ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextमित्र, वरुण एवं अर्यमा ने सुशोभित होकर दूसरों द्वारा अप्राप्त बल पाया है तथा
संवत्सर, मास, दिवस, रात्रि एवं ऋचाओं की रचना की है. (११)
तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते.
यद्दोहते वरुणो मित्रो अर्यमा यूयमृतस्य रथ्यः.. (१२)
हे उदक के नेता वरुण, मित्र और अर्यमा! तुम जिस धन को धारण करते हो, हम आज
सूर्य निकलने पर वही धन स्तुतियों द्वारा मांगते हैं. (१२)
ऋतावान ऋतजाता ऋतावृधो घोरासो अनृतद्विषः.
तेषां वः सुम्ने सुच्छर्दिष्टमे नरः स्याम ये च सूरयः.. (१३)
हे यज्ञयुक्त, यज्ञ के लिए उत्पन्न, यज्ञ बढ़ाने वाले, भयानक एवं यज्ञहीनों से द्वेष करने
वाले नेताओ! हम एवं अन्य ऋत्विज् ही तुम्हारे सुखदायक धन के अधिकारी हैं. (१३)
उदु त्यद्दर्शंतं वपुर्दिव एति प्रतिह्वरे.
यदीमाशूर्वहति देव एतशो विश्वस्मै चक्षसे अरम्.. (१४)
वह दर्शनीय मंडल अंतरिक्ष के समीप उदय होता है. गतिशील एवं हरे रंग का घोड़ा उस
मंडल को इस हेतु धारण करता है, जिससे सब लोग उसे देख सकें. (१४)
शीर्ष्णः शीर्ष्णो जगतस्तस्थुषस्पतिं समया विश्वा रजः.
सप्त स्वसारः सुविताय सूर्यं वहन्ति हरितो रथे.. (१५)
सात गतिशील अश्व मस्तक के भी मस्तक अर्थात् सर्वोच्च स्थावर एवं जंगम के स्वामी
एवं रथ में सवार सूर्य को विश्व के कल्याण के लिए संसार के समीप लाते हैं. (१५)
तच्चक्षुर्देवहितं शुक्रमूच्चरत्. पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्.. (१६)
चक्षु के समान सबके प्रकाशक, देव हितकारक एवं उज्ज्वल सूर्य निकल रहे हैं. हम सौ
वर्ष देखें और जीवित रहें. (१६)
काव्येभिरदाभ्या यातं वरुण द्युमत्. मित्रश्च सोमपीतये.. (१७)
हे अपराजेय एवं तेजस्वी मित्र तथा वरुण! तुम हमारे स्तोत्र सुनकर सोम पीने के लिए
आओ. (१७)
दिवो धामभिर्वरुण मित्रश्चा यातमद्रुहा. पिबतं सोममातुजी.. (१८)
हे द्रोहरहित मित्र व वरुण! तुम स्वर्ग से आओ और शत्रुओं की हिंसा करते हुए सोमपान
करो. (१८)
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