ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 841 of 1855
Read in contextसूक्त—४८ देवता—विश्वेदेव
कदु प्रियाय धाम्ने मनामहे स्वक्षत्राय स्वयशसे महे वयम्.
आमेन्यस्य रजसो यदभ्र आँ अपो वृणाना वितनोति मायिनी.. (१)
हम सबके प्रिय विद्युत्-संबंधी तेज की स्तुति कब करेंगे? बल एवं यश उसका आधार हैं
एवं वह सबका पूज्य है. वह शक्ति सब ओर से परिमित लगने वाले आकाश में वर्षा का
विस्तार करती है. वह प्रज्ञावती एवं आकाश को ढकने वाली है. (१)
ता अतन्त वयुनं वीरवक्षणं समान्या वृतया विश्वमा रज:.
अपो अपाचीरपरा अपेजते प्र पूर्वाभिस्तिरते देवयुर्जन:.. (२)
क्या उषाएं ऋत्विजों द्वारा धारण करने योग्य ज्ञान का विस्तार करती हैं? वे एक रूप
वाली आवरण शक्ति से सारे संसार को ढक लेती हैं. देवों की अभिलाषा करने वाले लोग
पूर्ववर्तिनी एवं भविष्य में आने वाली उषाओं को छोड़कर सामने उपस्थित वर्तमान उषाओं से
अज्ञान को लांघते हैं. (२)
आ ग्रावभिरहन्येभिरक्तुभिर्वरिष्ठं वज्रमा जिघर्ति मायिनि.
शतं वा यस्य प्रचरन्त्स्वे दमे संवर्तयन्तो वि च वर्तयन्नहा.. (३)
पत्थरों द्वारा रात एवं दिन में तैयार किए गए सोमरस से प्रसन्न होकर इंद्र मायावी वृत्र
को मारने के लिए वज्र को तेज बनाते हैं. इंद्ररूपी सूर्य की सैकड़ों किरणें दिनों को लाती एवं
विदा करती हुई आकाश में घूमती हैं. (३)
तामस्य रीतिं परशोरिव प्रत्यनीकमख्यं भुजे अस्य वर्पस:.
सचा यदि पितुमन्तमिव क्षयं रत्नं दधाति भरहूतये विशे.. (४)
अपने स्वामी का अभिमत पूरा करने वाले परशु के समान हम अग्नि की दीप्ति को
देखते हैं. इस रूपवान् सूर्य की किरणों का वर्णन हम सुख पाने के निमित्त करते हैं. अग्नि देव
हमारे सहायक होकर यज्ञशाला में आते हैं एवं यजमान को अन्न से भरा हुआ घर तथा उत्तम
धन देते हैं. (४)
स जिह्वया चतुरनीक ऋञ्जते चारु वसानो वरुणो यतन्नरिम्.
न तस्य विद्म पुरुषत्वता वयं यतो भग: सविता दाति वार्यम्.. (५)
अग्नि रमणीय तेज को धारण करते हुए अंधकाररूपी शत्रु का नाश करते हैं एवं चारों
दिशाओं में ज्वालारूपी लपटें फैला कर सुशोभित होते हैं. हम पुरुष के समान आचरण करने
वाले अग्नि को नहीं जानते, क्योंकि भगरूपी महान् सविता हमें उत्तम धन देते हैं. (५)
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