ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयुङ्ग्ध्वं ह्यरुषी रथे युङ्ग्ध्वं रथेपु रोहितः.
युङ्ग्ध्वं हरी अजिरा धुरि वोळ्हवे वहिष्ठा धुरि वोळ्हवे.. (६)
हे मरुतो! तुम अपने रथों में चमकीले रंग की घोड़ियों अथवा लाल रंग के घोड़ों को
जोड़ो. बोझा ढोने में मजबूत हरि नामक शीघ्रगामी घोड़ों को तुम बोझा ढोने में लगाओ. (६)
उत स्य वाज्यरुषस्तुविष्वाणिरिह स्म धायि दर्शतः.
मा वो यामेषु मरुतश्चिरं करतप्र तं रथेषु चोदत.. (७)
हे मरुतो! तुम्हारे रथ में जुड़े हुए दीप्तिशाली, जोर से शब्द करने वाले एवं सुंदर घोड़े
तुम्हारे द्वारा इस प्रकार से हांके जाते हैं कि तुम्हारी यात्रा में विलंब नहीं करते. (७)
रथं नु मारुतं वयं श्रवस्युमा हुवामहे.
आ यस्मिन्तस्थौ सुरणानि बिभ्रती सचा मरुत्सु रोदसी.. (८)
हम लोग मरुतों के उस अन्नपूर्ण रथ का आह्वान करते हैं, जिस रथ में रमणीय जलों को
धारण करने वाली मरुतों की माता बैठती है. (८)
तं वः शर्धं रथेशुभं त्वेषं पनस्युमा हुवे.
यस्मिन्त्सुजाता सुभगा महीयते सचा मरुत्सु मीळ्हुषी.. (९)
हे मरुतो! हम सुशोभित, दीप्त, स्तुतियोग्य तुम्हारे उस रथ का आह्वान करते हैं, जिस में
शोभन उत्पत्ति वाली व सौभाग्य वाली मरुन्माता विराजती है. (९)
सूक्त—५७ देवता—मरुद्गण
आ रुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषसो हिरण्यरथाः सुविताय गन्तन.
इयं वो अस्मत्प्रति हर्यते मतिस्तृष्णाजे न दिव उत्सा उदन्यवे.. (१)
हे इंद्र से युक्त, परस्पर प्रीति संपन्न, सोने के रथों पर बैठे हुए एवं रुद्रपुत्र मरुतो! तुम
सरल गमन वाले हमारे यज्ञ में आओ. हमारी स्तुति तुम्हारी कामना करती है. जिस प्रकार
तुमने प्यासे एवं जल चाहने वाले गोतम के पास स्वर्ग से आकर जल पहुंचाया था, उसी प्रकार
तुम हमारे समीप आओ. (१)
वाशीमन्त ऋष्टिमन्तो मनीषिणः सुधन्वान इषुमन्तो निष्षङ्गिणः.
स्वश्वाः स्थ सुरथा पृश्निमातरः स्वायुधा मरुतो याथना शुभम्.. (२)
हे भक्षण साधनयुक्त, छुरी वाले, मनस्वी, शोभन-धनुष के स्वामी, बाणों वाले, तूणीर
वाले, शोभन अश्व एवं रथ वाले मरुतो! तुम लोग शोभन आयुध धारण करो. हे पृश्निपुत्र
मरुतो! तुम हमारे कल्याण के लिए आगमन करो. (२)
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