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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1116 of 1855

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लिए उचित बनाओ. संग्राम में भी हमारी बुद्धि की रक्षा करो. हे यज्ञपालक अश्विनीकुमारो!
हमारे कर्मों के द्वारा हमें धन दो. (५)
अविष्टं धीष्वश्विना न आसु प्रजावद्रेतो अहयं नो अस्तु.
आ वां तोके तनये तूतुजानाः सुरत्नासो देववीतिं गमेम.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! इन यज्ञकर्मों में हमारी रक्षा करो. हमारा वीर्य क्षीणतारहित एवं
संतान उत्पन्न करने योग्य हो. अपने पुत्रों एवं पौत्रों को मनचाहा धन देते हुए हम शोभनरत्न
लाभ करें एवं देवों को प्राप्त करके यज्ञ में आवें. (६)
एष स्य वां पूर्वगन्वेव सख्ये निधिर्हितो माध्वी रातो अस्मे.
अहेळता मनसा यातमर्वागश्नन्त हव्यं मानुषीषु विक्षु.. (७)
हे मधुप्रिय अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार दूत मित्र के स्वागत के लिए आगे चलता है,
उसी प्रकार यह सोमरूपी निधि हमारे द्वारा तुम्हारे लिए संकल्पित है. क्रोधरहित मन से हमारे
सामने आओ एवं मानवी प्रजाओं में वर्तमान हव्य को खाओ. (७)
एकस्मिन्योगे भुरणा समाने परि वां सप्त स्रवतो रथो गात्.
न वायन्ति सुभ्वो देवयुक्ता ये वां धूर्षु तरणयो वहन्ति.. (८)
हे भरण-पोषण करने वाले अश्विनीकुमारो! जब तुम एक स्थान पर मिलते हो तो
तुम्हारा रथ सात नदियों के पार जाता है. शोभनजन्म वाले एवं दिव्यशक्ति से युक्त तुम्हारे
घोड़े तुम्हारे रथ को तेजी से खींचते हैं और कभी नहीं थकते. (८)
असश्चता मघवद्भयो हि भूतं ये राया मघदेयं जुनन्ति.
प्र ये बन्धुं सूनृताभिस्तिरन्ते गव्या पृञ्चन्तो अश्व्या मघानि.. (९)
आसक्तिरहित तुम दोनों उन लोगों के लिए उत्पन्न हुए हो जो धनी हैं एवं धनप्राप्ति के
योग्य हव्य तुम्हें देते हैं, जो सत्य वचनों से अपने बंधुओं को बढ़ाते हैं एवं मांगने वालों को
गोधन एवं अश्वधन देते हैं. (९)
नू मे हवमा शृणुतं युवाना यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरवत्.
धत्तं रत्नानि जरतं च सूरीन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे नित्यतरुण अश्विनीकुमारो! तुम आज मेरी पुकार सुनो, हव्ययुक्त घर में आओ,
रत्नदान करो एवं स्तोता की उन्नति करो. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा
रक्षा करो. (१०)
सूक्त—६८ देवता—अश्विनीकुमार
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