ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त—५८ देवता—मरुद्गण
तमु नूनं तविषीमन्तमेषां स्तुषे गणं मारुतं नव्यसीनाम्.
य आश्वश्वा अमवद्वहन्त उतेशिर अमृतस्य स्वराजः.. (१)
आज हम मरुतों के तेजस्वी, स्तुतियोग्य, अत्यंत नवीन, शीघ्रगामी अश्वों वाले, शक्ति की
अधिकता के कारण सब जगह पहुंचने वाले, जल के स्वामी एवं प्रभासंपन्न गण की स्तुति
करते हैं. (१)
त्वेषं गणं तवसं खादिहस्तं धुनिव्रतं मायिनं दातिवारम्.
मयोभुवो ये अमिता महित्वा वन्दस्व विप्र तुविराधसो नॄन्.. (२)
हे होता! तुम दीप्तिशाली, शक्तिसंपन्न, कंकणों से सुशोभित हाथों वाले, सबको कंपित
करने वाले, ज्ञानयुक्त एवं धन देने वाले मरुतों की स्तुति करो. सुख देने वाले, असीमित
ऐश्वर्यसंपन्न अधिक धन वाले एवं नेता मरुतों की वंदना करो. (२)
आ वो यन्तूदवाहासो अद्य वृष्टिं ये विश्वे मरुतो जुनन्ति.
अयं यो अग्निम॑रुतः समिद्ध एतं जुषध्वं कवयो युवानः.. (३)
सब जगह व्याप्त, वर्षा को प्रेरित करने वाले एवं जल को ढोने वाले मरुत् आज हमारे
पास आवें. हे मेधावी एवं युवक मरुतो! इस प्रज्वलित अग्नि के द्वारा तुम लोग प्रसन्न बनो.
(३)
यूयं राजानमिर्यं जनाय विभवतष्टं जनयथा यजत्राः.
युष्मदेति मुष्टिहा बाहुजूतो युष्मत्सद्श्वो मरुतः सुवीरः.. (४)
हे यज्ञपात्र मरुतों तुम यजमान को ऐसा पुत्र दो जो शत्रुओं को पतित करने वाला व
विभु नामक देवता द्वारा निर्मित हो. हे मरुतो! तुमसे प्राप्त होने वाला पुत्र स्वभुजबल से
शत्रुनाशक, शत्रुओं पर हाथ उठाने वाला, अगणित अश्वों का स्वामी एवं शोभन शक्ति वाला
हो. (४)
अरा इवेदचरमा अहेव प्रप्र जायन्ते अकवा महोभिः.
पृश्नेः पुत्रा उपमासो रभिष्ठाः स्वया मत्या मरुतः सं मिमिक्षुः.. (५)
हे मरुतो! तुम सब रथचक्र के अरों के समान एक साथ ही उत्पन्न हुए हो एवं दिनों के
समान एक बराबर हो. पृश्नि के पुत्र उत्कृष्ट हैं एवं तेज से उत्पन्न हुए हैं. तीव्र गति वाले
मरुद्गण अपनी ही प्रेरणा से भली प्रकार जल बरसाते हैं. (५)
यत्प्रायासिष्ट पृषतीभिरश्वैर्वीळुपविभिर्मरुतो रथेभिः.
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