ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयुवोः श्रियं परि योषावृणीत सूरो दुहिता परितक्म्यायाम्.
यद्देवयन्तमवथः शचीभिः परि घ्रंसमोमना वां वयो गात्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी पत्नी सूर्यपुत्री रात के समय तुम्हारे रथ को घेरती है. तुम
जिस समय यज्ञकर्म द्वारा देवाभिलाषी की रक्षा करते हो, उस समय दीप्त अन्न तुम्हारे समीप
आता है. (४)
यो हस्य वां रथिरा वस्त उस्रा रथो युजानः परियाति वर्तिः.
तेन नः शं योरुषसो व्युष्टौ न्यश्विना वहतं यज्ञे अस्मिन्.. (५)
हे रथस्वामी अश्विनीकुमारो! तुम्हारा रथ तेजों को ढकता हुआ घोड़ों की सहायता से
मार्ग में चलता है. हे अश्विनीकुमारो! उषाकाल होने पर हमारे पापों के शमन एवं सुखों की
प्राप्ति के लिए उस रथ द्वारा हमारे यज्ञ में आओ. (५)
नरा गौरेव विद्युतं तृषाणास्माकमद्य सवनोप यातम्.
पुरुत्रा हि वां मतिभिर्हवन्ते मा वामन्ये नि यमन्देवयन्तः.. (६)
हे नेता अश्विनीकुमारो! हिरणी के समान चमकते हुए सोम को पीने की इच्छा से हमारे
सवनों में आओ. यजमान बहुत से यज्ञों में तुम्हें स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं. जिससे अन्य
देवाभिलाषी तुम्हें न रोक पावें. (६)
युवं भुज्युमवविद्धं समुद्र उदूहथुरर्णसो अस्रिधानैः.
पतत्रिभिरश्रमैरव्यथिभिर्दंसनाभिरश्विना पारयन्ता.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने समुद्र में डूबते हुए भुज्यु को क्षीण न होने वाले, न थकने वाले
एवं तेज चलने वाले घोड़ों द्वारा एवं अपने शारीरिक प्रयत्नों द्वारा पार लगाया. (७)
नू मे हवमा शृणुतं युवाना यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्.
धत्तं रत्नानि जरतं च सूरीन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८)
हे नित्यतरुण अश्विनीकुमारो! हमारी पुकार सुनो, हमारे हव्य वाले घर में आओ. रत्न दो
एवं स्तोताओं को बढ़ाओ. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों के द्वारा हमारी सदा रक्षा करो.
(८)
सूक्त—७० देवता—अश्विनीकुमार
आ विश्ववाराश्विना गतं नः प्र तत्स्थानमवाचि वां पृथिव्याम्.
अश्वो न वाजी शुनपृष्ठो अस्थादा यत्सेदथुर्ध्रुवसे न योनिम्.. (१)
हे सबके प्रिय अश्विनीकुमारो! तुम हमारे यज्ञ में आओ. धरती पर यज्ञवेदी ही तुम्हारा
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