ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextके समान तेजस्वी मरुद्गण जल से युक्त होते हैं. वे शक्तिशाली बनकर कुएं, तालाब आदि
निचले स्थानों को जल से भर देते हैं एवं शब्द करते हुए धरती को मधुर जल से सींच देते हैं.
(८)
प्रवत्वतीयं पृथिवी मरुद्भ्यः प्रवत्वती द्यौर्भवति प्रयद्भ्यः.
प्रवत्वतीः पथ्या अन्तरिक्ष्याः प्रवत्वन्तः पर्वता जीरदानवः.. (९)
यह विस्तृत धरती मरुतों के लिए है, विस्तृत स्वर्ग भी गतिशील मरुतों के लिए है.
आकाश का मार्ग मरुतों के चलने के लिए विस्तृत है एवं बादल मरुतों के लिए शीघ्र वर्षा
करते हैं. (९)
यन्मरुतः सभरसः स्वर्णरः सूर्य उदिते मदथा दिवो नरः.
न वोऽश्वाः श्रथयन्ताह सिस्रतः सद्यो अस्याध्वनः पारमश्रुथ.. (१०)
हे समान शक्ति वाले एवं सबके नेता मरुतो! तुम वर्ग के नेता हो. तुम सूर्य निकलने पर
सोमपान करके प्रसन्न होते हो. तुम घोड़े चलाने में शिथिलता नहीं करते एवं तुम सभी लोकों
के मार्ग को पार करते हो. (१०)
अंसेषु व ऋष्टयः पत्सु खादयो वक्षःसु रुक्मा मरुतो रथे शुभः.
अग्निभ्राजसो विद्युतो गभस्त्योः शिप्रा शीर्षसु वितता हिरण्ययीः.. (११)
हे मरुतो! तुम्हारे कंधों पर आयुध, पैरों में कटक, सीने पर हार एवं रथों पर दीप्ति
विराजमान हैं. तुम्हारे हाथों में अग्नि के समान चमकने वाली बिजली तथा शीशों पर विस्तृत
सुनहरी पगड़ी है. (११)
तं नाकमर्यो अगृभीतशोचिषं रुशत्पिप्पलं मरुतो वि धुनुथ.
समच्यन्त वृजनातित्विषन्त यत्स्वरन्ति घोषं विततमृतायवः.. (१२)
हे गतिशील मरुतो! तुम असुरों द्वारा अपहृत न होने वाले तेज से युक्त स्वर्ग एवं
उज्ज्वल जलसमूह को भांति-भांति से चंचल बनाओ. जब तुम हमारे द्वारा दिया हुआ हव्य
पाकर शक्तिशाली बनते हो, अतिशय दीप्ति धारण करते हो एवं जल बरसाना चाहते हो, तब
भयानक रूप से गरजते हो. (१२)
युष्मद्दत्तस्य मरुतो विचेतसो रायः स्याम रथ्यो३ वयस्वतः.
न यो युच्छति तिष्यो३ यथा दिवो३ स्मे रारन्त मरुतः सहस्रिणम्.. (१३)
हे विशिष्ट ज्ञानसंपन्न मरुतो! रथ के स्वामी हम लोग तुम्हारे द्वारा अन्नयुक्त धन प्राप्त
करें. वह धन कभी समाप्त नहीं होता, जैसे आकाश से सूर्य कभी लुप्त नहीं होता. हे मरुतो!
हमें असीमित धनयुक्त बनाकर सुखी करो. (१३)
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