुतो जङ्झतीरिव भानुरर्त त्मना दिवः.. (६)
वर्षा करने वाले महान् मरुद्गण चमकने वाले आभरणों एवं आयुधों से सुशोभित हैं
तथा मेघ का भेदन करने के लिए आयुध चलाते हैं. कल-कल बहने वाले जल के समान
बिजली मरुतों के पीछे चलती है एवं उसका प्रकाश स्वयं ही इधर-उधर फैलता है. (६)
ये वावृधन्त पार्थिवा य उरावन्तरिक्ष आ.
वृजने वा नदीनां सधस्थे वा महो दिवः.. (७)
जो मरुद्गण धरती एवं आकाश में वृद्धि प्राप्त करते हैं, वे नदियों की धाराओं एवं
महान् स्वर्ग के स्थान में उन्नति करें. (७)
शर्धो मारुतमुच्छंस सत्यशवसमृभ्वसम्.
उत स्म ते शुभे नरः प्र स्पन्द्रा युजत त्मना.. (८)
हे स्तोताओ! मरुतों के अत्यंत विस्तृत एवं सत्य पर आधारित उत्तम बल की स्तुति
करो. वर्षा करने वाले मरुद्गण जल बरसाने के लिए अपने आप सबकी रक्षा के विचार से
परिश्रम करते हैं. (८)
उत स्म ते परुष्ण्यामूर्णा वसत शुन्ध्यवः.
उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा.. (९)
परुष्णी नामक नदी में रहने वाले मरुद्गण सबको शुद्ध करने वाले प्रकाश से घिरे रहते
हैं. वे रथ के पहिए की नेमि एवं अपनी शक्ति द्वारा बादल को भेदते हैं. (९)
आपथयो विपथयोऽन्तस्पथा अनुपथाः.
एतेभिर्मह्यं नामाभिर्यज्ञं विष्टार ओहते.. (१०)
अभिमुख चलने वाले, विमुख चलने वाले, प्रतिकूल मार्ग में चलने वाले एवं अनुकूल
मार्ग में चलने वाले इन चारों नामों वाले मरुद्गण विस्तृत होकर हमारे यज्ञ को धारण करें.
(१०)
अधा नरो न्योहतेऽधा नियुते ओहते.
अधा पारावता इति चित्रा रूपाणि दर्शया.. (११)
वर्षा आदि इष्ट कार्यों के नेता देवगण संसार को धारण करते हैं. सबको मिलाने वाले
जगत् को धारण करते हैं. दूरवर्ती आकाश के ग्रह, तारों आदि को धारण करने वाले देवों का
रूप विचित्र एवं दर्शनीय है. (११)
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छन्दः स्तुभः कुभन्यव उत्समा कीरिणो नृतुः.
ते मे के चिन्न तायव ऊमा आसन्दृशि त्विषे.. (१२)
छंदों द्वारा स्तुति करने वाले एवं जल के अभिलाषी स्तोताओं ने मरुतों की प्रार्थना की
एवं प्यासे गोतम के लिए कुआं बनवाया. मरुतों में से कुछ ने चोर के समान छिपकर हमारी
रक्षा की थी एवं कुछ स्पष्ट रूप से हमारी शक्ति बढ़ाने में कारण बने थे. (१२)
य ऋष्वा ऋष्टिविद्युतः कवयः सन्ति वेधसः.
तमृषे मारुतं गणं नमस्या रमया गिरा.. (१३)
हे श्यावाश्व ऋषि! तुम दर्शनीय, विद्युतरूपी आयुध धारण करने वाले, बुद्धिमान् एवं
सबके निर्माता मरुद्गणों की रमणीय वाक्यों द्वारा स्तुति करो. (१३)
अच्छ ऋषे मारुतं गणं दाना मित्रं न योषणा.
दिवो वा धृष्णव ओजसा स्तुता धीभिरिषण्यत.. (१४)
हे ऋषि! तुम हव्य देते हुए एवं स्तुतियां करते हुए मरुतों के समीप आदित्य के समान
जाओ. हे शक्ति द्वारा शत्रुओं को हराने वाले मरुतो! तुम हमारी स्तुतियां सुनकर स्वर्गलोक से
हमारे यज्ञ में आओ. (१४)
नू मन्वान एषां देवाँ अच्छा न वक्षणा.
दाना सचेत सूरिभिर्यामश्रुतेभिरज्जिभिः.. (१५)
स्तोता मरुतों को स्तुति द्वारा शीघ्र प्राप्त करके अन्य देवों को पाने की अभिलाषा नहीं
करते. वे ज्ञानी, शीघ्रगतिशील के रूप में प्रसिद्ध एवं फल देने वाले मरुतों से दान पाते हैं.
(१५)
प्र ये मे बन्ध्वेषे गां वोचन्त सूरयः पृश्निं वोचन्त मातरम्.
अधा पितरमिष्मिणं रुद्रं वोचन्त शिक्वसः.. (१६)
जब मैं अपने बंधुओं को खोज रहा था, तब समर्थ मरुतों ने मुझे बताया कि पृश्नि उनकी
माता है. उन्होंने अन्न के स्वामी रुद्र को अपना पिता बताया. (१६)
सप्त मे सप्त शाकिन एकमेका शता ददुः.
यमुनायामधि श्रुतमुद्राधो गव्यं मृजे नि राधो अश्व्यं मृजे.. (१७)
उनचास संख्या वाले शक्तिशाली मरुतों ने एकत्र होकर मुझे सैकड़ों गाएं दीं. मरुतों
द्वारा दिए गए गोरूप अथवा अश्वरूप धन को हमने गंगा तट पर प्राप्त किया. (१७)
सूक्त—५३ देवता—मरुद्गण
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को वेद जानमेषां को वा पुरा सुम्नेष्वास मरुताम्.
यद्युयुञ्जे किलास्यः.. (१)
इन मरुतों का जन्म कौन जानता है? मरुतों का सुख सर्वप्रथम किसने अनुभव किया?
जब इन्होंने रथ में पृश्नि को जोड़ा था, तब इनकी शक्ति किसने जानी? (१)
ऐतान्नथेषु तस्थुषः कः शुश्राव कथा ययुः.
कस्मै ससुः सुदासे अन्वापय इळाभिर्वृष्टयः सह.. (२)
मरुतों को रथ पर बैठा हुआ किसने सुना था? इनके गमन का ढंग कौन जानता है?
बंधुरूप एवं वर्षाकारक मरुद्गण अन्न लेकर किस दानशील के लिए अवतीर्ण होते हैं? (२)
ते म आहुर्य आययुरप द्युभिर्विभिर्मदे.
नरो मर्या अरेपस इमान्पश्यन्निति ष्टुहि.. (३)
तेजस्वी घोड़ों पर सवार होकर जो मरुद्गण सोमरस का आनंद प्राप्त करने आए थे,
उन्होंने मुझसे कहा कि वे नेता, मानव हितकारी एवं आसक्तिरहित हैं. हे ऋषि! इस प्रकार के
मरुतों को देखकर उनकी स्तुति करो. (३)
ये अञ्जिषु ये वाशीषु स्वभानवः स्रक्षु खादिषु.
श्रया रथेषु धन्वसु.. (४)
हे मरुतो! तुम्हारे आभरणों, आयुधों, मालाओं, सीने पर पहने जाने वाले गहनों, हाथ-
पैरों एवं उन में पहने जाने वाले कंकणों, रथों एवं धनुषों में जो बल आश्रित है, उसकी हम
स्तुति करते हैं. (४)
युष्माकं स्मा रथाँ अनु मुदे दधे मरुतो जीरदानवः.
वृष्टी द्यावो यतीरिव.. (५)
हे शीघ्र दान करने वाले मरुतो! वर्षा के निमित्त सभी जगह जाने वाली दीप्ति के समान
तुम्हारे रथ को देखकर हम प्रमुदित होते हैं. (५)
आ यं नरः सुदानवो ददाशुषे दिवः कोशमचुच्यवुः.
वि पर्जन्यं सृजन्ति रोदसी अनु धन्वना यन्ति वृष्टयः.. (६)
नेता एवं शोभन दान वाले मरुद्गण हवि देने वाले यजमान के कल्याण के लिए
आकाश से बादल को बरसाते हैं. वे धरती एवं आकाश के कल्याण के लिए बादल को छोड़ते
हैं. वर्षा करने वाले मरुत् सभी जगह जाने वाले जल के साथ गमन करते हैं. (६)
तत्प्रदानाः सिन्धवः क्षोदसा रजः प्र सस्रुर्धेनवो यथा.
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स्यन्ना अश्वा इवाध्वनो विमोचने वि यद्वर्तन्त एन्यः.. (७)
भेदन किए गए बादल से निकली हुई जल-धाराएं वेग के साथ आकाश में इस प्रकार
गमन करती हैं, जिस प्रकार दुधारू गाय दूध देती है. शीघ्रगामी अश्व जिस प्रकार मार्गों पर
चलते हैं, उसी प्रकार नदियां तेजी से बहती हैं. (७)
आ यात मरुतो दिव आन्तरिक्षादमादुत.
माव स्थात परावतः.. (८)
हे मरुतो! तुम अंतरिक्ष, स्वर्ग अथवा इहलोक से यहां आओ. तुम दूरवर्ती स्थान में मत
रहो. (८)
मा वो रसानितभा कुभा क्रुमुर्मा वः सिन्धुर्नि रीरमत्.
मा वः परि ष्ठात्सरयुः पुरीषिण्यस्मे इत्सुम्नमस्तु वः.. (९)
हे मरुतो! रसा, अनितभा एवं कुभा नाम की नदियां एवं सभी जगह जाने वाली सिंधु
तुम्हें न रोके. जलपूर्ण सरयू नदी तुम्हें न रोके. तुम्हारे आने का सुख हमें प्राप्त हो. (९)
तं वः शर्धं रथानां त्वेषं गणं मारुतं नव्यसीनाम्.
अनु प्र यन्ति वृष्टयः.. (१०)
हे मरुतो! तुम्हारे नवीन रथों के वेग एवं दीप्ति की हम प्रशंसा करते हैं. वर्षा मरुतों के
पीछे-पीछे चलती है. (१०)
शर्धंशर्धं व एषां व्रातंव्रातं गणङ्गणं सुशस्तिभिः.
अनु क्रामेम धीतिभिः.. (११)
हे मरुतो! हम सुंदर स्तुतियों एवं हव्य देने आदि कर्मों द्वारा तुम्हारे बलों, समूहों एवं
गणों के पीछे चलते हैं. (११)
कस्मा अद्य सुजाताय रातहव्याय प्र ययुः.
एना यामेन मरुतः.. (१२)
मरुद्गण आज किस उत्तम हवि देने वाले यजमान के पास अपने रथ द्वारा जाएंगे?
(१२)
येन तोकाय तनयाय धान्यं१ बीजं वहध्वे अक्षितम्.
अस्मभ्यं तद्धत्तन यद्व ईमहे राधो विश्वायु सौभाग्यम्.. (१३)
हे मरुतो! तुम जिस कृपालु मन से हमारे पुत्र-पौत्रों के लिए नष्ट न होने वाले अन्नों के
बीज देते हो, उसी मन से हमें भी अन्नों के बीज दो. हम तुमसे पूर्ण आयु एवं सौभाग्ययुक्त धन
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मांगते हैं. (१३)
अतीयाम निदस्तिरः स्वस्तिभिर्हित्त्वावद्यमरातीः.
वृष्ट्वी शं योराप उस्रि भेषजं स्याम मरुतः सह.. (१४)
हे मरुतो! हम कल्याणों द्वारा पाप को त्यागकर निंदक-शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें.
तुम्हारे द्वारा की गई वर्षा से हम सुख, पापों का नाश, जल, गायों एवं ओषधियों को पावें.
(१४)
सुदेवः समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मर्त्यः.
यं त्रायध्वे स्याम ते.. (१५)
हे पूजित एवं नेता मरुतो! तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो, वह अन्य देवों का
कृपापात्र एवं उत्तम पुत्र-पौत्रों वाला बनता है. हम तुम्हारे सेवक इसी प्रकार बनें. (१५)
स्तुहि भोजांत्स्तुवतो अस्य यामनि रणन्गावो न यवसे.
यतः पूर्वाँ इव सखीँरनु ह्वय गिरा गृणीहि कामिनः.. (१६)
हे ऋषि! स्तुति करने वाले इस यजमान के यज्ञ में तुम फल देने वाले मरुतों की स्तुति
करो. गाएं जैसे घास चरने के लिए चलती हुई प्रसन्न होती हैं, उसी प्रकार मरुत् प्रसन्न हों. तेज
चलने वाले मरुतों को पुराने मित्र के समान बुलाओ एवं स्तुति की अभिलाषा करने वाले
मरुतों की वचनों से स्तुति करो. (१६)
सूक्त—५४ देवता—मरुद्गण
प्र शर्धाय मारुताय स्वभानव इमां वाचमनजा पर्वतच्युते.
घर्मस्तुभे दिव आ पृष्टयज्वने द्युम्नश्रवसे महि नृम्णमर्चत.. (१)
स्वायत्त, तेज वाले, पर्वतों को च्युत करने वाले, धूप का शोषण करने वाले, स्वर्ग से
आने वाले, रथ के उपरिभाग पर विराजमान एवं तेजस्वी अन्न वाले मरुतों के बल की प्रशंसा
करो तथा उन्हें पर्याप्त अन्न दो. (१)
प्र वो मरुतस्तविषा उदन्यवो वयोवृधो अश्वयुजः परिज्ग्रयः.
सं विद्युता दधति वाशति त्रितः स्वरन्त्यापोऽवना परिज्ग्रयः.. (२)
हे मरुतो! तुम्हारे दीप्त, जगत् की रक्षा के लिए जल के इच्छुक, अन्न की वृद्धि करने
वाले, चलने के लिए रथ में जोड़ने वाले सभी ओर गमनशील, बिजली के साथ संगत होने
वाले व तीन स्थानों में शब्द करने वाले गण प्रकट होते हैं एवं जलराशि धरती पर गिरने लगती
है. (२)
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विद्युन्महसो नरो अश्मदिद्यवो वातत्विषो मरुतः पर्वतच्युतः.

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विद्युन्महसो नरो अश्मदिद्यवो वातत्विषो मरुतः पर्वतच्युतः.
अब्दया चिन्मुहुरा हादुनीवृतः स्तनयदमा रभसा उदोजसः.. (३)
बिजलीरूपी तेज वाले, वर्षा आदि के नेता, पत्थरों के आयुध वाले, दीप्ति प्राप्त करने
वाले, पर्वतों को च्युत करने वाले, बार-बार जल देने वाले, वज्र को प्रेरित करने वाले, मिलकर
गर्जन करने वाले एवं उद्धृत बलसंपन्न मरुद्गण वर्षा के निमित्त प्रकट होते हैं. (३)
व्य१क्तून्रुद्रा व्यहानि शिक्वसो व्य१न्तरिक्षं वि रजांसि धूतयः.
वि यदज्राँ अजथ नाव ईं यथा वि दुर्गाणि मरुतो नाह रिष्यथ.. (४)
हे रुद्रो! तुम रात्रि एवं दिन को प्रकट करो. हे सर्वथा समर्थ मरुतो! तुम अंतरिक्ष तथा
अन्य लोकों को विस्तृत करो. हे कंपाने वाले मरुतो! सागर जिस प्रकार नाव को हिलाता है,
उसी प्रकार तुम बादलों को चंचल बनाओ एवं शत्रुनगरों को नष्ट करो. हे मरुतो! हमारी हिंसा
मत करना. (४)
तद्गीर्यं वो मरुतो महित्वनं दीर्घं ततान सूर्यो न योजनम्.
एता न यामे अगृभीतशोचिषोऽनश्वदां यन्नययातना गिरिम्.. (५)
हे मरुतो! जिस प्रकार सूर्य अपना प्रकाश फैलाते हैं अथवा देवों के घोड़े दूर-दूर तक
जाते हैं, उसी प्रकार स्तोता तुम्हारे बल एवं महत्त्व को दूर तक प्रसिद्ध बनाते हैं. हे मरुतो!
तुमने उस पर्वत को तोड़ा था, जिस में पणियों ने चुराए हुए घोड़े छिपाए थे. (५)
अभ्राजि शर्धो मरुतो यदर्णसं मोषाथ वृक्षं कपनेव वेधसः.
अध स्मा नो अरमतिं सजोषसश्चक्षुरिव यन्तमनु नेषथा सुगम्.. (६)
हे वर्षा करने वाले एवं वृक्षों के समान बादलों को कंपित करने वाले मरुतो! तुम्हारी
शक्ति सुशोभित हो रही है. हे परस्पर प्रीतिसंपन्न मरुतो! जिस प्रकार आंखें मार्ग प्रदर्शन
करती हैं, उसी प्रकार तुम हमें सरल मार्ग से रमणीय धन के समीप पहुंचाओ. (६)
न स जीयते मरुतो न हन्यते न स्रेधति न व्यथते न रिष्यति.
नास्य राय उप दस्यन्ति नोतय ऋषिं वा यं राजानं वा सुषूदथ.. (७)
हे मरुतो! तुम जिस ऋषि या राजा को यज्ञकर्म में लगाते हो, वह दूसरों द्वारा न हारता
है और न मारा जाता है. वह न क्षीण होता है, न कष्ट पाता है और न उसे कोई बाधा पहुंचा
सकता है. उसका धन एवं रक्षा साधन भी कभी समाप्त नहीं होते. (७)
नियुत्वन्तो ग्रामजितो यथा नरोऽर्यमणो न मरुतः कवन्धिनः.
पिन्वन्त्युत्सं यदिनासो अस्वरन्युन्दन्ति पृथिवीं मध्वो अन्धसा.. (८)
नियुत नाम वाले घोड़ों के स्वामी, संयुक्त पदार्थों को पृथक् करने वाले तथा नेता, सूर्य
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के समान तेजस्वी मरुद्गण जल से युक्त होते हैं. वे शक्तिशाली बनकर कुएं, तालाब आदि
निचले स्थानों को जल से भर देते हैं एवं शब्द करते हुए धरती को मधुर जल से सींच देते हैं.
(८)
प्रवत्वतीयं पृथिवी मरुद्भ्यः प्रवत्वती द्यौर्भवति प्रयद्भ्यः.
प्रवत्वतीः पथ्या अन्तरिक्ष्याः प्रवत्वन्तः पर्वता जीरदानवः.. (९)
यह विस्तृत धरती मरुतों के लिए है, विस्तृत स्वर्ग भी गतिशील मरुतों के लिए है.
आकाश का मार्ग मरुतों के चलने के लिए विस्तृत है एवं बादल मरुतों के लिए शीघ्र वर्षा
करते हैं. (९)
यन्मरुतः सभरसः स्वर्णरः सूर्य उदिते मदथा दिवो नरः.
न वोऽश्वाः श्रथयन्ताह सिस्रतः सद्यो अस्याध्वनः पारमश्रुथ.. (१०)
हे समान शक्ति वाले एवं सबके नेता मरुतो! तुम वर्ग के नेता हो. तुम सूर्य निकलने पर
सोमपान करके प्रसन्न होते हो. तुम घोड़े चलाने में शिथिलता नहीं करते एवं तुम सभी लोकों
के मार्ग को पार करते हो. (१०)
अंसेषु व ऋष्टयः पत्सु खादयो वक्षःसु रुक्मा मरुतो रथे शुभः.
अग्निभ्राजसो विद्युतो गभस्त्योः शिप्रा शीर्षसु वितता हिरण्ययीः.. (११)
हे मरुतो! तुम्हारे कंधों पर आयुध, पैरों में कटक, सीने पर हार एवं रथों पर दीप्ति
विराजमान हैं. तुम्हारे हाथों में अग्नि के समान चमकने वाली बिजली तथा शीशों पर विस्तृत
सुनहरी पगड़ी है. (११)
तं नाकमर्यो अगृभीतशोचिषं रुशत्पिप्पलं मरुतो वि धुनुथ.
समच्यन्त वृजनातित्विषन्त यत्स्वरन्ति घोषं विततमृतायवः.. (१२)
हे गतिशील मरुतो! तुम असुरों द्वारा अपहृत न होने वाले तेज से युक्त स्वर्ग एवं
उज्ज्वल जलसमूह को भांति-भांति से चंचल बनाओ. जब तुम हमारे द्वारा दिया हुआ हव्य
पाकर शक्तिशाली बनते हो, अतिशय दीप्ति धारण करते हो एवं जल बरसाना चाहते हो, तब
भयानक रूप से गरजते हो. (१२)
युष्मद्दत्तस्य मरुतो विचेतसो रायः स्याम रथ्यो३ वयस्वतः.
न यो युच्छति तिष्यो३ यथा दिवो३ स्मे रारन्त मरुतः सहस्रिणम्.. (१३)
हे विशिष्ट ज्ञानसंपन्न मरुतो! रथ के स्वामी हम लोग तुम्हारे द्वारा अन्नयुक्त धन प्राप्त
करें. वह धन कभी समाप्त नहीं होता, जैसे आकाश से सूर्य कभी लुप्त नहीं होता. हे मरुतो!
हमें असीमित धनयुक्त बनाकर सुखी करो. (१३)
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यूयं रयिं मरुतः स्पार्हवीरं यूयमृषिमवथ सामविप्रम्.
यूयमर्वन्तं भरताय वाजं यूयं धत्थ राजानं श्रुष्टिमन्तम्.. (१४)
हे मरुतो! तुम अभिलषित पुत्र-पौत्रादि सहित धन हमें दो एवं सोमपान की प्रेरणा देने
वाले ऋषि की रक्षा करो. तुम देवयज्ञ करने वाले राजा श्यावाश्व को संपत्ति दो एवं सुखी
बनाओ. (१४)
तद्वो यामि द्रविणं सद्यऊतयो येना स्वर्ण ततनाम नूँरभि.
इदं सु मे मरुतो हर्यता वचो यस्य तरेम तरसा शतं हिमाः.. (१५)
हे शीघ्र रक्षा करने वाले मरुतो! हम तुमसे धन की याचना करते हैं. उसके द्वारा हम
सूर्यकिरणों के समान अपने परिवार का विस्तार कर सकें. हे मरुतो! तुम इस स्तुति को पसंद
करो, जिससे हम सौ हेमन्तों को पार कर सकें. (१५)
सूक्त—५५ देवता—मरुद्गण
प्रयज्यवो मरुतो भ्राजदृष्टयो बृहद्वयो दधिरे रुक्मवक्षसः.
ईयन्ते अश्वैः सुयमेभिराशुभिः शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (१)
अतिशय यज्ञपात्र, प्रकाशित आयुधों वाले एवं सीने पर सोने के हार पहनने वाले
मरुद्गण अधिक अन्न धारण करते हैं. वे सरलता से वश में होने योग्य एवं तीव्रगति वाले
अश्वों द्वारा वहन किए जाते हैं. मरुतों के रथ जल के पीछे चलते हैं. (१)
स्वयं दधिध्वे तविषीं यथा विद बृहन्महान्त उर्विया वि राजथ.
उतान्तरिक्षं ममिरे व्योजसा शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (२)
हे मरुतो! तुम्हारे ज्ञान की सामर्थ्य असीमित है. तुम स्वयं ही शक्ति धारण करते हो. हे
महान् मरुतो! तुम विस्तृतरूप से सुशोभित बनो एवं अपने तेज से आकाश को भर दो. मरुतों
के रथ जल के पीछे चलते हैं. (२)
साकं जाताः सुभवः साकमुक्षितः श्रिये चिदा प्रतरं वावृधुर्नरः.
विरोकिणः सूर्यस्येव रश्मयः शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (३)
एक साथ उत्पन्न होने वाले महान् मरुत् एक साथ ही वर्षा करते हैं. वे शोभा पाने के
लिए अतिशय प्रवृद्ध हुए हैं. वे सूर्यकिरणों के समान यागादि कर्मों के उत्तम नेता हैं. पानी की
ओर चलने वाले मरुतों के रथ सबसे पीछे रहते हैं. (३)
आभूषेण्यं वो मरुतो महित्वनं दिदृक्षेण्यं सूर्यस्येव चक्षणम्.
उतो अस्माँ अमृतत्वे दधातन शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (४)
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हे मरुतो! तुम्हारी महत्ता प्रशंसनीय है एवं रूप सूर्य के समान सुंदर है. तुम हमें
मरणरहित बनाओ. जल की ओर जाने वाले मरुतों का रथ सबसे पीछे चलता है. (४)
उदीरयथा मरुतः समुद्रतो यूयं वृष्टिं वर्षयथा पुरीषिणः.
न वो दस्रा उप दस्यन्ति धेनवः शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (५)
हे जलयुक्त मरुतो! तुम अंतरिक्ष से जल को प्रेरित करके वर्षा करो. हे शत्रुनाशक
मरुतो! तुम्हारे प्रसन्न करने वाले बादल कभी जलरहित नहीं होते. जल की ओर जाने वाले
मरुतों का रथ सबसे पीछे चलता है. (५)
यदश्वान्धूर्षु पृषतीरयुग्ध्वं हिरण्ययान्प्रत्यत्काँ अमुग्ध्वम्.
विश्वा इत्स्पृधो मरुतो व्यस्यथ शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (६)
हे मरुतो! जब तुम रथों के अग्रभाग में बुंदकियों वाली घोड़ियों को जोड़ते हो, तब सोने
के बने कवचों को उतार देते हो. तुम सभी संग्रामों में विजय प्राप्त करते हो. जल की ओर
जाने वाले मरुतों का रथ सबसे पीछे चलता है. (६)
न पर्वता न नद्यो वरन्त वो यत्राचिध्वं मरुतो गच्छथेदु तत्.
उत द्यावापृथिवी याथना परि शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (७)
हे मरुतो! नदियां अथवा पहाड़ तुम्हें रोकने में समर्थ नहीं हैं. तुम जहां जाना चाहते हो,
वहां अवश्य पहुंच जाते हो. वर्षा करने के लिए तुम धरती-आकाश में फैल जाते हो. जल की
ओर जाने वाले मरुतों का रथ सबसे पीछे चलता है. (७)
यत्पूर्व्यं मरुतो यच्च नूतनं यदुद्यते वसवो यच्च शस्यते.
विश्वस्य तस्य भवथा नवेदसः शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (८)
हे निवासस्थान देने वाले मरुतो! प्राचीन काल में जो यज्ञ किए गए अथवा वर्तमान काल
में किए जा रहे हैं, जो कुछ प्रार्थना या स्तुति की जाती है, तुम उस सबको भली-भांति जानो.
जल की ओर जाने वाले मरुतों का रथ सबसे पीछे चलता है. (८)
मृळत नो मरुतो मा वधिष्टनास्मभ्यं शर्म बहुलं वि यन्तन.
अधि स्तोत्रस्य सख्यस्य गातन शुभं यातामनु रथा अवृत्सत.. (९)
हे मरुतो! हमें सुखी बनाओ. हमें कोप से नष्ट मत करो, अपितु हमारे सुख का विस्तार
करो. हमारी स्तुति सुनकर तुम हमारे प्रति मित्रता का भाव बनाओ. पानी की ओर चलने वाले
मरुतों का रथ सबसे पीछे रहता है. (९)
यूयमस्मान्नयत वस्यो अच्छा निरंहतिभ्यो मरुतो गृणानाः.
जुषध्वं नो हव्यदातिं यजत्रा वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (१०)
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सूक्त—५६ देवता—मरुद्गण

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हे मरुतो! तुम हमें ऐश्वर्य के समीप ले आओ एवं हमारी स्तुतियों से प्रसन्न होकर हमें
पाप से दूर करो. हे यज्ञपात्र मरुतो! तुम हमारा दिया हुआ हव्य स्वीकार करो. हम लोग
विविध संपत्तियों के स्वामी बनें. (१०)
सूक्त—५६ देवता—मरुद्गण
अग्ने शर्धन्तमा गणं पृक्षं रुक्मेभिरञ्जिभिः.
विशो अद्य मरुतामव ह्वये दिवश्चिद्रोचनादधि.. (१)
हे अग्नि! चमकते हुए आभरणों से युक्त एवं शत्रुओं को हराने में कुशल मरुतों के गणों
को आज बुलाओ. हम आज दीप्तिशाली स्वर्ग से अपने सामने उपस्थित होने के लिए मरुतों
को बुलाते हैं. (१)
यथा चिन्मन्यसे हृदा तदिन्मे जग्मुराशसः.
ये ते नेदिष्ठं हवनान्यागमन्तान्वधं भीममन्दृशः.. (२)
हे अग्नि! जिस प्रकार तुम हृदय में मरुतों के प्रति पूजा का भाव रखते हो, उसी प्रकार
वे हमारे समीप शुभकामनाएं लेकर आवें. जो केवल पुकार सुनकर तुम्हारे समीप आ जाते हैं,
ऐसे भयानक दीखने वाले मरुतों को हव्य देकर बढ़ाओ. (२)
मीळहुष्मतीव पृथिवी पराहता मदन्त्येत्यस्मदा.
ऋक्षो न वो मरुतः शिमीवाँ अमो दुध्रो गौरिव भीमयुः.. (३)
धरती पर रहने वाली एवं प्रबल राजा वाली प्रजा जिस प्रकार दूसरे से पीड़ित होकर
अपने स्वामी के समीप जाती है, उसी प्रकार मरुतों का प्रसन्न समूह हमारे पास आता है. हे
मरुतो! तुम्हारा समूह अग्नि के समान कुशल एवं भीषण बैलों से युक्त गौ के समान दुर्धर्ष हो.
(३)
नि ये रिणन्त्योजसा वृथा गावो न दुर्धुरः.
अश्मानं चित्स्वर्यं१ पर्वतं गिरिं प्र च्यावयन्ति यामभिः.. (४)
मरुद्गण दुर्धर्ष बैल के समान अपने ही ओज से शत्रुओं का नाश करते हैं. वे गरजने
वाले, व्याप्त एवं जलवर्षा द्वारा संसार को प्रसन्न करने वाले मेघों को अपने गमन द्वारा बरसने
को विवश करते हैं. (४)
उत्तिष्ठ नूनमेषां स्तोमैः समुक्षितानाम्. मरुतां पुरुतममपूर्व्यं गवां सर्गमिव ह्वये.. (५)
हे मरुतो! उठो. हम स्तोत्रों द्वारा उन्नति प्राप्त, अतिशय महान् व जलराशि के समान
अपूर्व मरुतों को बुलाते हैं. (५)
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युङ्ग्ध्वं ह्यरुषी रथे युङ्ग्ध्वं रथेपु रोहितः.
युङ्ग्ध्वं हरी अजिरा धुरि वोळ्हवे वहिष्ठा धुरि वोळ्हवे.. (६)
हे मरुतो! तुम अपने रथों में चमकीले रंग की घोड़ियों अथवा लाल रंग के घोड़ों को
जोड़ो. बोझा ढोने में मजबूत हरि नामक शीघ्रगामी घोड़ों को तुम बोझा ढोने में लगाओ. (६)
उत स्य वाज्यरुषस्तुविष्वाणिरिह स्म धायि दर्शतः.
मा वो यामेषु मरुतश्चिरं करतप्र तं रथेषु चोदत.. (७)
हे मरुतो! तुम्हारे रथ में जुड़े हुए दीप्तिशाली, जोर से शब्द करने वाले एवं सुंदर घोड़े
तुम्हारे द्वारा इस प्रकार से हांके जाते हैं कि तुम्हारी यात्रा में विलंब नहीं करते. (७)
रथं नु मारुतं वयं श्रवस्युमा हुवामहे.
आ यस्मिन्तस्थौ सुरणानि बिभ्रती सचा मरुत्सु रोदसी.. (८)
हम लोग मरुतों के उस अन्नपूर्ण रथ का आह्वान करते हैं, जिस रथ में रमणीय जलों को
धारण करने वाली मरुतों की माता बैठती है. (८)
तं वः शर्धं रथेशुभं त्वेषं पनस्युमा हुवे.
यस्मिन्त्सुजाता सुभगा महीयते सचा मरुत्सु मीळ्हुषी.. (९)
हे मरुतो! हम सुशोभित, दीप्त, स्तुतियोग्य तुम्हारे उस रथ का आह्वान करते हैं, जिस में
शोभन उत्पत्ति वाली व सौभाग्य वाली मरुन्माता विराजती है. (९)
सूक्त—५७ देवता—मरुद्गण
आ रुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषसो हिरण्यरथाः सुविताय गन्तन.
इयं वो अस्मत्प्रति हर्यते मतिस्तृष्णाजे न दिव उत्सा उदन्यवे.. (१)
हे इंद्र से युक्त, परस्पर प्रीति संपन्न, सोने के रथों पर बैठे हुए एवं रुद्रपुत्र मरुतो! तुम
सरल गमन वाले हमारे यज्ञ में आओ. हमारी स्तुति तुम्हारी कामना करती है. जिस प्रकार
तुमने प्यासे एवं जल चाहने वाले गोतम के पास स्वर्ग से आकर जल पहुंचाया था, उसी प्रकार
तुम हमारे समीप आओ. (१)
वाशीमन्त ऋष्टिमन्तो मनीषिणः सुधन्वान इषुमन्तो निष्षङ्गिणः.
स्वश्वाः स्थ सुरथा पृश्निमातरः स्वायुधा मरुतो याथना शुभम्.. (२)
हे भक्षण साधनयुक्त, छुरी वाले, मनस्वी, शोभन-धनुष के स्वामी, बाणों वाले, तूणीर
वाले, शोभन अश्व एवं रथ वाले मरुतो! तुम लोग शोभन आयुध धारण करो. हे पृश्निपुत्र
मरुतो! तुम हमारे कल्याण के लिए आगमन करो. (२)
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धुनुथ द्यां पर्वतान्दाशुषे वसु नि वो वना जिहते यामनो भिया.

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धुनुथ द्यां पर्वतान्दाशुषे वसु नि वो वना जिहते यामनो भिया.
कोपयथ पृथिवीं पृश्निमातरः शुभे यद्गुग्राः पृषतीरयुग्ध्वम्.. (३)
हे मरुतो! तुम आकाश में बादलों को इधर-उधर बिखेरो तथा हवि देने वाले यजमान को
धन दो. तुम्हारे आने के डर से वन कांपने लगते हैं. हे उग्र एवं पृश्निपुत्र मरुतो! वर्षा द्वारा
धरती को विचलित करो. तुम अपने रथ में बुंदकियों वाली घोड़ियां जोड़ते हो. (३)
वातत्विषो मरुतो वर्षनिर्णिजो यमाइव सुसदृशः सुपेशसः.
पिशङ्गाश्वा अरुणाश्वा अरेपसः प्रत्वक्षसो महिना द्यौरिवोरवः.. (४)
मरुद्गण सदा दीप्तिसंपन्न, वर्षाकारक, अश्विनीकुमारो के समान शोभन सादृश्य वाले,
शोभनरूप, पीले घोड़ों वाले, लाल रंग के घोड़ों के स्वामी, पापरहित, शत्रुनाशकर्त्ता एवं
आकाश के समान विस्तृत हैं. (४)
पुरुद्रप्सा अञ्जिमन्तः सुदानवस्त्वेषसन्दृशो अनवभ्रराधसः.
सुजातासो जनुषा रुक्मवक्षसो दिवो अर्का अमृतं नाम भेजिरे.. (५)
अधिक जल से युक्त, आभरणों से सुशोभित, शोभन दानशील, दीप्त आकृति वाले,
क्षयरहित धन के स्वामी, उत्तम जन्म वाले, जन्म से ही सीने पर सोने का हार धारण करने
वाले एवं पूज्य मरुद्गण स्वर्ग से आकर अमृत प्राप्त करते हैं. (५)
ऋष्टयो वो मरुतो अंसयोरधि सह ओजो बाह्वोर्वो बलं हितम्.
नृम्णा शीर्षस्त्वायुधा रथेषु वो विश्वा वः श्रीरधि तनूषु पिपिशे.. (६)
हे मरुतो! तुम्हारे कंधों पर ऋष्टि नामक आयुध, भुजाओं में शत्रुओं को पराजित करने
वाला बल, शीशों पर सुनहरी पगड़ियां, रथों में भांति-भांति के अस्त्र-शस्त्र तथा शरीर में
शोभा विराजमान है. (६)
गोमदश्वावद्रथवत्सुवीरं चन्द्रवद्राधो मरुतो ददा नः.
प्रशस्तिं नः कृणुत रुद्रियासो भक्षीय वोऽवसो दैव्यस्य.. (७)
हे मरुतो! तुम हमें गायों, घोड़ों, रथ, उत्तम संतान एवं सोने से युक्त अन्न दो. हे रुद्रपुत्र
मरुतो! हमें समृद्ध बनाओ. हम तुम्हारी उत्तम रक्षा प्राप्त करें. (७)
हये नरो मरुतो मृळता नस्तुवीमघासो अमृता ऋतज्ञाः.
सत्यश्रुतः कवयो युवानो बृहद् गिरयो बृहदुक्षमाणाः.. (८)
हे नेता, असीमित धन के स्वामी, मरणरहित, जल बरसाने वाले, सत्य के कारण
प्रसिद्ध, मेधावी व तरुण मरुतो! तुम बहुत सी स्तुतियों के विषय एवं अधिक वर्षा करने वाले
हो. (८)
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सूक्त—५८ देवता—मरुद्गण
तमु नूनं तविषीमन्तमेषां स्तुषे गणं मारुतं नव्यसीनाम्.
य आश्वश्वा अमवद्वहन्त उतेशिर अमृतस्य स्वराजः.. (१)
आज हम मरुतों के तेजस्वी, स्तुतियोग्य, अत्यंत नवीन, शीघ्रगामी अश्वों वाले, शक्ति की
अधिकता के कारण सब जगह पहुंचने वाले, जल के स्वामी एवं प्रभासंपन्न गण की स्तुति
करते हैं. (१)
त्वेषं गणं तवसं खादिहस्तं धुनिव्रतं मायिनं दातिवारम्.
मयोभुवो ये अमिता महित्वा वन्दस्व विप्र तुविराधसो नॄन्.. (२)
हे होता! तुम दीप्तिशाली, शक्तिसंपन्न, कंकणों से सुशोभित हाथों वाले, सबको कंपित
करने वाले, ज्ञानयुक्त एवं धन देने वाले मरुतों की स्तुति करो. सुख देने वाले, असीमित
ऐश्वर्यसंपन्न अधिक धन वाले एवं नेता मरुतों की वंदना करो. (२)
आ वो यन्तूदवाहासो अद्य वृष्टिं ये विश्वे मरुतो जुनन्ति.
अयं यो अग्निम॑रुतः समिद्ध एतं जुषध्वं कवयो युवानः.. (३)
सब जगह व्याप्त, वर्षा को प्रेरित करने वाले एवं जल को ढोने वाले मरुत् आज हमारे
पास आवें. हे मेधावी एवं युवक मरुतो! इस प्रज्वलित अग्नि के द्वारा तुम लोग प्रसन्न बनो.
(३)
यूयं राजानमिर्यं जनाय विभवतष्टं जनयथा यजत्राः.
युष्मदेति मुष्टिहा बाहुजूतो युष्मत्सद्श्वो मरुतः सुवीरः.. (४)
हे यज्ञपात्र मरुतों तुम यजमान को ऐसा पुत्र दो जो शत्रुओं को पतित करने वाला व
विभु नामक देवता द्वारा निर्मित हो. हे मरुतो! तुमसे प्राप्त होने वाला पुत्र स्वभुजबल से
शत्रुनाशक, शत्रुओं पर हाथ उठाने वाला, अगणित अश्वों का स्वामी एवं शोभन शक्ति वाला
हो. (४)
अरा इवेदचरमा अहेव प्रप्र जायन्ते अकवा महोभिः.
पृश्नेः पुत्रा उपमासो रभिष्ठाः स्वया मत्या मरुतः सं मिमिक्षुः.. (५)
हे मरुतो! तुम सब रथचक्र के अरों के समान एक साथ ही उत्पन्न हुए हो एवं दिनों के
समान एक बराबर हो. पृश्नि के पुत्र उत्कृष्ट हैं एवं तेज से उत्पन्न हुए हैं. तीव्र गति वाले
मरुद्गण अपनी ही प्रेरणा से भली प्रकार जल बरसाते हैं. (५)
यत्प्रायासिष्ट पृषतीभिरश्वैर्वीळुपविभिर्मरुतो रथेभिः.
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क्षोदन्त आपो रिणते वनान्यवोस्त्रियो वृषभः क्रन्दतु द्यौः.. (६)
हे मरुतो! जब तुम बुंदकियों वाली घोड़ियों द्वारा खींचे जाने वाले एवं मजबूत पहियों
वाले रथ पर बैठकर आते हो, तब जल बरसता है, वनों के वृक्ष टूट जाते हैं, सूर्यकिरणों द्वारा
निर्मित एवं बरसने वाला बादल नीचे की ओर मुंह करके गरजता है. (६)
प्रथिष्ट यामन्पृथिवी चिदेषां भर्तेव गर्भं स्वमिच्छवो धुः.
वातान्ह्याश्वान्धुर्यायुयुज्रे वर्षं स्वेदं चक्रिरे रुद्रियासः.. (७)
मरुतों के आने से धरती उपजाऊ बनती है. जिस प्रकार पति पत्नी में गर्भ धारण करता
है, उसी प्रकार मरुद्गण धरती में अपना गर्भ रखते हैं. रुद्रपुत्र मरुत् तेज चलने वाले घोड़ों को
अपने रथ के जुए में जोड़कर वर्षारूपी पसीना उत्पन्न करते हैं. (७)
हये नरो मरुतो मृळता नस्तुवीमघासो अमृता ऋतज्ञाः.
सत्यश्रुतः कवयो युवानो बृहद् गिरयो बृहदुक्षमाणाः.. (८)
हे नेता, असीमित धन के स्वामी, मरणरहित, जल बरसाने वाले, सत्य के कारण
प्रसिद्ध, मेधावी एवं तरुण मरुतो! तुम बहुत सी स्तुतियों के विषय एवं अधिक वर्षा करने
वाले हो. (८)
सूक्त—५९ देवता—मरुद्गण
प्र वः स्पळक्रन्त्सुविताय दावनेऽर्चा दिवे प्र पृथिव्या ऋतं भरे.
उक्षन्ते अश्वान्तरुषन्त आ रजोऽनु स्वं भानुं श्रथयन्ते अर्णवैः.. (१)
हे मरुतो! हव्यदाता तुम्हें हव्य प्राप्त कराने के लिए भली-भांति से स्तुति करते हैं. हे
होता! तुम स्वर्ग की पूजा करो एवं धरती की स्तुतियां बोलो. मरुद्गण दूर-दूर तक पानी
बरसाते हैं, आकाश में सर्वत्र घूमते हैं एवं बादलों के साथ अपना तेज विस्तृत करते हैं. (१)
अमादेषां भियसा भूमिरेजति नौर्न पूर्णा क्षरति व्यथिर्यती.
दूरेदृशो ये चितयन्त एमभिरन्तर्महे विदथे येतिरे नरः.. (२)
मरुतों के भय से धरती इस तरह कांपती है, जिस प्रकार सवारियों से भरी हुई नाव
हिलती हुई चलती है. मरुद्गण दूर दिखाई देने पर भी अपनी गति के कारण मालूम हो जाते
हैं. नेता मरुद्गण धरती-आकाश के बीच में रहकर अधिक हव्य पाने का यत्न करते हैं. (२)
गवामिव श्रियसे शृङ्गमूत्तमं सूर्यो न चक्षू रजसो विसर्जने.
अत्या इव सुभ्व१श्चारवः स्थान मर्या इव श्रियसे चेतथा नरः.. (३)
हे मरुतो! जिस प्रकार गाय के सिर पर उत्तम सींग होते हैं, उसी प्रकार तुम शोभा के
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