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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1113 of 1855

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Page 1113

ने धारण किया है. (२)
ता नः स्तिपा तनूपा वरुण जरितॄणाम्. मित्र साधयतं धियः.. (३)
वे दोनों हमारे घर एवं शरीर के रक्षक हैं. हे मित्र व वरुण! तुम स्तोताओं के स्तुतिरूप
कर्म को पूरा करो. (३)
यदद्य सूर उदितेऽनागा मित्रो अर्यमा. सुवाति सविता भगः.. (४)
पापहंता मित्र, अर्यमा, सविता एवं भग आज सूर्य निकलने पर हमारा इष्ट धन दें. (४)
सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्त्सुदानवः. ये नो अंहोऽतिपिप्रति.. (५)
हे शोभनदान वाले देवो! तुम्हारे आने पर हमारा निवास-स्थान सुरक्षित हो. तुम हमारे
पाप को नष्ट करो. (५)
उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये. महो राजान ईशते.. (६)
मित्रादि देव एवं अदिति हिंसा-रहित यज्ञ के स्वामी हैं. वे धन के भी स्वामी हैं. (६)
प्रति वां सूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम्. अर्यमणं रिशादसम्.. (७)
मैं सूर्योदय वेर बाद मित्र, वरुण एवं शत्रुनाशक अर्यमा की स्तुति करता हूं. (७)
राया हिरण्यया मतिरियंमवृकाय शवसे. इयं विप्रा मेधसातये.. (८)
यह स्तुति हमें रमणीय धन के सथ अपराजित शक्ति देने वाली हो. हे ब्राह्मणो! यह
स्तुति यज्ञ-लाभ के लिए हो. (८)
ते स्याम देव वरुण ते मित्र सूरिभिः सह. इषं स्वश्च धीमहि.. (९)
हे वरुण एवं मित्र! हम ऋत्विजों को साथ लेकर तुम्हारी स्तुति करने वाले होंगे. हे देव!
हम अन्न एवं जल धारण करें. (९)
बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः.
त्रीणि ये येमुर्विदथानि धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः.. (१०)
महान्, सूर्य के समान प्रकाशयुक्त, अग्निरूपी जिह्वा वाले एवं यज्ञ को बढ़ाने वाले
मित्रादि देव शत्रुओं को हराने वाले कर्मों द्वारा हमें विस्तृत निवास-स्थान देते हैं. (१०)
वि ये दधुः शरदं मासमादहर्यज्ञमक्तुं चादृचम्.
अनाप्यं वरुणो मित्रो अर्यमा क्षत्रं राजान आशत.. (११)
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