ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextऋतधीतय आ गत सत्यधर्माणो अध्वरम्.
अग्नेः पिबत जिह्वया.. (२)
हे सच्ची स्तुतियों वाले देवो! तुम सत्यधारण करते हो. तुम हमारे यज्ञ में आओ और
अग्निरूपी जीभ से सोमरस पिओ. (२)
विप्रेभिर्विप्र सन्त्य प्रातर्यावभिरा गहि.
देवेभिः सोमपीतये.. (३)
हे मेधावी एवं सेवा करने योग्य अग्नि! तुम प्रातःकाल आने वाले के साथ सोमरस पीने
हेतु आओ. (३)
अयं सोमश्चमू सुतोऽमत्रे परि षिच्यते.
प्रिय इन्द्राय वायवे.. (४)
ये सोमरस एवं उसे निचोड़ने वाले पत्थर हैं. सोमरस निचोड़कर पात्र भरा गया है. यह
इंद्र एवं वायु के लिए प्रिय है. (४)
वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये.
पिबा सुतस्यान्धसो अभि प्रयः.. (५)
हे वायु! तुम हव्य दान करने वाले यजमान के प्रति प्रसन्न होकर सोमरस पीने हेतु आओ
एवं आकर निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (५)
इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हथः.
ताञ्जुषेथामरेपसावभि प्रयः.. (६)
हे वायु! तुम और इंद्र इस सोमरस को पीने की योग्यता रखते हो. तुम निर्बाध होकर
सोमरस का सेवन करो एवं इसी के उद्देश्य से यहां आओ. (६)
सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः.
निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः.. (७)
इंद्र एवं वायु के लिए दही मिला सोमरस तैयार किया है. वह सोम तुम्हारी ओर नीचे
बहने वाली सरिताओं के समान पहुंचे. (७)
सजूर्विश्वेभिर्देवैभिरश्विभ्यामुषसा सजूः.
आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण.. (८)
हे अग्नि! तुम समस्त देवों के साथ आओ एवं अश्विनीकुमारों तथा उषा के साथ मित्रता
स्थापित करो. तुम यज्ञ में आकर सोमरस द्वारा उसी प्रकार प्रसन्न बनो, जिस प्रकार अत्रि
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