Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

About this granth

The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.

This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.

The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.

Page 1099Permalink

जल को छूने वाले मरुत् सत्य को प्राप्त करते हैं. शुद्ध जल वाले एवं शुद्ध मरुद्गण दूसरों को
भी शुद्ध करते हैं. (१२)
अंसेष्वा मरुतः खादयो वो वक्षःसु रुक्मा उपशिश्रियाणाः.
वि विद्युतो न वृष्टिभी रुचाना अनु स्वधामायुधैर्ऋच्छमानाः.. (१३)
हे मरुतो! तुम्हारे कंधों पर खादि नामक अलंकार तथा सीनों पर उत्तम हार विराजमान
हैं. जैसे वर्षा करने वाले मेघों के साथ बिजली शोभा देती है, उसी प्रकार जल प्रदान के समय
तुम भी अपने आयुधों से सुशोभित होते हो. (१३)
प्र बुध्न्या व ईरते महांसि प्र नामानि प्रयज्यवस्तिरध्वम्.
सहस्त्रियं दम्यं भागमेतं गृहमेधीयं मरुतो जुषध्वम्.. (१४)
हे मरुतो! अंतरिक्ष में उत्पन्न होने वाले तुम्हारे तेज विशेषरूप से गति करते हैं. हे विशेष
यज्ञपात्र मरुतो! तुम जलों को बढ़ाओ. हे मरुतो! गृहस्वामियों द्वारा दिए गए घर में उत्पन्न एवं
हजार संख्या वाले यज्ञ का एक भाग सेवन करो. (१४)
यदि स्तुतस्य मरुतो अधीथेत्था विप्रस्य वाजिनो हवीमन्.
मक्षू रायः सुवीर्यस्य दात नू चिद्यमन्य आदभद्रावा.. (१५)
हे मरुतो! तुम अन्नयुक्त मेधावी स्तोता के हव्यसहित स्तोत्र को जानते हो. इसलिए उस
शोभनपुत्र वाले को शीघ्र धन दो. शत्रु उस धन को नष्ट न करें. (१५)
अत्यासो न ये मरुतः स्वञ्चो यक्षदृशो न शुभयन्त मर्याः.
ते हर्म्येष्ठाः शिशवो न शुभ्रा वत्सासो न प्रक्रीळिनः पयोधाम.. (१६)
जो मरुद्गण सतत गतिशील घोड़े के समान शोभनगति वाले, उत्सव देखने वाले,
मनुष्यों के समान शोभाशाली एवं घर में रहने वाले बच्चों के समान शोभित हैं, वे खेलते हुए
बालकों के समान एवं जल धारणकर्त्ता हैं. (१६)
दशस्यन्तो नो मरुतो मृळन्तु वरिवस्यन्तो रोदसी सुमेके.
आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु सुम्नेभिरस्मे वसवो नमध्वम्.. (१७)
संपत्तियां देते हुए एवं अपनी महिमा से सुंदर द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करते हुए मरुद्गण
हमें सुखी करें. हे मरुतो! तुम्हारा मानवनाशक एवं गोनाशक आयुध हमसे दूर रहे. हे
वासदाता मरुतो! तुम सुखों के साथ हमारे सामने आओ. (१७)
आ वो होता जोहवीति सत्त: सत्राचीं रातिं मरुतो गृणानः.
य ईवतो वृष्णो अस्ति गोपाः सो अद्वयावी हवते व उक्थैः.. (१८)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1100Permalink

हे मरुतो! यज्ञशाला में बैठा हुआ होता तुम्हारे सब जगह जाने वाले दान की प्रशंसा
करता हुआ तुम्हें बार-बार बुलाता है. हे अभिलाषापूरक मरुतो! जो यज्ञकर्त्ता यजमान का
रक्षक है, वह होता मायारहित होकर स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करता है. (१८)
इमे तुरं मरुतो रामयन्तीमे सहः सहस आ नमन्ति.
इमे शंसं वनुष्यतो नि पान्ति गुरु द्वेषो अररुषे दधन्ति.. (१९)
ये मरुद्गण शीघ्रतापूर्वक यज्ञ करने वाले यजमान को प्रसन्न करते हैं एवं शक्तिशाली
लोगों को शक्ति द्वारा झुकाते हैं. ये स्तोता को हिंसकों से बचाते हैं, पर हव्य न देने वाले मनुष्य
के प्रति बहुत द्वेष रखते हैं. (१९)
इमे रध्रं चिन्मरुतो जुनन्ति भूमिं चिद्यथा वसवो जुषन्त.
अप बाधध्वं वृषणस्तमांसि धत्त विश्वं तनयं तोकमस्मे.. (२०)
ये मरुद्गण धनी और निर्धन दोनों को प्रेरणा देते हैं. हे वासदाता एवं कामपूरक मरुतो!
देवगण जैसा चाहते हैं, उसी के अनुसार तुम अंधकार मिटाओ तथा हमें अधिक मात्रा में पुत्र-
पौत्र दो. (२०)
मा वो दात्रान्मरुतो निरराम मा पश्चादघ्म रथ्यो विभागे.
आ नः स्पार्हं भजतना वसव्ये३ यदीं सुजातं वृषणो वो अस्ति.. (२१)
हे मरुतो! हम तुम्हारे दान की सीमा से बाहर न रहें. हे रथस्वामी मरुतो! धन बांटते
समय हमें पीछे मत रखना एवं चाहने योग्य धनों का स्वामी बनाना. हे अभिलाषापूरक
मरुतो! तुम हमें अपने शोभन उत्पत्ति वाले धन का भागी बनाना, (२१)
सं यद्धनन्त मन्युभिर्जनासः शूरा यह्वीष्वोषधीषु विक्षु.
अध स्मा नो मरुतो रुद्रियासस्त्रातारो भूत पृतनास्वर्यः.. (२२)
हे रुद्रपुत्र मरुतो! जिस समय शूर लोग युद्ध में अनेक ओषधियों एवं प्रजा को जीतने के
लिए क्रोधयुक्त होते हैं, उस समय तुम शत्रुओं से हमारी रक्षा करना. (२२)
भूरि चक्र मरुतः पित्र्याण्युक्थानि या वः शस्यन्ते पुरा चित्.
मरुद्भिरुग्रः पृतनासु साळ्हा मरुद्भिरित्सनिता वाजमर्वा.. (२३)
हे मरुतो! तुमने हमारे पितरों के कल्याण के लिए बहुत से काम किए थे. तुम्हारे जिन
प्राचीन कार्यों की प्रशंसा की जाती है, उन्हें भी तुम्हीं ने किया था. तुम्हारी सहायता से तेजस्वी
लोग युद्ध में शत्रुओं को हराते हैं एवं स्तोता अन्न प्राप्त करता है. (२३)
अस्मे वीरो मरुतः शुष्यस्त्वस्तु जनानां यो असुरो विधर्ता.
अपो येन सुक्षितये तरेमाध स्वमोको अभि वः स्याम.. (२४)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1101Permalink

हे मरुतो! हमारा पुत्र शक्तिशाली हो. वह बुद्धिमान् एवं शत्रुओं को सहन करने वाला हो.
हम शोभननिवास पाने के लिए उसकी सहायता से शत्रुओं को वश में करेंगे एवं तुम्हारी
आत्मीयता का स्थान प्राप्त करेंगे. (२४)
तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निरप ओषधीर्वनिनो जुषन्त.
शर्मन्त्स्याम मरुतामुपस्थे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२५)
इंद्र, वरुण, मित्र, अग्नि, जल, ओषधियां एवं वृक्ष हमारे स्तोत्र को सुनें. मरुतों के समीप
रहकर हम सुखी रहेंगे. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (२५)
सूक्त—५७ देवता—मरुद्गण
मध्वो वो नाम मारुतं यवत्राः प्र यज्ञेषु शवसा मदन्ति.
ये रेजयन्ति रोदसी चिदुर्वी पिन्वन्त्युत्सं यदयांसुरुग्राः.. (१)
हे यज्ञपात्र मरुतो! प्रमुदित स्तोता यज्ञ में तुम्हारी स्तुति शक्ति द्वारा करते हैं. वे मरुद्गण
विस्तृत द्यावा-पृथिवी को कंपित करते हैं, बादलों से जल बरसाते हैं एवं उग्र बनकर सब
जगह जाते हैं. (१)
निचेतारो हि मरुतो गृणन्तं प्रणेतारी यजमानस्य मन्म.
अस्माकमद्य विदथेषु बर्हिरा वीतये सदत पिप्रियाणाः.. (२)
मरुद्गण स्तुति करने वाले मनुष्य को खोजते हैं एवं यजमान की कामना पूरी करते हैं.
हे मरुतो! तुम लोग प्रसन्न होकर सोमरस पीने के लिए हमारे यज्ञ में कुशों पर बैठो. (२)
नैतावदन्ये मरुतो यथेमे भ्राजन्ते रुक्मैरायुधैस्तनूभिः.
आ रोदसी विश्वपिशः पिशानाः समानमञ्ज्यञ्जते शुभे कम्.. (३)
ये मरुद्गण जितना दान करते हैं, उतना दूसरे लोग नहीं करते. ये अपने हारों, अलंकारों
एवं शरीरों से सुशोभित होते हैं. व्याप्त दीप्तिवाले मरुद्गण द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करते
हुए शोभा के लिए समान आभूषण धारण करते हैं. (३)
ऋधक्सा वो मरुतो दिद्युदस्तु यद्व आगः पुरुषता कराम.
मा वस्तस्यामपि भूमा यजत्रा अस्मे वो अस्तु सुमतिश्चनिष्ठा.. (४)
हे मरुतो! तुम्हारा प्रसिद्ध आयुध हमसे दूर रहे. यज्ञपात्र मरुतो! यद्यपि मनुष्य होने के
कारण हम बहुत सी भूल करते हैं, पर हम तुम्हारे आयुध के लक्ष्य न हों. तुम्हारी अधिक अन्न
देने वाली कृपा हमारी है. (४)
कृते चिदत्र मरुतो रणन्तानवद्यासः शुचयः पावकाः.

Page 1102Permalink

प्र णोऽवत सुमतिभिर्यजत्राः प्र वाजेभिस्तिरत पुष्यसे नः.. (५)
मरुद्गण हमारे यज्ञकर्म से प्रसन्न हों. मरुद्गण निंदारहित, शुद्ध एवं दूसरों को पवित्र
करने वाले हैं. हे यज्ञपात्र मरुतो! हमारी स्तुतियों के कारण हमारी रक्षा विशेषरूप से करो एवं
हमें अन्न के द्वारा पुष्ट होने के लिए बढ़ाओ. (५)
उत स्तुतासो मरुतो व्यन्तु विश्वेभिर्नामभिर्नरो हवींषि.
ददात नो अमृतस्य प्रजायै जिगृत रायः सूनृता मघानि.. (६)
वे मरुद्गण हमारी स्तुति सुनकर हव्य भक्षण करें। नेता मरुद्गण जलों के साथ वर्तमान
हैं. हे मरुतो! हमारी प्रजा के लिए उदक दो तथा हव्यदाता यजमान को सत्व एवं धनदान
करो. (६)
आ स्तुतासो मरुतो विश्व ऊती अच्छा सूरीन्त्सर्वताता जिगात.
ये नस्त्मना शतिनो वर्धयन्ति यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे मरुतो! तुम स्तुति सुनकर समस्त रक्षासाधनों के साथ यज्ञ में आओ तथा अपने
स्तोताओं को अपने आप सैकड़ों सुखों से युक्त करो. तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी
सदा रक्षा करो. (७)
सूक्त—५८ देवता—मरुद्गण
प्र साकमुक्षे अर्चता गणाय यो दैव्यस्य धाम्नस्तुविष्मान्.
उत क्षोदन्ति रोदसी महित्वा नक्षन्ते नाकं निर्ऋतेरवंशात्.. (१)
हे स्तोताओ! तुम सदा वर्षा करने वाले मरुद्गण की पूजा करो. वे देवस्थान स्वर्ग में
सबसे अधिक बुद्धिमान् हैं. वे अपनी महिमा से द्यावा-पृथिवी को भी भग्न कर देते हैं. वे स्वर्ग
को धरती और अंतरिक्ष की अपेक्षा अधिक व्याप्त बना देते हैं. (१)
जनूश्चिद्द्रो मरुतस्त्वेष्येण भीमासस्तुविमन्यवोऽयासः.
प्र ये महोभिरोजसोत सन्ति विश्वो वो यामन्भयते स्वर्दृक्.. (२)
हे भयानक, अधिक बुद्धि वाले एवं गतिशील मरुतो! तुम्हारा जन्म तेज वाले रुद्रों से
हुआ है. तुम तेज एवं बल से प्रभावशाली हुए हो. तुम्हारे गमन में सूर्य को देखने वाले सब
लोग डरते हैं. (२)
बृहद्वयो मघवद्भयो दधात जुजोषन्निन्मरुतः सुष्टुतिं नः.
गतो नाध्वा वि तिराति जन्तुं प्र णः स्पार्हाभिरूतिभिस्तिरेत.. (३)
हे मरुतो! तुम हव्य धारण करने वाले को बहुत सा अन्न दो एवं हमारी शोभनस्तुति को
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1103Permalink

अवश्य सुनो, जिस मार्ग से मरुद्गण जाते हैं, वह प्राणियों को कभी नष्ट नहीं करता. वे अपने
चाहने योग्य रक्षासाधनों से हमें बढ़ावें. (३)
युष्मोतो विप्रो मरुतः शतस्वी युष्मोतो अर्वा सहुरिः सहस्री.
युष्मोतः सम्राळुत हन्ति वृत्रं प्र तद्द्रो अस्तु धूतयो देष्णम्.. (४)
हे मरुतो! तुम्हारे द्वारा रक्षित स्तोता सैकड़ों धनों का स्वामी होता है. तुम्हारी रक्षा पाकर
वह आक्रमण करने वाला, शत्रु-पराजयकारी, साहसी एवं हजारों धनों का स्वामी बनता है.
तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर वह सम्राट् एवं शत्रुहंता बनता है. हे कंपाने वाले मरुतो! तुम्हारा
दिया हुआ धन बढ़े. (४)
ताँ आ रुद्रस्य मीळ्हुषो विवासे कुविन्नृसन्ते मरुतः पुनर्नः.
यत्सस्वर्ता जिहीळिरे यदाविरव तदेन ईमहे तुराणाम्.. (५)
मैं अभिलाषापूरक रुद्रों की सेवा करता हूं. वे कई बार हमारे सामने आवें. जिस महान्
पाप से मरुद्गण नाराज होते हैं, वह पाप हम अपने स्तोत्र द्वारा नष्ट कर देंगे. (५)
प्र सा वाचि सुष्टुतिर्मघोनामिदं सूक्तं मरुतो जुषन्त.
आराच्चिद्द्वेषो वृषणो युयोत यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हमने धनस्वामी मरुतों की शोभनस्तुति इस स्तोत्र में गाई है. वे उसे स्वीकार करें. हे
अभिलाषापूरक मरुतो! तुम शत्रुओं को दूर से ही अलग कर दो. तुम अपने कल्याणसाधनों
द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (६)
सूक्त—५९ देवता—मरुद्गण
यं त्रायध्व इदमिदं देवासो यं च नयथ.
तस्मा अग्ने वरुण मित्रार्यमन्मरुतः शर्म यच्छत.. (१)
हे देवो! स्तोता को भय से बचाओ. हे मरुतो! तुम अग्नि, वरुण, मित्र और अर्यमा जिसे
अच्छे मार्ग पर ले आते हो, उसे सुख दो. (१)
युष्माकं देवा अवसाहनि प्रिय ईजानस्तरति द्विषः.
प्र स क्षयं तिरते वि महीरिषो यो वो वराय दाशति.. (२)
हे देवो! तुम्हारे द्वारा रक्षित प्रियदिन में जो यज्ञ करता है, जो शत्रुओं पर आक्रमण
करता है, जो अपने निवासस्थान को बढ़ाता है, वह तुम्हें अधिक हव्य इसलिए देता है कि
तुम्हें दूसरी जगह जाने से रोक सके. (२)
नहि वश्चरमं चन वसिष्ठः परिमंसते.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1104Permalink

अस्माकमद्य मरुतः सुते सचा विश्वे पिबत कामिनः.. (३)
हे मरुतो! तुम में जो अवर है, मैं उसे छोड़कर भी स्तुति नहीं करता. हमारा सोम निचुड़
जाने पर तुम सब सोमाभिलाषी बनकर एवं मिलकर उसे पिओ. (३)
नहि व ऊतिः पृतनासु मर्षति यस्मा अराध्वं नरः.
अभि व आवर्तृमतिर्नवीयसी तूयं यात पिपीषवः.. (४)
हे नेता मरुतो! जिसे तुम अभिलषित धन देते हो, उसे तुम्हारी रक्षा युद्ध में शत्रुओं से
चाहती है. तुम्हारी नवीन कृपा हमारे सामने आवे. हे सोमपान के अभिलाषी मरुतो! तुम
जल्दी आओ. (४)
ओ षु घृष्विराधसो यातानन्धांसि पीतये.
इमा वो हव्या मरुतो ररे हि कं मो ष्वन्यत्र गन्तन.. (५)
हे परस्पर मिले हुए धन वाले मरुतो! तुम सोमरूपी हव्य भोगने के लिए भली प्रकार
आओ. मैं तुम्हें यह हवि देता हूं. तुम दूसरी जगह मत जाओ. (५)
आ च नो बर्हिः सदताविता च नः स्पार्हाणि दातवे वसु.
असेधन्तो मरुतः सोम्ये मधौ स्वाहेह मादयाध्वै.. (६)
हे मरुतो! हमारे कुशों पर बैठो. तुम हमारा चाहा हुआ धन देने के लिए हमारे समीप
आओ. इस यज्ञ में तुम मदकारक सोमरस को स्वाहा कहकर पिओ और प्रमुदित बनो. (६)
सस्वश्चिद्धि तन्व१ः शुम्भमाना आ हंसासो नीलपृष्ठा अपप्तन्.
विश्वं शर्धो अभितो मा नि षेद नरो न रण्वाः सवने मदन्तः.. (७)
हे छिपे हुए मरुतो! तुम अपने अंगों को अलंकारों से सुशोभित करते हुए नीले रंग वाले
हंसों के समान आओ. मेरे यज्ञ में जिस तरह सब मनुष्य प्रसन्न हैं, उसी प्रकार मरुद्गण भी
आकर बैठें. (७)
यो नो मरुतो अभि दुर्हृणायुस्तिरश्चित्तानि वसवो जिघांसति.
द्रुहः पाशान्प्रति स मुचीष्ट तपिष्ठेन हन्मना हन्तना तम्.. (८)
हे प्रशंसा के योग्य मरुतो! सबके द्वारा तिरस्कृत जो आदमी अशोभन रूप से क्रोध
करके हमारे चित्त को दुःखी करना चाहता है, वह पापों के द्रोही वरुण देव के पाशों से हमें
बांधेगा. तुम उसे तापकारी आयुध से मारो. (८)
सान्तपना इदं हविर्मरुतस्तज्जुजुष्टन. युष्माकोती रिशादसः.. (९)
हे शत्रुतापक मरुतो! यही तुम्हारा हवि है. हे शत्रुक्षक मरुतो! तुम अपनी रक्षा द्वारा
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1105Permalink

हमारे हवि का सेवन करो. (९)
गृहमेधास आ गत मरुतो माप भूतन. युष्माकोती सुदानव:.. (१०)
हे शोभनदान वाले मरुतो! तुम्हारा यज्ञ घर में किया जाता है. तुम अपनी रक्षाओं सहित
आओ, जाओ मत. (१०)
इहेह व: स्वतवस: कवय: सूर्यत्वच:. यज्ञं मरुत आ वृणे.. (११)
हे स्वयं बढ़े हुए, क्रांतदर्शी एवं सूर्य के रंग वाले मरुतो! मैं यज्ञ की कल्पना करता हूं.
(११)
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्.. (१२)
हम सुगंधि वाले एवं पुष्टि बढ़ाने वाले त्र्यंबक का यज्ञ करते हैं. हे रुद्र देव! जैसे डंठल से
बेर टूटता है, उसी प्रकार हमें मृत्युबंधन से मुक्त करो, अमृत से नहीं. (१२)
सूक्त—६० देवता—सूर्य आदि
यदद्य सूर्य ब्रवोऽनागा उद्यन्मित्राय वरुणाय सत्यम्.
वयं देवत्रादिते स्याम तव प्रियासो अर्यमन् गृणन्त:.. (१)
हे सूर्य देव! आज उदय होते हुए तुम यदि हमें सब देवों के मध्य पापरहित कहो तो हे
दीनतारहित सूर्य! हम मित्र व वरुण के लिए वास्तव में निष्पाप हो जाएंगे. हे अर्यमा! हम
तुम्हारी स्तुति करते हुए सबके प्रिय हों. (१)
एष स्य मित्रावरुणा नृचक्षा उभे उदेति सूर्यो अभि जमन्.
विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च गोपा ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन्.. (२)
हे मित्र व वरुण! ये ही मानवों के देखने वाले सूर्य द्यावा-पृथिवी की ओर उदित होते हैं.
सूर्य सब स्थावर एवं गतिशील प्राणियों के पालनकर्त्ता हैं तथा मानवों में पाप और पुण्य देखते
हैं. (२)
अयुक्त सप्त हरित: सधस्थाद्या ईं वहन्ति सूर्यं घृताची:.
धामानि मित्रावरुणा युवाकु: सं यो यूथेव जनिमानि चष्टे.. (३)
हे मित्र व वरुण! सूर्य ने अंतरिक्ष में हरे रंग के सात घोड़ों को अपने रथ में जोता है.
जल प्रदान करने वाले वे घोड़े सूर्य को ढोते हैं. तुम दोनों की अभिलाषा करने वाले सूर्य उदित
होकर लोकों एवं प्राणियों को इस प्रकार देखते हैं, जिस प्रकार ग्वाला गायों के समूह को

Page 1106Permalink

देखता है. (३)
उद्द्वां पृक्षासो मधुमन्तो अस्थुरा सूर्यो अरुहच्छुक्रमर्णः.
यस्मा आदित्या अध्वनो रदन्ति मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः.. (४)
हे मित्र व वरुण! तुम दोनों के लिए अन्न एवं मीठे पुरोडाश तैयार किए गए थे. सूर्य
दीप्तिशाली अंतरिक्ष में आरोहण करते हैं एवं मित्र, अर्यमा व वरुण समान प्रीति वाले होकर
उनके लिए मार्ग निश्चित करते हैं. (४)
इमे चेतारो अनृतस्य भूरेर्मित्रो अर्यमा वरुणो हि सन्ति.
इम ऋतस्य वावृधुर्दुरोणे शग्मासः पुत्रा अदितेरदब्धाः.. (५)
ये मित्र, वरुण और अर्यमा अधिक पाप के नाशक हैं. सुखकारक, अपराजित एवं
अदितिपुत्र ये सब यज्ञभवन में वृद्धि प्राप्त करते हैं. (५)
इमे मित्रो वरुणो दूळभासोऽचेतसं चिच्चितयन्ति दक्षैः.
अपि क्रतुं सुचेतसं वतन्तस्तिरश्चिदंहः सुपथा नयन्ति.. (६)
ये आदित्य, मित्र और वरुण किसी से हारने वाले नहीं हैं. ये अपनी शक्ति से ज्ञानरहित
को भी ज्ञानी बना देते हैं एवं यज्ञकर्त्ता तथा शोभनज्ञान वाले के पास पहुंचकर उसके पाप का
नाश करते हुए उत्तम मार्ग पर ले जाते हैं. (६)
इमे दिवो अनिमिषा पृथिव्याश्चिकित्वांसो अचेतसं नयन्ति.
प्रव्राजे चिन्नद्यो गाधमस्ति पारं नो अस्य विष्पितस्य पर्षन्.. (७)
ये मित्रादि पृथ्वी एवं अंतरिक्ष के प्राणियों को सर्वदा जानते हुए अज्ञानी व्यक्तियों को
यज्ञकर्म में प्रेरित करते हैं. इनकी सामर्थ्य से नदी के नीचे गहराई में भी धरातल होता है. ये
हमें विस्तृत यज्ञकर्म के पार पहुंचाते हैं. (७)
यद् गोपावददितिः शर्म भद्रं मित्रो यच्छन्ति वरुणः सुदासे.
तस्मिन्ना तोकं तनयं दधाना मा कर्म देवहेळनं तुरासः.. (८)
अर्यमा, मित्र एवं वरुण हव्यदाता यजमान को रक्षासाधनों से युक्त एवं कल्याणकारी
सुख देते हैं, उसी सुख के साथ हम पुत्र-पौत्रों को धारण करते हुए कोई ऐसा कर्म न करें जो
तुम शीघ्रता करने वाले देवों को नाराज कर दे. (८)
अव वेदिं होत्राभिर्यजेत रिपः काश्चिद्दरुणधृतः सः.
परि द्वेषोभिरर्यमा वृणक्तूरुं सुदासे वृषणा उ लोकम्.. (९)
हे देवो! हमसे द्वेष रखने वाला जो व्यक्ति यज्ञवेदी पर कर्म करता हुआ देवों की स्तुति
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1107Permalink

नहीं करे, वह वरुण के द्वारा हिंसित होकर समाप्त हो जावे. अर्यमा हमें द्वेष करने वाले
राक्षसों से अलग रखें. हे कामपूरक मित्र व वरुण! मुझ हव्यदाता को तुम विस्तृत स्थान प्रदान
करो. (९)
सस्वश्चिद्धि समृतिस्त्वेषाेषामपीच्येन सहसा सहन्ते.
युष्मद्विया वृषणो रेजमाना दक्षस्य चिन्महिना मृळता नः.. (१०)
इन मित्रादि देवों की संगति निगूढ़ एवं दीप्त होती है. वे अपने छिपे हुए बल से शत्रुओं
को पराजित करते हैं. हे अभिलाषापूरक मित्रादि देवो! हमारे विरोधी तुम्हारे डर से कांप जाते
हैं. तुम अपने बल के महत्त्व से हमें सुखी बनाओ. (१०)
यो ब्रह्मणे सुमतिमायजाते वाजस्य सातौ परमस्य रायः.
सीक्षन्त मन्युं मघवानो अर्य उरु क्षयाय चक्रिरे सुधातु.. (११)
जो यजमान अन्न एवं उत्कृष्ट धन की प्राप्ति के लिए तुम्हारी स्तुति में अपनी शोभनबुद्धि
लगाता है, धनस्वामी अर्यमा आदि उसकी स्तुति स्वीकार करते हैं एवं उसके विस्तृत निवास
के लिए उत्तम स्थान बनाते हैं. (११)
इयं देव पुरोहितिर्युवभ्यां यज्ञेषु मित्रावरुणावकारि.
विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१२)
हे मित्र व वरुणदेव! तुम्हारे यज्ञ में यह पूजारूपी स्तुति की गई है. इसे स्वीकार करके
हमारे सभी दुःखों को नष्ट करो. (१२)
सूक्त—६१ देवता—मित्र व वरुण
उद्वां चक्षुर्वरुण सुप्रतीकं देवयोरेति सूर्यस्ततन्वान्.
अभि यो विश्वा भुवनानि चष्टे स मन्युं मर्त्येष्व चिकेत.. (१)
हे द्योतमान मित्र व वरुण! तुम्हारे चक्षु रूप एवं सौंदर्ययुक्त तेज का विस्तार करते हुए
उदय होते हैं. जो सूर्य सारे लोकों को देखते हैं, वे मनुष्यों की स्तुतियों को भली प्रकार जानते
हैं. (१)
प्र वां स मित्रावरुणावृतावा विप्रो मन्मानि दीर्घश्रुदियर्ति.
यस्य ब्रह्माणि सुक्रतू अवाथ आ यत्क्रत्वा न शरदः पृणैथे.. (२)
हे मित्र व वरुण! प्रसिद्ध, मेधावी, यज्ञकर्त्ता एवं चिरकाल तक सुनने वाले वसिष्ठ तुम्हारे
लिए स्तुतियां बोलते हैं. शोभनकर्म वाले तुम दोनों उनकी स्तुति की रक्षा करते हो एवं अनेक
वर्षों से उनका यज्ञ पूर्ण कर रहे हो. (२)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1108Permalink

प्रोरौर्मित्रावरुणा पृथिव्याः प्र दिव ऋष्वाद्वृहतः सुदानू.
स्पशो दधाथे ओषधीषु विश्वध्वग्यतो अनिमिषं रक्षमाणा.. (३)
हे मित्र व वरुण! तुमने विस्तृत पृथ्वी एवं गुण तथा रूप के कारण विशाल अंतरिक्ष की
परिक्रमा की है. हे शोभनदान वाले देवी! तुम दोनों सत्य पर चलने वाले का सदा पालन करते
हुए ओषधियों एवं प्रजा के रूप धारण करते हो. (३)
शंसा मित्रस्य वरुणस्य कम शुष्मो रोदसी बद्बधे महित्वा.
अयन्मासा अयज्वनामवीराः प्र यज्ञमन्मा वृजनं तिराते.. (४)
हे ऋषि! तुम मित्र एवं वरुण के तेज की प्रशंसा करो. उनकी शक्ति अपने महत्त्व के
द्वारा द्यावा-पृथिवी को अलग-अलग धारण करती है. यज्ञ न करने वाले के मास बिना पुत्रों के
बीतें. यज्ञ के प्रति उनकी बुद्धि बल बढ़ावे. (४)
अमूरा विश्वा वृषणाविमा वां न यासु चित्रं ददृशे न यक्षम्.
द्रुहः सचन्ते अनृता जनानां न वां निण्यान्यचिते अभूवन्.. (५)
हे मूढ़तारहित, व्यापक एवं अभिलाषापूरक मित्र व वरुण! तुम्हारी स्तुतियों में आश्चर्य
एवं आदर दिखाई नहीं देता. अर्थात् तुम्हारी स्तुतियां सच्ची हैं. लोगों की झूठी स्तुति तुम्हारे
शत्रु स्वीकार करते हैं. तुम्हारे प्रति किए गए स्तोत्र रहस्यपूर्ण होते हुए भी अज्ञान के कारण न
बनें. (५)
समु वां यज्ञं महयं नमोभिर्हुवे वां मित्रावरुणा सबाधः.
प्र वां मन्मान्युचसे नवानि कृतानि ब्रह्म जुजुषन्निमानि.. (६)
हे मित्र व वरुण! मैं स्तुतियों के द्वारा तुम्हारे यज्ञ की पूजा करता हूं एवं बाधा के
निवारण हेतु तुम्हें बुलाता हूं. मैंने तुम्हारे लिए नए स्तोत्र बनाए हैं. मेरे द्वारा एकत्रित स्तुतियां
तुम्हें प्रसन्न करें. (६)
इयं देव पुरोहितिर्युवभ्यां यज्ञेषु मित्रावरुणावकारि.
विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७)
हे मित्र व वरुण देव! तुम्हारे यज्ञ में यह पूजारूपी स्तुति की गई है. इसे स्वीकार करके
हमारे सभी दुःखों को नष्ट करो एवं अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७)
सूक्त—६२ देवता—मित्र व वरुण
उत्सूर्यो बृहदर्चींष्यश्रेत्पुरु विश्वा जनिम मानुषाणाम्.
समो दिवा ददृशे रोचमानः क्रत्वा कृतः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1109Permalink

सूर्य ऊपर की ओर उठते हुए विस्तृत एवं अधिक तेज का आश्रय लें एवं मानवों के
सभी समूहों को सहारा दें. वे दिन में चमकते हुए समान दिखाई देते हैं. वे प्रजापति द्वारा की
गई स्तुतियां सुनकर तीव्र बनें. (१)
स सूर्य प्रति पुरो न उद्गा एभिः स्तोमेभिरेतशेभिरेवैः.
प्र नो मित्राय वरुणाय वोचोऽनागसो अर्यम्णे अग्नये च.. (२)
हे सूर्य! इन स्तोत्ररूपी गतिशील अश्वों के द्वारा तुम ऊपर उठते हुए हम सबके सामने
गमन करो. तुम मित्र, वरुण, अर्यमा एवं अग्नि के पास जाकर हमें निरपराध बताना. (२)
वि नः सहस्रं शुरुधो रदन्त्वृतावानो वरुणो मित्रो अग्निः.
यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्कमा नः कामं पूपुरन्तु स्तवानाः.. (३)
दुःख रोकने वाले एवं सत्ययुक्त वरुण, मित्र तथा अग्नि हमें हजारों की संख्या में धन दें.
वे प्रसन्नताकारक देव हमें प्रशंसनीय एवं आदरयोग्य वस्तुएं दें तथा हमारी स्तुति सुनकर
हमारी अभिलाषाएं पूरी करें. (३)
द्यावाभूमी अदिते त्रासीथां नो ये वां जज्ञुः सुजनिमान ऋष्वे.
मा हेळे भूम वरुणस्य वायोर्मा मित्रस्य प्रियतमस्य नृणाम्.. (४)
हे अखंडनीय एवं महती द्यावा-पृथिवी! हम सुंदर जन्म वाले तुम्हें जानते हैं. तुम हमारी
रक्षा करो. हम वरुण, वायु एवं मानवों के प्रिय मित्र के क्रोध के पात्र न बनें. (४)
प्र बाहवा सिसृतं जीवसे न आ नो गव्यूतिमुक्षतं घृतेन.
आ नो जने श्रवयतं युवाना श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमा.. (५)
हे मित्र व वरुण! अपनी भुजाएं फैलाओ एवं हमारे जीवन के लिए उस भूमि को जल से
सींचो, जिस पर हमारी गाएं चलती हैं. तुम हमें मनुष्यों में प्रसिद्ध बनाओ. हे नित्य तरुणो!
हमारी पुकार सुनो. (५)
नू मित्रो वरुणो अर्यमा नस्त्मने तोकाय वरिवो दधन्तु.
सुगा नो विश्वा सुपथानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
मित्र, वरुण एवं अर्यमा हमारे लिए एवं हमारे पुत्रों के लिए धन दें. सभी मार्ग हमारे लिए
उत्तम एवं चलने में सरल हों. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो.
(६)
सूक्त—६३ देवता—सूर्य व वरुण
उद्वेति सुभगो विश्वचक्षाः साधारणः सूर्यो मानुषाणाम्.
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1110Permalink

चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्य देवश्चर्मेव यः समविव्यक् तमांसि.. (१)
शोभनभाग्य वाले, सब मनुष्यों के प्रति समान, मित्र एवं वरुण के चक्षु के समान एवं
दीप्तिशाली सूर्य उदित हो रहे हैं. वे चमड़े के समान अंधकार को लपेटते हैं. (१)
उद्वेति प्रसवीता जनानां महान् केतुरर्णवः सूर्यस्य.
समानं चक्रं पर्याविवृत्सन्यदेतशो वहति धूर्षु युक्तः.. (२)
मनुष्यों को अपने-अपने काम में लगाने वाले, पूज्य, ज्ञापन एवं जल देने वाले सूर्य
सबके पहियों को समान रूप से चलाने की इच्छा से उदित होते हैं. रथ में जुड़े हुए हरे रंग के
घोड़े सूर्य को खींचते हैं. (२)
विभ्राजमान उषसामुपस्थाद् रेभैरुदेत्यनुमद्यमानः.
एष मे देवः सविता चच्छन्द यः समानं न प्रमिनाति धाम.. (३)
अतिशय दीप्तिशाली ये सूर्य स्तोताओं की स्तुतियां सुनकर प्रमुदित होते हुए उषाओं के
बीच में उदित होते हैं. ये सविता देव मेरी अभिलाषाएं पूरी करते हैं. ये सभी प्राणियों के लिए
एकरूप अपने तेज को संकुचित नहीं करते. (३)
दिवो रुक्म उरुचक्षा उदेति दूरे अर्थस्तरणिर्भ्राजमानः.
नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता अयन्नर्थानि कृणवन्नपांसि.. (४)
अति तेजस्वी, दीप्तिशाली, दूर तक जाने वाले एवं तारक सूर्य अंतरिक्ष में चमकते हुए
उदित होते हैं. सूर्य से उत्पन्न लोग निश्चय ही कर्त्तव्य समझकर कर्म करते हैं. (४)
यत्रा चक्रुरमृता गातुमस्मै श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः.
प्रति वां सूर उदिते विधेम नमोभिर्मित्रावरुणोत हव्यैः.. (५)
मरणरहित देवों ने अंतरिक्ष में सूर्य के लिए मार्ग बनाया था. वह मार्ग उड़ते हुए गिद्ध के
समान अंतरिक्ष का अनुगमन करता है. हे मित्र व वरुण! सूर्य के उदय होने पर हम नमस्कारों
व हव्यों द्वारा तुम्हारी सेवा करेंगे. (५)
नू मित्रो वरुणो अर्यमा नस्त्मने तोकाय वरिवो दधन्तु.
सुगा नो विश्वा सुपथानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
मित्र, वरुण एवं अर्यमा हमारे लिए तथा हमारे पुत्रों के लिए धन दें. सभी मार्ग हमारे
लिए उत्तम एवं चलने में सरल हों. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो.
(६)
सूक्त—६४ देवता—मित्र व वरुण
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1111Permalink

दिवि क्षयन्ता रजसः पृथिव्यां प्र वां घृतस्य निर्णिजो ददीरन्.
हव्यं नो मित्रो अर्यमा सुजातो राजा सुक्षत्रो वरुणो जुषन्त.. (१)
हे मित्र व वरुण! तुम अंतरिक्ष एवं पृथ्वी में व्याप्त जल के स्वामी हो. तुम्हारी प्रेरणा से
मेघ जल को रूप देता है. हमारे हव्य को मित्र, शोभनजन्म वाले अर्यमा, राजा एवं
शोभनशक्ति वाले वरुण स्वीकार करें. (१)
आ राजाना मह ऋतस्य गोपा सिन्धुपती क्षत्रिया यातमर्वाक्.
इळां नो मित्रावरुणोत वृष्टिमव दिव इन्वतं जीरदानू.. (२)
हे राजन्, महान् यज्ञ के रक्षक, नदियों के पालनकर्त्ता एवं शक्तिशाली मित्र व वरुण!
तुम हमारे सामने आओ. हे शीघ्र दान करने वाले मित्र व वरुण! तुम आकाश से हमें अन्न और
वृष्टि दो. (२)
मित्रस्तन्नो वरुणो देवो अर्यः प्र साधिष्ठेभिः पथिभिर्नयन्तु.
ब्रवद्यथा न आदरिः सुदास इषा मदेम सह देवगोपाः.. (३)
मित्र, वरुण और अर्यमा हमें चाहे जब श्रेष्ठ मार्ग द्वारा ले जावें. अर्यमा शोभन दाता के
पास जाकर हमारी बात कहें. हम देवों द्वारा रक्षित होकर उनके दिए अन्न एवं संतान के साथ
प्रसन्न हों. (३)
यो वां गर्तं मनसा तक्षदेतन्मूर्ध्वां धीतिं कृणवद्धारयच्च.
उक्षेथां मित्रावरुणा घृतेन ता राजाना सुक्षितीस्तर्पयेथाम्.. (४)
हे शास्ता मित्र व वरुण! स्तुतियों के साथ जो तुम्हारा रथ बनाता है, तुम्हारे निमित्त श्रेष्ठ
कर्म करता है एवं यज्ञ में तुम्हें धारण करता है, उसे जल से सींचो एवं शोभननिवास वाला
बनाकर तृप्त करो. (४)
एष स्तोमो वरुण मित्र तुभ्यं सोमः शुक्रो न वायवेऽयामि.
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे मित्र व वरुण! यह स्तोत्र मैंने तुम दोनों एवं वायु के लिए किया है. यह सोम के समान
दीप्त है. तुम हमारे यज्ञ में आओ, हमारी स्तुति को जानो एवं अपने कल्याणसाधनों द्वारा
हमारी सदा रक्षा करो. (५)
सूक्त—६५ देवता—मित्र व वरुण
प्रति वां सूर उदिते सूक्तैर्मित्रं हुवे वरुणं पूतदक्षम्.
ययोरसुर्यं १ मक्षितं ज्येष्ठं विश्वस्य यामन्नाचिता जिगत्नु.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1112Permalink

सूर्य निकल आने पर मैं उसे एवं पवित्र शक्ति वाले वरुण को बुलाता हूं. इनका बल
क्षीण न होने वाला एवं अधिक है. ये संग्राम में सभी शत्रुओं को जीतते हैं. (१)
ता हि देवानामासुरा तावर्या ता नः क्षितीः करतमूर्जयन्तीः.
अश्याम मित्रावरुणा वयं वां द्यावा च यत्र पीपयन्नहा च.. (२)
वे दोनों शक्तिशाली एवं श्रेष्ठ देव हमारी प्रजाओं को उन्नत बनावें. हे मित्र व वरुण! हम
तुम्हें व्याप्त करें. द्यावा-पृथिवी एवं दिन-रात हमें तृप्त करें. (२)
ता भूरिपाशावनृतस्य सेतू दुरत्येतू रिपवे मर्त्याय.
ऋतस्य मित्रावरुणा पथा वामपो न नावा दुरिता तरेम.. (३)
वे दोनों विपुल पाशों वाले, यज्ञ न करने वाले के बंधनकर्त्ता एवं शत्रु मनुष्य के लिए
दुरतिक्रमणीय हैं. हे मित्र व वरुण! जिस प्रकार नाव के द्वारा जल को पार करते हैं, उसी
प्रकार हम तुम्हारे यज्ञ द्वारा दुःखों से पार हो जावें. (३)
आ नो मित्रावरुणा हव्यजुष्टिं घृतैर्गव्यूतिमुक्षतमिलाभिः.
प्रति वामत्र वरमा जनाय पृणीतमुद्नो दिव्यस्य चारोः.. (४)
हे मित्र व वरुण! हमारे हव्ययुक्त यज्ञ में आओ एवं जल के साथ-साथ अन्न द्वारा भी
हमारी गोचर-भूमि को पूर्ण करो. हमारे अतिरिक्त इस संसार में तुम्हें उत्तम हव्य कौन देगा?
तुम अंतरिक्ष में होने वाला एवं उत्तम जल दो. (४)
एष स्तोमो वरुण मित्र तुभ्यं सोमः शुक्रो न वायवेऽयामि.
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५)
हे मित्र व वरुण! यह स्तोत्र मैंने तुम दोनों एवं वायु के लिए बनाया है. यह सोम के
समान दीप्त है. तुम हमारे यज्ञ में आओ, हमारी स्तुति को जानो एवं अपने कल्याणसाधनों
द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५)
सूक्त—६६ देवता—आदित्य आदि
प्र मित्रयोर्वरुणयोः स्तोमो न एतु शूष्यः. नमस्वान्तुविजातयोः.. (१)
बार-बार प्रादुर्भूत होने वाले मित्र एवं वरुण का सुखदाता तथा अन्नयुक्त स्तोत्र उनके
समीप जावे. (१)
या धारयन्त देवाः सुदक्षा दक्षपितरा. असुर्याय प्रमहसा.. (२)
शोभन-बलयुक्त, शक्ति की रक्षा करने वाले एवं प्रकृष्ट तेज वाले मित्र व वरुण को देवों
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1113Permalink

ने धारण किया है. (२)
ता नः स्तिपा तनूपा वरुण जरितॄणाम्. मित्र साधयतं धियः.. (३)
वे दोनों हमारे घर एवं शरीर के रक्षक हैं. हे मित्र व वरुण! तुम स्तोताओं के स्तुतिरूप
कर्म को पूरा करो. (३)
यदद्य सूर उदितेऽनागा मित्रो अर्यमा. सुवाति सविता भगः.. (४)
पापहंता मित्र, अर्यमा, सविता एवं भग आज सूर्य निकलने पर हमारा इष्ट धन दें. (४)
सुप्रावीरस्तु स क्षयः प्र नु यामन्त्सुदानवः. ये नो अंहोऽतिपिप्रति.. (५)
हे शोभनदान वाले देवो! तुम्हारे आने पर हमारा निवास-स्थान सुरक्षित हो. तुम हमारे
पाप को नष्ट करो. (५)
उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये. महो राजान ईशते.. (६)
मित्रादि देव एवं अदिति हिंसा-रहित यज्ञ के स्वामी हैं. वे धन के भी स्वामी हैं. (६)
प्रति वां सूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम्. अर्यमणं रिशादसम्.. (७)
मैं सूर्योदय वेर बाद मित्र, वरुण एवं शत्रुनाशक अर्यमा की स्तुति करता हूं. (७)
राया हिरण्यया मतिरियंमवृकाय शवसे. इयं विप्रा मेधसातये.. (८)
यह स्तुति हमें रमणीय धन के सथ अपराजित शक्ति देने वाली हो. हे ब्राह्मणो! यह
स्तुति यज्ञ-लाभ के लिए हो. (८)
ते स्याम देव वरुण ते मित्र सूरिभिः सह. इषं स्वश्च धीमहि.. (९)
हे वरुण एवं मित्र! हम ऋत्विजों को साथ लेकर तुम्हारी स्तुति करने वाले होंगे. हे देव!
हम अन्न एवं जल धारण करें. (९)
बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः.
त्रीणि ये येमुर्विदथानि धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः.. (१०)
महान्, सूर्य के समान प्रकाशयुक्त, अग्निरूपी जिह्वा वाले एवं यज्ञ को बढ़ाने वाले
मित्रादि देव शत्रुओं को हराने वाले कर्मों द्वारा हमें विस्तृत निवास-स्थान देते हैं. (१०)
वि ये दधुः शरदं मासमादहर्यज्ञमक्तुं चादृचम्.
अनाप्यं वरुणो मित्रो अर्यमा क्षत्रं राजान आशत.. (११)
ebook converter DEMO Watermarks*

तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते.

Page 1114Permalink

मित्र, वरुण एवं अर्यमा ने सुशोभित होकर दूसरों द्वारा अप्राप्त बल पाया है तथा
संवत्सर, मास, दिवस, रात्रि एवं ऋचाओं की रचना की है. (११)
तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते.
यद्दोहते वरुणो मित्रो अर्यमा यूयमृतस्य रथ्यः.. (१२)
हे उदक के नेता वरुण, मित्र और अर्यमा! तुम जिस धन को धारण करते हो, हम आज
सूर्य निकलने पर वही धन स्तुतियों द्वारा मांगते हैं. (१२)
ऋतावान ऋतजाता ऋतावृधो घोरासो अनृतद्विषः.
तेषां वः सुम्ने सुच्छर्दिष्टमे नरः स्याम ये च सूरयः.. (१३)
हे यज्ञयुक्त, यज्ञ के लिए उत्पन्न, यज्ञ बढ़ाने वाले, भयानक एवं यज्ञहीनों से द्वेष करने
वाले नेताओ! हम एवं अन्य ऋत्विज् ही तुम्हारे सुखदायक धन के अधिकारी हैं. (१३)
उदु त्यद्दर्शंतं वपुर्दिव एति प्रतिह्वरे.
यदीमाशूर्वहति देव एतशो विश्वस्मै चक्षसे अरम्.. (१४)
वह दर्शनीय मंडल अंतरिक्ष के समीप उदय होता है. गतिशील एवं हरे रंग का घोड़ा उस
मंडल को इस हेतु धारण करता है, जिससे सब लोग उसे देख सकें. (१४)
शीर्ष्णः शीर्ष्णो जगतस्तस्थुषस्पतिं समया विश्वा रजः.
सप्त स्वसारः सुविताय सूर्यं वहन्ति हरितो रथे.. (१५)
सात गतिशील अश्व मस्तक के भी मस्तक अर्थात् सर्वोच्च स्थावर एवं जंगम के स्वामी
एवं रथ में सवार सूर्य को विश्व के कल्याण के लिए संसार के समीप लाते हैं. (१५)
तच्चक्षुर्देवहितं शुक्रमूच्चरत्. पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्.. (१६)
चक्षु के समान सबके प्रकाशक, देव हितकारक एवं उज्ज्वल सूर्य निकल रहे हैं. हम सौ
वर्ष देखें और जीवित रहें. (१६)
काव्येभिरदाभ्या यातं वरुण द्युमत्. मित्रश्च सोमपीतये.. (१७)
हे अपराजेय एवं तेजस्वी मित्र तथा वरुण! तुम हमारे स्तोत्र सुनकर सोम पीने के लिए
आओ. (१७)
दिवो धामभिर्वरुण मित्रश्चा यातमद्रुहा. पिबतं सोममातुजी.. (१८)
हे द्रोहरहित मित्र व वरुण! तुम स्वर्ग से आओ और शत्रुओं की हिंसा करते हुए सोमपान
करो. (१८)
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1115Permalink

आ यातं मित्रावरुणा जुषाणावाहुतिं नरा. पातं सोममृतावृधा.. (१९)
हे यज्ञनेता मित्र व वरुण! तुम सोमरूपी आहुति को स्वीकार करते हुए आओ एवं यज्ञ
की वृद्धि करते हुए सोमपान करो. (१९)
सूक्त—६७ देवता—अश्विनीकुमार
प्रति वां रथं नृपती जरध्यै हविष्मता मनसा यज्ञियेन.
यो वां दूतो न धिष्ण्यावजीगरच्छा सूनुर्न पितरा विवक्मि.. (१)
हे ऋत्विज् व यजमानरूपी मनुष्यों के स्वामी अश्विनीकुमारो! हम हव्य एवं स्तोत्र लेकर
तुम्हारे रथ की स्तुति करने जाते हैं. हे स्तुतियोग्य अश्विनीकुमारो! जैसे पुत्र पिता को जगाता
है, उसी प्रकार दूतरूप में जगाने वाले तुम्हारे रथ को अपने सामने आने के लिए मैं स्तुति
करता हूं. (१)
अशोच्यग्निः समिधानो अस्मे उपो अदृश्रन्तमसश्चिदन्ताः.
अचेति केतुरुषसः पुरस्ताच्छ्रिये दिवो दुहितुर्जायमानः.. (२)
अग्नि हमारे द्वारा प्रज्वलित होकर प्रकाशित होते हैं, वे लोग अंधकार वाले भागों को
भी देखते हैं. ज्ञापन करने वाले सूर्य उषा वाली पूर्व दिशा में शोभा के लिए उदित होते हैं एवं
लोग उन्हें देखते हैं. (२)
अभि वां नूनमश्विना सुहोता स्तोमैः सिषक्ति नासत्या विवक्वान्.
पूर्वीभियतिं पथ्याभिर्वाक्स्वर्विदा वसुमता रथेन.. (३)
हे शोभन होता एवं स्तुति बोलने वाले अश्विनीकुमारो! हम स्तुतिसमूहों द्वारा तुम्हारी
सेवा करते हैं. तुम जल को जानने वाले एवं धनयुक्त रथ पर चढ़कर प्रचलित मार्ग द्वारा
आओ. (३)
अवोर्वां नूनमश्विना युवाकुर्हुवे यद्वां सुते माध्वी वसूयुः.
आ वां वहन्तु स्थविरासो अश्वाः पिबाथो अस्मे सुषुता मधूनि.. (४)
हे रक्षक एवं मधुविद्या कुशल अश्विनीकुमारो! जब तुम्हारी अभिलाषा से सोमरस निचूड़
जाता है तब मैं धन की इच्छा से तुम्हारी स्तुति करता हूं. तुम्हारे स्वस्थ घोड़े तुम्हें यहां लावें.
तुम हमारे द्वारा भली प्रकार निचोड़े गए सोमरस को पिओ. (४)
प्राचीमु देवाश्विना धियं मेऽमृध्रां सातये कृतं वसूयुम्.
विश्वा अविष्टं वाज आ पुरन्धीस्ता नः शक्तं शचीपती शचीभिः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारी सरला, अपराजित एवं धन चाहने वाली बुद्धि को लाभ के
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1116Permalink

लिए उचित बनाओ. संग्राम में भी हमारी बुद्धि की रक्षा करो. हे यज्ञपालक अश्विनीकुमारो!
हमारे कर्मों के द्वारा हमें धन दो. (५)
अविष्टं धीष्वश्विना न आसु प्रजावद्रेतो अहयं नो अस्तु.
आ वां तोके तनये तूतुजानाः सुरत्नासो देववीतिं गमेम.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! इन यज्ञकर्मों में हमारी रक्षा करो. हमारा वीर्य क्षीणतारहित एवं
संतान उत्पन्न करने योग्य हो. अपने पुत्रों एवं पौत्रों को मनचाहा धन देते हुए हम शोभनरत्न
लाभ करें एवं देवों को प्राप्त करके यज्ञ में आवें. (६)
एष स्य वां पूर्वगन्वेव सख्ये निधिर्हितो माध्वी रातो अस्मे.
अहेळता मनसा यातमर्वागश्नन्त हव्यं मानुषीषु विक्षु.. (७)
हे मधुप्रिय अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार दूत मित्र के स्वागत के लिए आगे चलता है,
उसी प्रकार यह सोमरूपी निधि हमारे द्वारा तुम्हारे लिए संकल्पित है. क्रोधरहित मन से हमारे
सामने आओ एवं मानवी प्रजाओं में वर्तमान हव्य को खाओ. (७)
एकस्मिन्योगे भुरणा समाने परि वां सप्त स्रवतो रथो गात्.
न वायन्ति सुभ्वो देवयुक्ता ये वां धूर्षु तरणयो वहन्ति.. (८)
हे भरण-पोषण करने वाले अश्विनीकुमारो! जब तुम एक स्थान पर मिलते हो तो
तुम्हारा रथ सात नदियों के पार जाता है. शोभनजन्म वाले एवं दिव्यशक्ति से युक्त तुम्हारे
घोड़े तुम्हारे रथ को तेजी से खींचते हैं और कभी नहीं थकते. (८)
असश्चता मघवद्भयो हि भूतं ये राया मघदेयं जुनन्ति.
प्र ये बन्धुं सूनृताभिस्तिरन्ते गव्या पृञ्चन्तो अश्व्या मघानि.. (९)
आसक्तिरहित तुम दोनों उन लोगों के लिए उत्पन्न हुए हो जो धनी हैं एवं धनप्राप्ति के
योग्य हव्य तुम्हें देते हैं, जो सत्य वचनों से अपने बंधुओं को बढ़ाते हैं एवं मांगने वालों को
गोधन एवं अश्वधन देते हैं. (९)
नू मे हवमा शृणुतं युवाना यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरवत्.
धत्तं रत्नानि जरतं च सूरीन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे नित्यतरुण अश्विनीकुमारो! तुम आज मेरी पुकार सुनो, हव्ययुक्त घर में आओ,
रत्नदान करो एवं स्तोता की उन्नति करो. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा
रक्षा करो. (१०)
सूक्त—६८ देवता—अश्विनीकुमार
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1117Permalink

आ शुभ्रा यातमश्विना स्वश्वा गिरो दस्रा जुजुषाणा युवाकोः.
हव्यानि च प्रतिभृता वीतं नः.. (१)
हे दीप्तियुक्त, शोभन अश्वों वाले एवं शत्रुहंता अश्विनीकुमारो! तुम अपने भक्त की
स्तुतियों की कामना करो एवं हमारे द्वारा प्रस्तुत हव्य का भक्षण करो. (१)
प्र वामन्धांसि मद्यान्यस्थुररं गन्तं हविषो वीतये मे. तिरो अर्यो हवनानि श्रुतं नः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे लिए मदकारक अन्न स्थापित हैं. तुम हमारा हव्य भक्षण करने
के लिए जल्दी आओ. तुम हमारे शत्रुओं की पुकार का तिरस्कार करके हमारी पुकार सुनो.
(२)
प्र वां रथो मनोजवा इयर्ति तिरो रजांस्यश्विना शतोतिः.
अस्मभ्यं सूर्यावसू इयानः.. (३)
हे सूर्य के साथ रहने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारा मन के समान तेज चलने वाला एवं
सैकड़ों रक्षासाधनों से युक्त रथ हमारी प्रार्थना पर लोगों का तिरस्कार करके हमारे यज्ञ में
आता है. (३)
अयं ह यद्वां देवया उ अद्रिरूर्ध्वो विवक्ति सोमसुद्युवभ्याम्.
आ वल्गू विप्रो ववृतीत हव्यैः.. (४)
हे सुंदर अश्विनीकुमारो! तुम्हारी अभिलाषा से सोमलता कूटने वाला पत्थर ऊंचा शब्द
करता है, उस समय मेधावी ऋत्विज् तुम्हें हव्यों द्वारा आकर्षित करता है. (४)
चित्रं ह यद्वां भोजनं न्वस्ति न्यत्रये महिष्वन्तं युयोतम्.
यो वामोमानं दधते प्रियः सन्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा जो विचित्र धन है, उसे हमें दो. जो तुम्हारे प्रिय हैं एवं तुम्हारा
दिया हुआ धन धारण करते हैं, उन अत्रि ऋषि से महिष्वत को अलग करो. (५)
उत त्यद्वां जुरते अश्विना भूच्च्यवानाय प्रतीत्यं हविर्दे.
अधि यद्रूपं इतिऊर्ति धत्थः.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने अपने स्तुतिकर्त्ता एवं हव्यदाता वृद्ध च्यवन ऋषि को मृत्यु के
पास से लाकर जो रूप दिया था, वह प्रसिद्ध है. (६)
उत त्यं भुज्युमश्विना सखायो मध्ये जहुर्दुरेवासः समुद्रे.
निरीं पर्षदरावा यो युवाकुः (७)
बुरे साथियों ने भुज्यु को समुद्र में त्याग दिया था. हे अश्विनीकुमारो! तुम्हीं ने उसे पार
ebook converter DEMO Watermarks*

Page 1118Permalink

किया. वह तुम्हारा भक्त एवं अनुकूलचारी रहा. (७)
वृकाय चिज्जसमानाय शक्तमुत श्रुतं शयवे हूयमाना.
यावच्यामपिन्वतमपो न स्तर्यं चिच्छक्त्यश्विना शचीभिः.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! तुमने क्षीण होते हुए वृक ऋषि को अपने कर्म एवं बुद्धि द्वारा धन
दिया. पुकार लगाते हुए शंयु की बात तुम्हीं ने सुनी और बूढ़ी गाय को जलपूर्ण नदी के समान
दुधारू बना दिया. (८)
एष स्य कारुर्जरते सूक्तैरग्रे बुधान उषसां सुमन्मा.
इषा तं वर्धदघ्न्या पयोभिर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (९)
हे अश्विनीकुमारो! यह शोभनबुद्धि वाला स्तोता उषा से पहले ही जागकर सूक्तों द्वारा
तुम्हारी स्तुति करता है. उसे अन्न, दूध एवं गायों द्वारा बढ़ाओ. हे देवो! अपने कल्याणसाधनों
द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (९)
सूक्त-६९ देवता-अश्विनीकुमार
आ वां रथो रोदसी बद्धधानो हिरण्ययो वृषभिर्यात्वश्वैः.
घृतवर्तनिः पविभी रुचान इषां वोळ्हा नृपतिर्वाजिनीवान्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! जवान घोड़ों वाला तुम्हारा रथ आवे. वह रथ द्यावा-पृथिवी को
बाधित करने वाला, सोने का बना हुआ, पहियों में जल धारण करने वाला, डंडों द्वारा
चमकता हुआ, अन्न ढोने वाला, यजमानों द्वारा प्रदत्त हव्य से युक्त एवं यजमानों का नेता है.
(१)
स पप्रथानो अभि पञ्च भूमा त्रिवन्धुरो मनसा यातु युक्तः.
विशो येन गच्छथो देवयन्तीः कुत्रा चिद्याममश्विना दधाना.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! जिस रथ पर बैठकर तुम किसी भी स्थान में देवाभिलाषी यजमानों
के पास पहुंच जाते हो, वह पांचों भूतों को प्रसिद्ध करने वाला, तीन वंधुरों (सारथि के बैठने
की जगह) से युक्त एवं हमारी स्तुतियों का पात्र है. (२)
स्वश्वा यशसा यातमर्वाग्दसा निधिं मधुमन्तं पिबाथः.
वि वां रथो वध्वा३ याद्मानोऽन्तान्दिवो बाधते वर्तनिभ्याम्.. (३)
हे शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! सुंदर घोड़ों द्वारा शोभन अन्न लेकर तुम हमारे सामने
आओ एवं मधुरतापूर्ण सोम का पान करो. सूर्य के साथ गंतव्य की ओर जाने वाला तुम्हारा
रथ तेज चलने के कारण अपने पहियों से स्वर्ग के भागों को पीड़ा पहुंचाता है. (३)
ebook converter DEMO Watermarks*