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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

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नहीं करे, वह वरुण के द्वारा हिंसित होकर समाप्त हो जावे. अर्यमा हमें द्वेष करने वाले
राक्षसों से अलग रखें. हे कामपूरक मित्र व वरुण! मुझ हव्यदाता को तुम विस्तृत स्थान प्रदान
करो. (९)
सस्वश्चिद्धि समृतिस्त्वेषाेषामपीच्येन सहसा सहन्ते.
युष्मद्विया वृषणो रेजमाना दक्षस्य चिन्महिना मृळता नः.. (१०)
इन मित्रादि देवों की संगति निगूढ़ एवं दीप्त होती है. वे अपने छिपे हुए बल से शत्रुओं
को पराजित करते हैं. हे अभिलाषापूरक मित्रादि देवो! हमारे विरोधी तुम्हारे डर से कांप जाते
हैं. तुम अपने बल के महत्त्व से हमें सुखी बनाओ. (१०)
यो ब्रह्मणे सुमतिमायजाते वाजस्य सातौ परमस्य रायः.
सीक्षन्त मन्युं मघवानो अर्य उरु क्षयाय चक्रिरे सुधातु.. (११)
जो यजमान अन्न एवं उत्कृष्ट धन की प्राप्ति के लिए तुम्हारी स्तुति में अपनी शोभनबुद्धि
लगाता है, धनस्वामी अर्यमा आदि उसकी स्तुति स्वीकार करते हैं एवं उसके विस्तृत निवास
के लिए उत्तम स्थान बनाते हैं. (११)
इयं देव पुरोहितिर्युवभ्यां यज्ञेषु मित्रावरुणावकारि.
विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१२)
हे मित्र व वरुणदेव! तुम्हारे यज्ञ में यह पूजारूपी स्तुति की गई है. इसे स्वीकार करके
हमारे सभी दुःखों को नष्ट करो. (१२)
सूक्त—६१ देवता—मित्र व वरुण
उद्वां चक्षुर्वरुण सुप्रतीकं देवयोरेति सूर्यस्ततन्वान्.
अभि यो विश्वा भुवनानि चष्टे स मन्युं मर्त्येष्व चिकेत.. (१)
हे द्योतमान मित्र व वरुण! तुम्हारे चक्षु रूप एवं सौंदर्ययुक्त तेज का विस्तार करते हुए
उदय होते हैं. जो सूर्य सारे लोकों को देखते हैं, वे मनुष्यों की स्तुतियों को भली प्रकार जानते
हैं. (१)
प्र वां स मित्रावरुणावृतावा विप्रो मन्मानि दीर्घश्रुदियर्ति.
यस्य ब्रह्माणि सुक्रतू अवाथ आ यत्क्रत्वा न शरदः पृणैथे.. (२)
हे मित्र व वरुण! प्रसिद्ध, मेधावी, यज्ञकर्त्ता एवं चिरकाल तक सुनने वाले वसिष्ठ तुम्हारे
लिए स्तुतियां बोलते हैं. शोभनकर्म वाले तुम दोनों उनकी स्तुति की रक्षा करते हो एवं अनेक
वर्षों से उनका यज्ञ पूर्ण कर रहे हो. (२)
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प्रोरौर्मित्रावरुणा पृथिव्याः प्र दिव ऋष्वाद्वृहतः सुदानू.
स्पशो दधाथे ओषधीषु विश्वध्वग्यतो अनिमिषं रक्षमाणा.. (३)
हे मित्र व वरुण! तुमने विस्तृत पृथ्वी एवं गुण तथा रूप के कारण विशाल अंतरिक्ष की
परिक्रमा की है. हे शोभनदान वाले देवी! तुम दोनों सत्य पर चलने वाले का सदा पालन करते
हुए ओषधियों एवं प्रजा के रूप धारण करते हो. (३)
शंसा मित्रस्य वरुणस्य कम शुष्मो रोदसी बद्बधे महित्वा.
अयन्मासा अयज्वनामवीराः प्र यज्ञमन्मा वृजनं तिराते.. (४)
हे ऋषि! तुम मित्र एवं वरुण के तेज की प्रशंसा करो. उनकी शक्ति अपने महत्त्व के
द्वारा द्यावा-पृथिवी को अलग-अलग धारण करती है. यज्ञ न करने वाले के मास बिना पुत्रों के
बीतें. यज्ञ के प्रति उनकी बुद्धि बल बढ़ावे. (४)
अमूरा विश्वा वृषणाविमा वां न यासु चित्रं ददृशे न यक्षम्.
द्रुहः सचन्ते अनृता जनानां न वां निण्यान्यचिते अभूवन्.. (५)
हे मूढ़तारहित, व्यापक एवं अभिलाषापूरक मित्र व वरुण! तुम्हारी स्तुतियों में आश्चर्य
एवं आदर दिखाई नहीं देता. अर्थात् तुम्हारी स्तुतियां सच्ची हैं. लोगों की झूठी स्तुति तुम्हारे
शत्रु स्वीकार करते हैं. तुम्हारे प्रति किए गए स्तोत्र रहस्यपूर्ण होते हुए भी अज्ञान के कारण न
बनें. (५)
समु वां यज्ञं महयं नमोभिर्हुवे वां मित्रावरुणा सबाधः.
प्र वां मन्मान्युचसे नवानि कृतानि ब्रह्म जुजुषन्निमानि.. (६)
हे मित्र व वरुण! मैं स्तुतियों के द्वारा तुम्हारे यज्ञ की पूजा करता हूं एवं बाधा के
निवारण हेतु तुम्हें बुलाता हूं. मैंने तुम्हारे लिए नए स्तोत्र बनाए हैं. मेरे द्वारा एकत्रित स्तुतियां
तुम्हें प्रसन्न करें. (६)
इयं देव पुरोहितिर्युवभ्यां यज्ञेषु मित्रावरुणावकारि.
विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे मित्र व वरुण देव! तुम्हारे यज्ञ में यह पूजारूपी स्तुति की गई है. इसे स्वीकार करके
हमारे सभी दुःखों को नष्ट करो एवं अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७)
सूक्त—६२ देवता—मित्र व वरुण
उत्सूर्यो बृहदर्चींष्यश्रेत्पुरु विश्वा जनिम मानुषाणाम्.
समो दिवा ददृशे रोचमानः क्रत्वा कृतः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.. (१)
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सूर्य ऊपर की ओर उठते हुए विस्तृत एवं अधिक तेज का आश्रय लें एवं मानवों के
सभी समूहों को सहारा दें. वे दिन में चमकते हुए समान दिखाई देते हैं. वे प्रजापति द्वारा की
गई स्तुतियां सुनकर तीव्र बनें. (१)
स सूर्य प्रति पुरो न उद्गा एभिः स्तोमेभिरेतशेभिरेवैः.
प्र नो मित्राय वरुणाय वोचोऽनागसो अर्यम्णे अग्नये च.. (२)
हे सूर्य! इन स्तोत्ररूपी गतिशील अश्वों के द्वारा तुम ऊपर उठते हुए हम सबके सामने
गमन करो. तुम मित्र, वरुण, अर्यमा एवं अग्नि के पास जाकर हमें निरपराध बताना. (२)
वि नः सहस्रं शुरुधो रदन्त्वृतावानो वरुणो मित्रो अग्निः.
यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्कमा नः कामं पूपुरन्तु स्तवानाः.. (३)
दुःख रोकने वाले एवं सत्ययुक्त वरुण, मित्र तथा अग्नि हमें हजारों की संख्या में धन दें.
वे प्रसन्नताकारक देव हमें प्रशंसनीय एवं आदरयोग्य वस्तुएं दें तथा हमारी स्तुति सुनकर
हमारी अभिलाषाएं पूरी करें. (३)
द्यावाभूमी अदिते त्रासीथां नो ये वां जज्ञुः सुजनिमान ऋष्वे.
मा हेळे भूम वरुणस्य वायोर्मा मित्रस्य प्रियतमस्य नृणाम्.. (४)
हे अखंडनीय एवं महती द्यावा-पृथिवी! हम सुंदर जन्म वाले तुम्हें जानते हैं. तुम हमारी
रक्षा करो. हम वरुण, वायु एवं मानवों के प्रिय मित्र के क्रोध के पात्र न बनें. (४)
प्र बाहवा सिसृतं जीवसे न आ नो गव्यूतिमुक्षतं घृतेन.
आ नो जने श्रवयतं युवाना श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमा.. (५)
हे मित्र व वरुण! अपनी भुजाएं फैलाओ एवं हमारे जीवन के लिए उस भूमि को जल से
सींचो, जिस पर हमारी गाएं चलती हैं. तुम हमें मनुष्यों में प्रसिद्ध बनाओ. हे नित्य तरुणो!
हमारी पुकार सुनो. (५)
नू मित्रो वरुणो अर्यमा नस्त्मने तोकाय वरिवो दधन्तु.
सुगा नो विश्वा सुपथानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
मित्र, वरुण एवं अर्यमा हमारे लिए एवं हमारे पुत्रों के लिए धन दें. सभी मार्ग हमारे लिए
उत्तम एवं चलने में सरल हों. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो.
(६)
सूक्त—६३ देवता—सूर्य व वरुण
उद्वेति सुभगो विश्वचक्षाः साधारणः सूर्यो मानुषाणाम्.
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चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्य देवश्चर्मेव यः समविव्यक् तमांसि.. (१)
शोभनभाग्य वाले, सब मनुष्यों के प्रति समान, मित्र एवं वरुण के चक्षु के समान एवं
दीप्तिशाली सूर्य उदित हो रहे हैं. वे चमड़े के समान अंधकार को लपेटते हैं. (१)
उद्वेति प्रसवीता जनानां महान् केतुरर्णवः सूर्यस्य.
समानं चक्रं पर्याविवृत्सन्यदेतशो वहति धूर्षु युक्तः.. (२)
मनुष्यों को अपने-अपने काम में लगाने वाले, पूज्य, ज्ञापन एवं जल देने वाले सूर्य
सबके पहियों को समान रूप से चलाने की इच्छा से उदित होते हैं. रथ में जुड़े हुए हरे रंग के
घोड़े सूर्य को खींचते हैं. (२)
विभ्राजमान उषसामुपस्थाद् रेभैरुदेत्यनुमद्यमानः.
एष मे देवः सविता चच्छन्द यः समानं न प्रमिनाति धाम.. (३)
अतिशय दीप्तिशाली ये सूर्य स्तोताओं की स्तुतियां सुनकर प्रमुदित होते हुए उषाओं के
बीच में उदित होते हैं. ये सविता देव मेरी अभिलाषाएं पूरी करते हैं. ये सभी प्राणियों के लिए
एकरूप अपने तेज को संकुचित नहीं करते. (३)
दिवो रुक्म उरुचक्षा उदेति दूरे अर्थस्तरणिर्भ्राजमानः.
नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता अयन्नर्थानि कृणवन्नपांसि.. (४)
अति तेजस्वी, दीप्तिशाली, दूर तक जाने वाले एवं तारक सूर्य अंतरिक्ष में चमकते हुए
उदित होते हैं. सूर्य से उत्पन्न लोग निश्चय ही कर्त्तव्य समझकर कर्म करते हैं. (४)
यत्रा चक्रुरमृता गातुमस्मै श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः.
प्रति वां सूर उदिते विधेम नमोभिर्मित्रावरुणोत हव्यैः.. (५)
मरणरहित देवों ने अंतरिक्ष में सूर्य के लिए मार्ग बनाया था. वह मार्ग उड़ते हुए गिद्ध के
समान अंतरिक्ष का अनुगमन करता है. हे मित्र व वरुण! सूर्य के उदय होने पर हम नमस्कारों
व हव्यों द्वारा तुम्हारी सेवा करेंगे. (५)
नू मित्रो वरुणो अर्यमा नस्त्मने तोकाय वरिवो दधन्तु.
सुगा नो विश्वा सुपथानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
मित्र, वरुण एवं अर्यमा हमारे लिए तथा हमारे पुत्रों के लिए धन दें. सभी मार्ग हमारे
लिए उत्तम एवं चलने में सरल हों. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो.
(६)
सूक्त—६४ देवता—मित्र व वरुण
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दिवि क्षयन्ता रजसः पृथिव्यां प्र वां घृतस्य निर्णिजो ददीरन्.
हव्यं नो मित्रो अर्यमा सुजातो राजा सुक्षत्रो वरुणो जुषन्त.. (१)
हे मित्र व वरुण! तुम अंतरिक्ष एवं पृथ्वी में व्याप्त जल के स्वामी हो. तुम्हारी प्रेरणा से
मेघ जल को रूप देता है. हमारे हव्य को मित्र, शोभनजन्म वाले अर्यमा, राजा एवं
शोभनशक्ति वाले वरुण स्वीकार करें. (१)
आ राजाना मह ऋतस्य गोपा सिन्धुपती क्षत्रिया यातमर्वाक्.
इळां नो मित्रावरुणोत वृष्टिमव दिव इन्वतं जीरदानू.. (२)
हे राजन्, महान् यज्ञ के रक्षक, नदियों के पालनकर्त्ता एवं शक्तिशाली मित्र व वरुण!
तुम हमारे सामने आओ. हे शीघ्र दान करने वाले मित्र व वरुण! तुम आकाश से हमें अन्न और
वृष्टि दो. (२)
मित्रस्तन्नो वरुणो देवो अर्यः प्र साधिष्ठेभिः पथिभिर्नयन्तु.
ब्रवद्यथा न आदरिः सुदास इषा मदेम सह देवगोपाः.. (३)
मित्र, वरुण और अर्यमा हमें चाहे जब श्रेष्ठ मार्ग द्वारा ले जावें. अर्यमा शोभन दाता के
पास जाकर हमारी बात कहें. हम देवों द्वारा रक्षित होकर उनके दिए अन्न एवं संतान के साथ
प्रसन्न हों. (३)
यो वां गर्तं मनसा तक्षदेतन्मूर्ध्वां धीतिं कृणवद्धारयच्च.
उक्षेथां मित्रावरुणा घृतेन ता राजाना सुक्षितीस्तर्पयेथाम्.. (४)
हे शास्ता मित्र व वरुण! स्तुतियों के साथ जो तुम्हारा रथ बनाता है, तुम्हारे निमित्त श्रेष्ठ
कर्म करता है एवं यज्ञ में तुम्हें धारण करता है, उसे जल से सींचो एवं शोभननिवास वाला
बनाकर तृप्त करो. (४)
एष स्तोमो वरुण मित्र तुभ्यं सोमः शुक्रो न वायवेऽयामि.
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे मित्र व वरुण! यह स्तोत्र मैंने तुम दोनों एवं वायु के लिए किया है. यह सोम के समान
दीप्त है. तुम हमारे यज्ञ में आओ, हमारी स्तुति को जानो एवं अपने कल्याणसाधनों द्वारा
हमारी सदा रक्षा करो. (५)
सूक्त—६५ देवता—मित्र व वरुण
प्रति वां सूर उदिते सूक्तैर्मित्रं हुवे वरुणं पूतदक्षम्.
ययोरसुर्यं १ मक्षितं ज्येष्ठं विश्वस्य यामन्नाचिता जिगत्नु.. (१)
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सूर्य निकल आने पर मैं उसे एवं पवित्र शक्ति वाले वरुण को बुलाता हूं. इनका बल
क्षीण न होने वाला एवं अधिक है. ये संग्राम में सभी शत्रुओं को जीतते हैं. (१)
ता हि देवानामासुरा तावर्या ता नः क्षितीः करतमूर्जयन्तीः.
अश्याम मित्रावरुणा वयं वां द्यावा च यत्र पीपयन्नहा च.. (२)
वे दोनों शक्तिशाली एवं श्रेष्ठ देव हमारी प्रजाओं को उन्नत बनावें. हे मित्र व वरुण! हम
तुम्हें व्याप्त करें. द्यावा-पृथिवी एवं दिन-रात हमें तृप्त करें. (२)
ता भूरिपाशावनृतस्य सेतू दुरत्येतू रिपवे मर्त्याय.
ऋतस्य मित्रावरुणा पथा वामपो न नावा दुरिता तरेम.. (३)
वे दोनों विपुल पाशों वाले, यज्ञ न करने वाले के बंधनकर्त्ता एवं शत्रु मनुष्य के लिए
दुरतिक्रमणीय हैं. हे मित्र व वरुण! जिस प्रकार नाव के द्वारा जल को पार करते हैं, उसी
प्रकार हम तुम्हारे यज्ञ द्वारा दुःखों से पार हो जावें. (३)
आ नो मित्रावरुणा हव्यजुष्टिं घृतैर्गव्यूतिमुक्षतमिलाभिः.
प्रति वामत्र वरमा जनाय पृणीतमुद्नो दिव्यस्य चारोः.. (४)
हे मित्र व वरुण! हमारे हव्ययुक्त यज्ञ में आओ एवं जल के साथ-साथ अन्न द्वारा भी
हमारी गोचर-भूमि को पूर्ण करो. हमारे अतिरिक्त इस संसार में तुम्हें उत्तम हव्य कौन देगा?
तुम अंतरिक्ष में होने वाला एवं उत्तम जल दो. (४)
एष स्तोमो वरुण मित्र तुभ्यं सोमः शुक्रो न वायवेऽयामि.
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे मित्र व वरुण! यह स्तोत्र मैंने तुम दोनों एवं वायु के लिए बनाया है. यह सोम के
समान दीप्त है. तुम हमारे यज्ञ में आओ, हमारी स्तुति को जानो एवं अपने कल्याणसाधनों
द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५)
सूक्त—६६ देवता—आदित्य आदि
प्र मित्रयोर्वरुणयोः स्तोमो न एतु शूष्यः. नमस्वान्तुविजातयोः.. (१)
बार-बार प्रादुर्भूत होने वाले मित्र एवं वरुण का सुखदाता तथा अन्नयुक्त स्तोत्र उनके
समीप जावे. (१)
या धारयन्त देवाः सुदक्षा दक्षपितरा. असुर्याय प्रमहसा.. (२)
शोभन-बलयुक्त, शक्ति की रक्षा करने वाले एवं प्रकृष्ट तेज वाले मित्र व वरुण को देवों
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ने धारण किया है. (२)
ता नः स्तिपा तनूपा वरुण जरितॄणाम्. मित्र साधयतं धियः.. (३)
वे दोनों हमारे घर एवं शरीर के रक्षक हैं. हे मित्र व वरुण! तुम स्तोताओं के स्तुतिरूप
कर्म को पूरा करो. (३)
यदद्य सूर उदितेऽनागा मित्रो अर्यमा. सुवाति सविता भगः.. (४)
पापहंता मित्र, अर्यमा, सविता एवं भग आज सूर्य निकलने पर हमारा इष्ट धन दें. (४)
सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्त्सुदानवः. ये नो अंहोऽतिपिप्रति.. (५)
हे शोभनदान वाले देवो! तुम्हारे आने पर हमारा निवास-स्थान सुरक्षित हो. तुम हमारे
पाप को नष्ट करो. (५)
उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये. महो राजान ईशते.. (६)
मित्रादि देव एवं अदिति हिंसा-रहित यज्ञ के स्वामी हैं. वे धन के भी स्वामी हैं. (६)
प्रति वां सूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम्. अर्यमणं रिशादसम्.. (७)
मैं सूर्योदय वेर बाद मित्र, वरुण एवं शत्रुनाशक अर्यमा की स्तुति करता हूं. (७)
राया हिरण्यया मतिरियंमवृकाय शवसे. इयं विप्रा मेधसातये.. (८)
यह स्तुति हमें रमणीय धन के सथ अपराजित शक्ति देने वाली हो. हे ब्राह्मणो! यह
स्तुति यज्ञ-लाभ के लिए हो. (८)
ते स्याम देव वरुण ते मित्र सूरिभिः सह. इषं स्वश्च धीमहि.. (९)
हे वरुण एवं मित्र! हम ऋत्विजों को साथ लेकर तुम्हारी स्तुति करने वाले होंगे. हे देव!
हम अन्न एवं जल धारण करें. (९)
बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः.
त्रीणि ये येमुर्विदथानि धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः.. (१०)
महान्, सूर्य के समान प्रकाशयुक्त, अग्निरूपी जिह्वा वाले एवं यज्ञ को बढ़ाने वाले
मित्रादि देव शत्रुओं को हराने वाले कर्मों द्वारा हमें विस्तृत निवास-स्थान देते हैं. (१०)
वि ये दधुः शरदं मासमादहर्यज्ञमक्तुं चादृचम्.
अनाप्यं वरुणो मित्रो अर्यमा क्षत्रं राजान आशत.. (११)
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तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते.

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मित्र, वरुण एवं अर्यमा ने सुशोभित होकर दूसरों द्वारा अप्राप्त बल पाया है तथा
संवत्सर, मास, दिवस, रात्रि एवं ऋचाओं की रचना की है. (११)
तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते.
यद्दोहते वरुणो मित्रो अर्यमा यूयमृतस्य रथ्यः.. (१२)
हे उदक के नेता वरुण, मित्र और अर्यमा! तुम जिस धन को धारण करते हो, हम आज
सूर्य निकलने पर वही धन स्तुतियों द्वारा मांगते हैं. (१२)
ऋतावान ऋतजाता ऋतावृधो घोरासो अनृतद्विषः.
तेषां वः सुम्ने सुच्छर्दिष्टमे नरः स्याम ये च सूरयः.. (१३)
हे यज्ञयुक्त, यज्ञ के लिए उत्पन्न, यज्ञ बढ़ाने वाले, भयानक एवं यज्ञहीनों से द्वेष करने
वाले नेताओ! हम एवं अन्य ऋत्विज् ही तुम्हारे सुखदायक धन के अधिकारी हैं. (१३)
उदु त्यद्दर्शंतं वपुर्दिव एति प्रतिह्वरे.
यदीमाशूर्वहति देव एतशो विश्वस्मै चक्षसे अरम्.. (१४)
वह दर्शनीय मंडल अंतरिक्ष के समीप उदय होता है. गतिशील एवं हरे रंग का घोड़ा उस
मंडल को इस हेतु धारण करता है, जिससे सब लोग उसे देख सकें. (१४)
शीर्ष्णः शीर्ष्णो जगतस्तस्थुषस्पतिं समया विश्वा रजः.
सप्त स्वसारः सुविताय सूर्यं वहन्ति हरितो रथे.. (१५)
सात गतिशील अश्व मस्तक के भी मस्तक अर्थात् सर्वोच्च स्थावर एवं जंगम के स्वामी
एवं रथ में सवार सूर्य को विश्व के कल्याण के लिए संसार के समीप लाते हैं. (१५)
तच्चक्षुर्देवहितं शुक्रमूच्चरत्. पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्.. (१६)
चक्षु के समान सबके प्रकाशक, देव हितकारक एवं उज्ज्वल सूर्य निकल रहे हैं. हम सौ
वर्ष देखें और जीवित रहें. (१६)
काव्येभिरदाभ्या यातं वरुण द्युमत्. मित्रश्च सोमपीतये.. (१७)
हे अपराजेय एवं तेजस्वी मित्र तथा वरुण! तुम हमारे स्तोत्र सुनकर सोम पीने के लिए
आओ. (१७)
दिवो धामभिर्वरुण मित्रश्चा यातमद्रुहा. पिबतं सोममातुजी.. (१८)
हे द्रोहरहित मित्र व वरुण! तुम स्वर्ग से आओ और शत्रुओं की हिंसा करते हुए सोमपान
करो. (१८)
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आ यातं मित्रावरुणा जुषाणावाहुतिं नरा. पातं सोममृतावृधा.. (१९)
हे यज्ञनेता मित्र व वरुण! तुम सोमरूपी आहुति को स्वीकार करते हुए आओ एवं यज्ञ
की वृद्धि करते हुए सोमपान करो. (१९)
सूक्त—६७ देवता—अश्विनीकुमार
प्रति वां रथं नृपती जरध्यै हविष्मता मनसा यज्ञियेन.
यो वां दूतो न धिष्ण्यावजीगरच्छा सूनुर्न पितरा विवक्मि.. (१)
हे ऋत्विज् व यजमानरूपी मनुष्यों के स्वामी अश्विनीकुमारो! हम हव्य एवं स्तोत्र लेकर
तुम्हारे रथ की स्तुति करने जाते हैं. हे स्तुतियोग्य अश्विनीकुमारो! जैसे पुत्र पिता को जगाता
है, उसी प्रकार दूतरूप में जगाने वाले तुम्हारे रथ को अपने सामने आने के लिए मैं स्तुति
करता हूं. (१)
अशोच्यग्निः समिधानो अस्मे उपो अदृश्रन्तमसश्चिदन्ताः.
अचेति केतुरुषसः पुरस्ताच्छ्रिये दिवो दुहितुर्जायमानः.. (२)
अग्नि हमारे द्वारा प्रज्वलित होकर प्रकाशित होते हैं, वे लोग अंधकार वाले भागों को
भी देखते हैं. ज्ञापन करने वाले सूर्य उषा वाली पूर्व दिशा में शोभा के लिए उदित होते हैं एवं
लोग उन्हें देखते हैं. (२)
अभि वां नूनमश्विना सुहोता स्तोमैः सिषक्ति नासत्या विवक्वान्.
पूर्वीभियतिं पथ्याभिर्वाक्स्वर्विदा वसुमता रथेन.. (३)
हे शोभन होता एवं स्तुति बोलने वाले अश्विनीकुमारो! हम स्तुतिसमूहों द्वारा तुम्हारी
सेवा करते हैं. तुम जल को जानने वाले एवं धनयुक्त रथ पर चढ़कर प्रचलित मार्ग द्वारा
आओ. (३)
अवोर्वां नूनमश्विना युवाकुर्हुवे यद्वां सुते माध्वी वसूयुः.
आ वां वहन्तु स्थविरासो अश्वाः पिबाथो अस्मे सुषुता मधूनि.. (४)
हे रक्षक एवं मधुविद्या कुशल अश्विनीकुमारो! जब तुम्हारी अभिलाषा से सोमरस निचूड़
जाता है तब मैं धन की इच्छा से तुम्हारी स्तुति करता हूं. तुम्हारे स्वस्थ घोड़े तुम्हें यहां लावें.
तुम हमारे द्वारा भली प्रकार निचोड़े गए सोमरस को पिओ. (४)
प्राचीमु देवाश्विना धियं मेऽमृध्रां सातये कृतं वसूयुम्.
विश्वा अविष्टं वाज आ पुरन्धीस्ता नः शक्तं शचीपती शचीभिः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारी सरला, अपराजित एवं धन चाहने वाली बुद्धि को लाभ के
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लिए उचित बनाओ. संग्राम में भी हमारी बुद्धि की रक्षा करो. हे यज्ञपालक अश्विनीकुमारो!
हमारे कर्मों के द्वारा हमें धन दो. (५)
अविष्टं धीष्वश्विना न आसु प्रजावद्रेतो अहयं नो अस्तु.
आ वां तोके तनये तूतुजानाः सुरत्नासो देववीतिं गमेम.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! इन यज्ञकर्मों में हमारी रक्षा करो. हमारा वीर्य क्षीणतारहित एवं
संतान उत्पन्न करने योग्य हो. अपने पुत्रों एवं पौत्रों को मनचाहा धन देते हुए हम शोभनरत्न
लाभ करें एवं देवों को प्राप्त करके यज्ञ में आवें. (६)
एष स्य वां पूर्वगन्वेव सख्ये निधिर्हितो माध्वी रातो अस्मे.
अहेळता मनसा यातमर्वागश्नन्त हव्यं मानुषीषु विक्षु.. (७)
हे मधुप्रिय अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार दूत मित्र के स्वागत के लिए आगे चलता है,
उसी प्रकार यह सोमरूपी निधि हमारे द्वारा तुम्हारे लिए संकल्पित है. क्रोधरहित मन से हमारे
सामने आओ एवं मानवी प्रजाओं में वर्तमान हव्य को खाओ. (७)
एकस्मिन्योगे भुरणा समाने परि वां सप्त स्रवतो रथो गात्.
न वायन्ति सुभ्वो देवयुक्ता ये वां धूर्षु तरणयो वहन्ति.. (८)
हे भरण-पोषण करने वाले अश्विनीकुमारो! जब तुम एक स्थान पर मिलते हो तो
तुम्हारा रथ सात नदियों के पार जाता है. शोभनजन्म वाले एवं दिव्यशक्ति से युक्त तुम्हारे
घोड़े तुम्हारे रथ को तेजी से खींचते हैं और कभी नहीं थकते. (८)
असश्चता मघवद्भयो हि भूतं ये राया मघदेयं जुनन्ति.
प्र ये बन्धुं सूनृताभिस्तिरन्ते गव्या पृञ्चन्तो अश्व्या मघानि.. (९)
आसक्तिरहित तुम दोनों उन लोगों के लिए उत्पन्न हुए हो जो धनी हैं एवं धनप्राप्ति के
योग्य हव्य तुम्हें देते हैं, जो सत्य वचनों से अपने बंधुओं को बढ़ाते हैं एवं मांगने वालों को
गोधन एवं अश्वधन देते हैं. (९)
नू मे हवमा शृणुतं युवाना यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरवत्.
धत्तं रत्नानि जरतं च सूरीन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे नित्यतरुण अश्विनीकुमारो! तुम आज मेरी पुकार सुनो, हव्ययुक्त घर में आओ,
रत्नदान करो एवं स्तोता की उन्नति करो. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा
रक्षा करो. (१०)
सूक्त—६८ देवता—अश्विनीकुमार
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आ शुभ्रा यातमश्विना स्वश्वा गिरो दस्रा जुजुषाणा युवाकोः.
हव्यानि च प्रतिभृता वीतं नः.. (१)
हे दीप्तियुक्त, शोभन अश्वों वाले एवं शत्रुहंता अश्विनीकुमारो! तुम अपने भक्त की
स्तुतियों की कामना करो एवं हमारे द्वारा प्रस्तुत हव्य का भक्षण करो. (१)
प्र वामन्धांसि मद्यान्यस्थुररं गन्तं हविषो वीतये मे. तिरो अर्यो हवनानि श्रुतं नः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे लिए मदकारक अन्न स्थापित हैं. तुम हमारा हव्य भक्षण करने
के लिए जल्दी आओ. तुम हमारे शत्रुओं की पुकार का तिरस्कार करके हमारी पुकार सुनो.
(२)
प्र वां रथो मनोजवा इयर्ति तिरो रजांस्यश्विना शतोतिः.
अस्मभ्यं सूर्यावसू इयानः.. (३)
हे सूर्य के साथ रहने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारा मन के समान तेज चलने वाला एवं
सैकड़ों रक्षासाधनों से युक्त रथ हमारी प्रार्थना पर लोगों का तिरस्कार करके हमारे यज्ञ में
आता है. (३)
अयं ह यद्वां देवया उ अद्रिरूर्ध्वो विवक्ति सोमसुद्युवभ्याम्.
आ वल्गू विप्रो ववृतीत हव्यैः.. (४)
हे सुंदर अश्विनीकुमारो! तुम्हारी अभिलाषा से सोमलता कूटने वाला पत्थर ऊंचा शब्द
करता है, उस समय मेधावी ऋत्विज् तुम्हें हव्यों द्वारा आकर्षित करता है. (४)
चित्रं ह यद्वां भोजनं न्वस्ति न्यत्रये महिष्वन्तं युयोतम्.
यो वामोमानं दधते प्रियः सन्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा जो विचित्र धन है, उसे हमें दो. जो तुम्हारे प्रिय हैं एवं तुम्हारा
दिया हुआ धन धारण करते हैं, उन अत्रि ऋषि से महिष्वत को अलग करो. (५)
उत त्यद्वां जुरते अश्विना भूच्च्यवानाय प्रतीत्यं हविर्दे.
अधि यद्रूपं इतिऊर्ति धत्थः.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने स्तुतिकर्त्ता एवं हव्यदाता वृद्ध च्यवन ऋषि को मृत्यु के
पास से लाकर जो रूप दिया था, वह प्रसिद्ध है. (६)
उत त्यं भुज्युमश्विना सखायो मध्ये जहुर्दुरेवासः समुद्रे.
निरीं पर्षदरावा यो युवाकुः (७)
बुरे साथियों ने भुज्यु को समुद्र में त्याग दिया था. हे अश्विनीकुमारो! तुम्हीं ने उसे पार
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किया. वह तुम्हारा भक्त एवं अनुकूलचारी रहा. (७)
वृकाय चिज्जसमानाय शक्तमुत श्रुतं शयवे हूयमाना.
यावच्यामपिन्वतमपो न स्तर्यं चिच्छक्त्यश्विना शचीभिः.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने क्षीण होते हुए वृक ऋषि को अपने कर्म एवं बुद्धि द्वारा धन
दिया. पुकार लगाते हुए शंयु की बात तुम्हीं ने सुनी और बूढ़ी गाय को जलपूर्ण नदी के समान
दुधारू बना दिया. (८)
एष स्य कारुर्जरते सूक्तैरग्रे बुधान उषसां सुमन्मा.
इषा तं वर्धदघ्न्या पयोभिर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! यह शोभनबुद्धि वाला स्तोता उषा से पहले ही जागकर सूक्तों द्वारा
तुम्हारी स्तुति करता है. उसे अन्न, दूध एवं गायों द्वारा बढ़ाओ. हे देवो! अपने कल्याणसाधनों
द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (९)
सूक्त-६९ देवता-अश्विनीकुमार
आ वां रथो रोदसी बद्धधानो हिरण्ययो वृषभिर्यात्वश्वैः.
घृतवर्तनिः पविभी रुचान इषां वोळ्हा नृपतिर्वाजिनीवान्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! जवान घोड़ों वाला तुम्हारा रथ आवे. वह रथ द्यावा-पृथिवी को
बाधित करने वाला, सोने का बना हुआ, पहियों में जल धारण करने वाला, डंडों द्वारा
चमकता हुआ, अन्न ढोने वाला, यजमानों द्वारा प्रदत्त हव्य से युक्त एवं यजमानों का नेता है.
(१)
स पप्रथानो अभि पञ्च भूमा त्रिवन्धुरो मनसा यातु युक्तः.
विशो येन गच्छथो देवयन्तीः कुत्रा चिद्याममश्विना दधाना.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! जिस रथ पर बैठकर तुम किसी भी स्थान में देवाभिलाषी यजमानों
के पास पहुंच जाते हो, वह पांचों भूतों को प्रसिद्ध करने वाला, तीन वंधुरों (सारथि के बैठने
की जगह) से युक्त एवं हमारी स्तुतियों का पात्र है. (२)
स्वश्वा यशसा यातमर्वाग्दसा निधिं मधुमन्तं पिबाथः.
वि वां रथो वध्वा३ याद्मानोऽन्तान्दिवो बाधते वर्तनिभ्याम्.. (३)
हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! सुंदर घोड़ों द्वारा शोभन अन्न लेकर तुम हमारे सामने
आओ एवं मधुरतापूर्ण सोम का पान करो. सूर्य के साथ गंतव्य की ओर जाने वाला तुम्हारा
रथ तेज चलने के कारण अपने पहियों से स्वर्ग के भागों को पीड़ा पहुंचाता है. (३)
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युवोः श्रियं परि योषावृणीत सूरो दुहिता परितक्म्यायाम्.
यद्देवयन्तमवथः शचीभिः परि घ्रंसमोमना वां वयो गात्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी पत्नी सूर्यपुत्री रात के समय तुम्हारे रथ को घेरती है. तुम
जिस समय यज्ञकर्म द्वारा देवाभिलाषी की रक्षा करते हो, उस समय दीप्त अन्न तुम्हारे समीप
आता है. (४)
यो हस्य वां रथिरा वस्त उस्रा रथो युजानः परियाति वर्तिः.
तेन नः शं योरुषसो व्युष्टौ न्यश्विना वहतं यज्ञे अस्मिन्.. (५)
हे रथस्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारा रथ तेजों को ढकता हुआ घोड़ों की सहायता से
मार्ग में चलता है. हे अश्विनीकुमारो! उषाकाल होने पर हमारे पापों के शमन एवं सुखों की
प्राप्ति के लिए उस रथ द्वारा हमारे यज्ञ में आओ. (५)
नरा गौरेव विद्युतं तृषाणास्माकमद्य सवनोप यातम्.
पुरुत्रा हि वां मतिभिर्हवन्ते मा वामन्ये नि यमन्देवयन्तः.. (६)
हे नेता अश्विनीकुमारो! हिरणी के समान चमकते हुए सोम को पीने की इच्छा से हमारे
सवनों में आओ. यजमान बहुत से यज्ञों में तुम्हें स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं. जिससे अन्य
देवाभिलाषी तुम्हें न रोक पावें. (६)
युवं भुज्युमवविद्धं समुद्र उदूहथुरर्णसो अस्रिधानैः.
पतत्रिभिरश्रमैरव्यथिभिर्दंसनाभिरश्विना पारयन्ता.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने समुद्र में डूबते हुए भुज्यु को क्षीण न होने वाले, न थकने वाले
एवं तेज चलने वाले घोड़ों द्वारा एवं अपने शारीरिक प्रयत्नों द्वारा पार लगाया. (७)
नू मे हवमा शृणुतं युवाना यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्.
धत्तं रत्नानि जरतं च सूरीन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८)
हे नित्यतरुण अश्विनीकुमारो! हमारी पुकार सुनो, हमारे हव्य वाले घर में आओ. रत्न दो
एवं स्तोताओं को बढ़ाओ. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों के द्वारा हमारी सदा रक्षा करो.
(८)
सूक्त—७० देवता—अश्विनीकुमार
आ विश्ववाराश्विना गतं नः प्र तत्स्थानमवाचि वां पृथिव्याम्.
अश्वो न वाजी शुनपृष्ठो अस्थादा यत्सेदथुर्ध्रुवसे न योनिम्.. (१)
हे सबके प्रिय अश्विनीकुमारो! तुम हमारे यज्ञ में आओ. धरती पर यज्ञवेदी ही तुम्हारा
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स्थान कहा गया है. जिस प्रकार तेज चलने वाला घोड़ा अपने स्थान पर शांत रहता है, उसी
प्रकार सुखदायक पीठ वाला घोड़ा तुम्हारे पास रहे. (१)
सिषक्ति सा वां सुमतिश्चनिष्ठातापि घर्मो मनुषो दुरोणे.
यो वां समुद्रान्त्सरितः पिपर्त्येत्तग्वा चिन्न सुयुजा युजानः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! अतिशय अन्नयुक्त शोभनस्तुति तुम्हारी सेवा करती है. धूप मानवों
की यज्ञशाला में तप रही है. वह धूप तुम्हें प्राप्त करने के लिए नदियों और सागरों को वर्षा
द्वारा भरती है. जिस प्रकार रथ में घोड़े जोड़े जाते हैं, उसी प्रकार तुम्हें यज्ञ में युक्त किया
जाता है. (२)
यानि स्थानान्यश्विना दधाथे दिवो यह्वीष्बोषधीषु विक्षु.
नि पर्वतस्य मूर्धनि सदन्तेषं जनाय दाशुषे वहन्ता.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम स्वर्ग लोक से आकर विशाल ओषधियों एवं प्रजाओं में जो स्थान
धारण करते हो, उसे हव्यदाता यजमान को दो और स्वयं पर्वत की चोटी पर स्थित बनो. (३)
चनिष्ठं देवा ओषधीष्वप्सु यद्योग्या अश्व्रवैथे ऋषीणाम्.
पुरूणि रत्ना दधतौ न्य१स्मे अनुपूर्वाणि चख्यथुर्युगानि.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारी ओषधियों एवं जल की अभिलाषा करो, क्योंकि तुम
ऋषियों की इन वस्तुओं को स्वीकार करते हो. तुमने पूर्ववर्ती दंपतियों को आकृष्ट किया था.
तुम हमें अनेक रत्न दो. (४)
शुश्रूवांसा चिदश्विना पुरूण्यभि ब्रह्माणि चक्षाथे ऋषीणाम्.
प्रति प्र यातं वरमा जनायास्मे वामस्तु सुमतिश्चनिष्ठा.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने स्तुतियां सुनकर ऋषियों के अनेक यज्ञकर्मों को देखा है. तुम
मुझ यजमान के घर में आओ. तुम अन्न के विषय में हम पर कृपा करो. (५)
यो वां यज्ञो नासत्या हविष्मान् कृतब्रह्मा समर्यो३ भवाति.
उप प्र यातं वरमा वसिष्ठमिमा ब्रह्माण्यृच्यन्ते युवभ्याम्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! जो स्तुतिपरायण, हव्ययुक्त एवं ऋत्विजों से युक्त वसिष्ठ तुम्हारा
यजमान है, उसी श्रेष्ठ के पास जाओ. ये स्तुतियां यहां आने के लिए तुम्हारी स्तुति करती हैं.
(६)
इयं मनीषा इयमश्विना गीरिमां सुवृक्तिं वृषणा जुषेथाम्.
इमा ब्रह्माणि युवयून्यग्मन्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
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सूक्त—७१ देवता—अश्विनीकुमार

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हे अभिलाषापूरक अश्विनीकुमारो! यह स्तुति एवं यह वाणी तुम्हारे लिए है. तुम इस
शोभनस्तुति को स्वीकार करो. ये समस्त यज्ञकर्म तुम्हारी कामना करते हुए तुम्हें प्राप्त हों. हे
देवो! कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७)
सूक्त—७१ देवता—अश्विनीकुमार
अप स्वसुरुषसो नग्जिहीते रिणक्ति कृष्णीररुषाय पन्थाम्.
अश्वामघा गोमघा वां हुवेम दिवा नक्तं शरुमस्मद्युयोतम्.. (१)
रात अपनी बहिन उषा के पास से हट जाती है. काली रात उजले दिन के लिए रास्ता
छोड़ती है. हे अश्व एवं गोरूप धनों के स्वामी अश्विनीकुमारो! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम रात-
दिन हमारे पास से शत्रुओं को दूर करो. (१)
उपायातं दाशुषे मर्त्याय रथेन वाममश्विना वहन्ता.
युयुतमस्मदनिराममीवां दिवा नक्तं माध्वी त्रासीथां नः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने रथ द्वारा हव्य देने वाले यजमान के लिए उत्तम धन लाते
हुए आओ एवं अन्न की कमी और रोग हमसे दूर रहे. मधुस्वामी अश्विनीकुमारो! तुम रात-दिन
हमारी रक्षा करो. (२)
आ वां रथमवमस्यां व्युष्टौ सुम्नायवो वृषणो वर्तयन्तु.
स्यूमगभस्तिमृतयुग्भिरश्वैराश्विना वसुमन्तं वहेथाम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! सुखपूर्वक जोते गए एवं कामवर्षक घोड़े उषाकाल होने पर तुम्हारे
रथ को यहां लावें. सुखदायक किरणों वाले एवं धनयुक्त रथ को तुम जल प्रदान करने वाले
अश्वों की सहायता से आगे बढ़ाओ. (३)
यो वां रथो नृपती अस्ति वोळ्हा त्रिवन्धुरो वसुमाँ उस्रयामा.
आ न एना नासत्योप यातमभि यद्वां विश्वप्सन्यो जिगाति.. (४)
हे यजमानों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारा रथ वहन करने वाला, तीन
वंधुरा वाला, धनयुक्त, दिनभर चलने वाला एवं व्यापकरूप से गतिशील है. मैं उसी रथ द्वारा
आने के लिए तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. (४)
युवं च्यवानं जरसोऽमुमुक्तं नि पेदव ऊहथुराशुमश्वम्.
निरंहसस्तमसः स्पर्तमत्रिं नि जाहुषं शिथिरे धातमन्तः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने च्यवन की वृद्धावस्था दूर की, पेदु नामक राजा के लिए युद्ध में
तेज चलने वाला घोड़ा भेजा, अत्रि को पाप एवं अंधेरे को पार किया एवं जाहुष को
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राज्यच्युत होने पर पुनः स्थापित किया. (५)
इयं मनीषा इयमश्विना गीरिमां सुवृक्तिं वृषणा जुषेथाम्.
इमा ब्रह्माणि युवयून्यग्मन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हे अभिलाषापूरक अश्विनीकुमारो! यह स्तुति एवं वाणी तुम्हारे लिए है. तुम इस
शोभनस्तुति को स्वीकार करो. ये समस्त यज्ञकर्म तुम्हारी कामना करते हुए तुम्हें प्राप्त हों. हे
देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (६)
सूक्त—७२ देवता—अश्विनीकुमार
आ गोमता नासत्या रथेनाश्वावता पुरुश्चन्द्रेण यातम्.
अभि वां विश्वा नियुतः सचन्ते स्पार्हया श्रिया तन्वा शुभाना.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम गो, अश्व एवं धन से संपन्न रथ के द्वारा आओ. बहुत सी स्तुतियां
तुम्हारी सेवा करती हैं. तुम चाहने योग्य शोभा एवं शरीर से युक्त हो. (१)
आ नो देवेभिरुप यातमर्वाक् सजोषसा नासत्या रथेन.
युवोर्हि नः सख्या पित्र्याणि समानो बन्धुरुत तस्य वित्तम्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम समान प्रीति वाले देवों को लेकर रथ द्वारा हमारे सामने आओ.
तुम्हारे साथ हमारी पैतृक मित्रता है. हमारे एवं तुम्हारे बांधव एवं धन समान ही है. (२)
उदु स्तोमासो अश्विनोरबुध्रञ्ज्जामि ब्रह्मण्युषसश्च देवीः.
आविवासन्रोदसी धिष्ण्येमे अच्छा विप्रो नासत्या विवक्ति.. (३)
स्तुतियां अश्विनीकुमारों को भली प्रकार जगाती हैं. बंधुतारूपी समस्त यज्ञकर्म उषा को
जगाते हैं. बुद्धिमान् वसिष्ठ स्तुतियोग्य द्यावा-पृथिवी की सेवा करता हुआ अश्विनीकुमारों के
सामने स्तुति करता है. (३)
वि चेदुच्छन्त्यश्विना उषासः प्र वां ब्रह्माणि कारवो भरन्ते.
ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेद्बृहदग्नयः समिधा जरन्ते.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! उषाएं अंधकारों का नाश करती हैं. स्तोता तुम्हारी स्तुति विशेषरूप
से करते हैं. सविता देव ऊंचे तेज को धारण करते हैं एवं समिधाओं द्वारा प्रज्वलित अग्नि की
स्तुति की जाती है. (४)
आ पश्चातान्नासत्या पुरस्तादाश्विना यातमधरादुदक्तात्.
आ विश्वतः पाञ्चजन्येन राया यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
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हे अश्विनीकुमारो! तुम पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण से आओ. तुम पांच वर्णों का हित
करने वाली संपत्तियों के साथ सब ओर से आओ. हे देवो! कल्याणसाधनों द्वारा तुम सदा
हमारी रक्षा करो. (५)
सूक्त—७३ देवता—अश्विनीकुमार
अतारिष्म तमसरपारमस्य प्रति स्तोमं देवयन्तो दधानाः.
पुरुदंसा पुरुतमा पुराजामर्त्या हवेते अश्विना गीः.. (१)
हम देवों की अभिलाषा से स्तुतियां बोलते हुए अंधकार के पार जावें. हे अनेक कर्मों
वाले, परम विशाल, पहले उत्पन्न हुए एवं मरणरहित अश्विनीकुमारो! स्तोता तुम्हें बुलाता है.
(१)
न्यु प्रियो मनुषः सादि होता नासत्या यो यजते वन्दते च.
अश्रीतं मध्वो अश्विना उपाक आ वां वोचे विदथेषु प्रयस्वान्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा प्रिय मनुष्य यहां बैठा है. जो तुम्हारा यज्ञ एवं वंदना करता है,
उसके पास ठहरकर तुम उसका मधुर सोमरस पिओ, मैं अन्नयुक्त होकर तुम्हें बुलाता हूं. (२)
अहेम यज्ञं पथामुराणा इमां सुवृक्तिं वृषणा जुषेथाम्.
श्रुष्टीवेव प्रेषितो वामबोधि प्रति स्तोमैर्जरमाणो वसिष्ठः.. (३)
महान् स्तोत्र बोलने वाले हम आने वाले देवों के लिए यज्ञ एवं हवि बढ़ाते हैं. हे
अभिलाषापूरक अश्विनीकुमारो! इस शोभनस्तुति को स्वीकार करो. जिस प्रकार तेज दौड़ने
वाला दूत आता है, उसी प्रकार मैं वसिष्ठ स्तुतियां करता हुआ तुम्हारे सम्मुख प्रबुद्ध हूं. (३)
उप त्या वह्नी गमतो विशं नो रक्षोहणा सम्भृता वीळुपाणी.
समन्धांस्यग्मत मत्सराणि मा नो मर्धिष्टमा गतं शिवेन.. (४)
हव्य-वहन करने वाले, राक्षसनाशक, पुष्ट शरीर वाले एवं मजबूत हाथों वाले दोनों
अश्विनीकुमार हमारी प्रजा के समीप आवें. हे अश्विनीकुमारो! तुम प्रसन्नताकारक अन्न से
मिलो, हमारी हिंसा मत करो एवं कल्याणसाधनों के साथ आओ. (४)
आ पश्चातान्नासत्या पुरस्तादाश्विना यातमधरादुदक्तात्.
आ विश्वतः पाञ्चजन्येन राया यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण से आओ. तुम पांच वर्णों का हित
करने वाली संपत्ति के साथ सब ओर से आओ. हे देवो! कल्याणसाधनों द्वारा तुम सदा हमारी
रक्षा करो. (५)
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सूक्त—७४ देवता—अश्विनीकुमार
इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना.
अयं वामह्वेऽवसे शचीवसू विशंविशं हि गच्छथः.. (१)
हे निवासदाता अश्विनीकुमारो! स्वर्ग चाहने वाले लोग तुम्हें बुलाते हैं. हे कर्मरूपी धन के
स्वामी अश्विनीकुमारो! यह वसिष्ठ भी रक्षा के लिए तुम्हें बुलाता है, क्योंकि तुम सब प्रजाओं
के पास जाते हो. (१)
युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदेथां सूनृतावते.
अर्वाग्रथं समनसा नि यच्छतं पिबतं सोम्यं मधु.. (२)
हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारे पास जो उपभोग के योग्य धन है, उसे स्तोता के पास
जाने की प्रेरणा दो. तुम समान रूप से प्रसन्न होकर अपना रथ हमारे सामने लाओ एवं मधुर
सोमरस पिओ. (२)
आ यातमुप भूषतं मध्वः पिबतमश्विना.
दुग्धं पयो वृषणा जेन्यावसू मा नो मर्धिष्टमा गतम्.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! आओ, हमारे पास बैठो एवं सोमरस पिओ. हे अभिलाषापूरक एवं
धन जीतने वाले अश्विनीकुमारो! जल का दोहन करो, हमें मत मारो एवं जाओ. (३)
अश्वासो ये वामुप दाशुषो गृहं युवां दीयन्ति बिभ्रतः.
मक्षूयुभिर्नरा हयेभिरश्विना देवा यातमस्मयू.. (४)
हे नेता अश्विनीकुमारो! जो घोड़े तुम्हें हव्यदाता यजमान के घर में धारण करते हुए
पहुंचते हैं, उन्हीं तेज चलने वाले घोड़ों की सहायता से तुम हमारी कामना करते हुए आओ.
(४)
अधा ह यन्तो अश्विना पृक्षः सचन्त सूरयः.
ता यंसतो मघवद्भ्यो ध्रुवं यशश्छर्दिरस्मभ्यं नासत्या.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! स्तुतियों के उच्चारण के साथ चलने वाला यजमान एवं बुद्धिमान्
स्तोता बहुत सा अन्न धारण करते हैं. हम अन्नधारियों को स्थायी यश एवं घर दो. (५)
प्र ये ययुरवृकासो रथा इव नृपातारो जनानाम्.
उत स्वेन शवसा शूशुवुर्नर उत क्षियन्ति सुक्षितिम्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! दूसरे का धन ग्रहण न करने वाले एवं मनुष्यों में ऋत्विजों का रक्षण
करने वाले जो यजमान रथ के समान तुम्हारे समीप आते हैं, वे अपनी शक्ति से बढ़ते हैं एवं
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सूक्त—७५ देवता—उषा

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शोभनघर में आश्रय पाते हैं. (६)
सूक्त—७५ देवता—उषा
व्यु१षा आवो दिविजा ऋतेनाऽऽविष्कृण्वाना महिमानमागात्.
अप द्रुहस्तम आवरजुष्टमङ्गिरस्तमा पथ्या अजीगः.. (१)
उषा ने अंतरिक्ष में उत्पन्न होकर प्रकाश फैलाया एवं वह अपने तेज से अपनी महिमा
प्रकट करती हुई आई. उषा ने सबके अप्रिय शत्रुरूपी अंधकार को दूर भगाया एवं प्राणियों के
व्यवहार के लिए अतिशय गंतव्य मार्गों को प्रकट किया. (१)
महे नो अद्य सुविताय बोध्युषो महे सौभागाय प्र यन्धि.
चित्रं रयिं यशसं धेह्यस्मे देवि मर्तेषु मानुषि श्रवस्युम्.. (२)
हे उषा! आज हमारी महान् सुखप्राप्ति के लिए जागो एवं हमें महान् सौभाग्य दो. हे
मानवहितकारिणी उषादेवी! हमें यशयुक्त विचित्र धन दो एवं हम मानवों को अन्न वाला पुत्र
दो. (२)
एते त्ये भानवो दर्शतायाश्चित्रा उषसो अमृतास आगुः.
जनयन्तो दैव्यानि व्रतान्यापृणन्तो अन्तरिक्षा व्यस्थुः.. (३)
दर्शनीय उषा की ये विशाल, आश्चर्यजनक एवं विनाशरहित किरणें देवसंबंधी यज्ञों का
आरंभ करती हुई एवं अंतरिक्ष को व्याप्त करती हुई आती हैं एवं फैलती हैं. (३)
एषा स्या युजाना पराकात्पञ्च क्षितीः परि सद्यो जिगाति.
अभिपश्यन्ती वयुना जनानां दिवो दुहिता भुवनस्य पत्नी.. (४)
स्वर्ग की पुत्री एवं भुवनों का पालन करने वाली उषा प्राणियों की पहचान करती है एवं
दूर देश में स्थित होकर भी उद्योग करती हुई पांच वर्णों के पास जाती है. (४)
वाजिनीवती सूर्यस्य योषा चित्रामघा राय ईशे वसूनाम्.
ऋषिष्टुता जरयन्ती मघोन्युषा उच्छति वह्निभिर्गृणाना.. (५)
अन्न की स्वामिनी सूर्य की पत्नी एवं विचित्र धन से युक्त उषा सभी धनों की
अधिकारिणी है. ऋषियों द्वारा स्तुत, बुढ़ापे तक लंबी उम्र देने वाली एवं धनयुक्ता उषा
यजमान की स्तुतियां सुनकर प्रकाश करती है. (५)
प्रति द्युतानामरुषासो अश्वाश्चित्रा अदृश्रन्नुषसं वहन्तः.
याति शुभ्रा विश्वपिशा रथेन दधाति रत्नं विधते जनाय.. (६)
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दीप्तिशालिनी उषा को वहन करने वाले, तेजस्वी एवं रंगबिरंगे घोड़े दिखाई दे रहे हैं.
उज्ज्वल वर्ण वाली उषा अनेक रूपवाले रथ द्वारा सब जगह जाती है एवं अपने भक्त को
रत्न देती है. (६)
सत्या सत्येभिर्महती महद्भिर्देवी देवेभिर्यजता यजत्रैः.
रुजद् दृळहानि दददुस्रियाणां प्रति गाव उषसं वावशन्त.. (७)
सच्ची, महती एवं यज्ञपात्र उषादेवी अन्य सच्चे, महान् एवं यज्ञपात्र देवों के साथ
मिलकर दृढ़तर अंधकार का नाश करती है एवं गायों के घूमने हेतु प्रकाश देती है. गाएं
उषाओं की कामना करती हैं. (७)
नू नो गोमद्वीरवद्वेहि रत्नमुषो अश्वावत्पुरुभोजो अस्मे.
मा नो बर्हिः पुरुषता निदे कर्यूं पातं स्वस्तिभिः सदा नः.. (८)
हे उषा! हमें गायों, वीरों एवं अश्वों से युक्त धन दो. तुम हमें बहुत सा अन्न दो. तुम पुरुषों
के बीच हमारे यज्ञ की निंदा मत करना. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा
करो. (८)
सूक्त—७६ देवता—उषा
उद् ज्योतिरमृतं विश्वजन्यं विश्वानरः सविता देवो अश्रेत्.
क्रत्वा देवानाम्जनिष्ट चक्षुराविरकभुवनं विश्वमुषाः.. (१)
सबके नेता सविता देव विनाशरहित एवं सर्वजन-हितकारी ज्योति का आश्रय लेकर
ऊंचे उठते हैं. वे देवकर्मों अर्थात् यज्ञों के हेतु उत्पन्न हुए हैं. उषा ने सभी देवों का नेत्र बनकर
सारे लोक को आविष्कृत किया है. (१)
प्र मे पन्था देवयाना अदृश्रन्नमर्धन्तो वसुभिरिष्कृतासः.
अभूदु केतुरुषसः पुरस्तात्प्रतीच्यागादधि हर्म्येभ्यः.. (२)
मैंने हिंसा न करने वाले एवं तेजों द्वारा परिष्कृत देवयान मार्ग देखे हैं. उषा का ज्ञान
कराने वाला प्रकाश पूर्व दिशा में था. वह उषा हमारे सामने ऊंचे स्थानों से आती है. (२)
तानीदहानि बहुलान्यासन्‍या प्राचीनमुदिता सूर्यस्य.
यतः परि जारइवाचरन्त्युषो ददृक्षे न पुनर्यतीव.. (३)
हे उषा! तुम्हारा जो तेज सूर्य से पहले उदित होता है एवं जिस तेज के सामने तुम अपने
पति सूर्य के समीप साध्वी नारी के समान दिखाई देती हो, तुम्हारा वह तेज अधिक मात्रा में
है. (३)
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