ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextआ रुक्मैरा युधा नर ऋष्वा ऋष्टीरसृक्षत.
अन्वेनाँ अह विद्युतो मरुतो जङ्झतीरिव भानुरर्त त्मना दिवः.. (६)
वर्षा करने वाले महान् मरुद्गण चमकने वाले आभरणों एवं आयुधों से सुशोभित हैं
तथा मेघ का भेदन करने के लिए आयुध चलाते हैं. कल-कल बहने वाले जल के समान
बिजली मरुतों के पीछे चलती है एवं उसका प्रकाश स्वयं ही इधर-उधर फैलता है. (६)
ये वावृधन्त पार्थिवा य उरावन्तरिक्ष आ.
वृजने वा नदीनां सधस्थे वा महो दिवः.. (७)
जो मरुद्गण धरती एवं आकाश में वृद्धि प्राप्त करते हैं, वे नदियों की धाराओं एवं
महान् स्वर्ग के स्थान में उन्नति करें. (७)
शर्धो मारुतमुच्छंस सत्यशवसमृभ्वसम्.
उत स्म ते शुभे नरः प्र स्पन्द्रा युजत त्मना.. (८)
हे स्तोताओ! मरुतों के अत्यंत विस्तृत एवं सत्य पर आधारित उत्तम बल की स्तुति
करो. वर्षा करने वाले मरुद्गण जल बरसाने के लिए अपने आप सबकी रक्षा के विचार से
परिश्रम करते हैं. (८)
उत स्म ते परुष्ण्यामूर्णा वसत शुन्ध्यवः.
उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा.. (९)
परुष्णी नामक नदी में रहने वाले मरुद्गण सबको शुद्ध करने वाले प्रकाश से घिरे रहते
हैं. वे रथ के पहिए की नेमि एवं अपनी शक्ति द्वारा बादल को भेदते हैं. (९)
आपथयो विपथयोऽन्तस्पथा अनुपथाः.
एतेभिर्मह्यं नामाभिर्यज्ञं विष्टार ओहते.. (१०)
अभिमुख चलने वाले, विमुख चलने वाले, प्रतिकूल मार्ग में चलने वाले एवं अनुकूल
मार्ग में चलने वाले इन चारों नामों वाले मरुद्गण विस्तृत होकर हमारे यज्ञ को धारण करें.
(१०)
अधा नरो न्योहतेऽधा नियुते ओहते.
अधा पारावता इति चित्रा रूपाणि दर्शया.. (११)
वर्षा आदि इष्ट कार्यों के नेता देवगण संसार को धारण करते हैं. सबको मिलाने वाले
जगत् को धारण करते हैं. दूरवर्ती आकाश के ग्रह, तारों आदि को धारण करने वाले देवों का
रूप विचित्र एवं दर्शनीय है. (११)
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