ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 845 of 1855
Read in contextऋषि प्रसन्नता प्राप्त करते हैं. (८)
सजूर्मित्रावरुणाभ्यां सजूः सोमेन विष्णुना.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (९)
हे अग्नि! तुम मित्र, वरुण, सोम एवं विष्णु के साथ आओ तथा यज्ञ में निचोड़ा हुआ
सोमरस पीकर अत्रि ऋषि के समान प्रसन्न बनो. (९)
सजूरादित्यैर्वसुभिः सजूरिन्द्रेण वायुना.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (१०)
हे अग्नि! तुम आदित्य, वसुओं, इंद्र एवं वायु के साथ आओ एवं यज्ञ में निचोड़ा हुआ
सोमरस पीकर अत्रि ऋषि के समान प्रसन्न बनो. (१०)
स्वस्ति नो मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वणः.
स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुना.. (११)
अश्विनीकुमार, भग एवं अदितिदेवी हमारा कल्याण करें. सत्यशील एवं बलदाता पूषा
हमारा कल्याण करें. शोभन ज्ञानसंपन्न धरती-आकाश भी हमारा कल्याण करें. (११)
स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः.
बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः.. (१२)
हम कल्याण के लिए वायु की स्तुति करते हैं. सब लोकों के पालक सोम की भी हम
प्रार्थना करते हैं. हम देवसमूह के साथ बृहस्पति की स्तुति कल्याण के लिए करते हैं.
आदित्यगण हमारा कल्याण करें. (१२)
विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्तस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वंहसः.. (१३)
इस यज्ञ के पवित्र दिन सभी देव हमारा कल्याण करें. सभी मनुष्यों के नेता एवं घर देने
वाले अग्नि हमारा कल्याण करें. दीप्तिशाली ऋभुगण हमारी रक्षा एवं कल्याण करें. रुद्र
हमारा कल्याण करें एवं हमें पाप से बचावें. (१३)
स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति.
स्वस्ति न इन्द्राश्चाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृधि.. (१४)
हे मित्रवरुण! हमारा कल्याण करो. हे धन की स्वामिनी एवं मार्ग को हितकर बनाने
वाली देवी! तुम हमारा कल्याण करो. इंद्र तथा अग्नि हमारा कल्याण करें. हे अदिति तुम
हमारा कल्याण करो. (१४)
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