ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextअवश्य सुनो, जिस मार्ग से मरुद्गण जाते हैं, वह प्राणियों को कभी नष्ट नहीं करता. वे अपने
चाहने योग्य रक्षासाधनों से हमें बढ़ावें. (३)
युष्मोतो विप्रो मरुतः शतस्वी युष्मोतो अर्वा सहुरिः सहस्री.
युष्मोतः सम्राळुत हन्ति वृत्रं प्र तद्द्रो अस्तु धूतयो देष्णम्.. (४)
हे मरुतो! तुम्हारे द्वारा रक्षित स्तोता सैकड़ों धनों का स्वामी होता है. तुम्हारी रक्षा पाकर
वह आक्रमण करने वाला, शत्रु-पराजयकारी, साहसी एवं हजारों धनों का स्वामी बनता है.
तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर वह सम्राट् एवं शत्रुहंता बनता है. हे कंपाने वाले मरुतो! तुम्हारा
दिया हुआ धन बढ़े. (४)
ताँ आ रुद्रस्य मीळ्हुषो विवासे कुविन्नृसन्ते मरुतः पुनर्नः.
यत्सस्वर्ता जिहीळिरे यदाविरव तदेन ईमहे तुराणाम्.. (५)
मैं अभिलाषापूरक रुद्रों की सेवा करता हूं. वे कई बार हमारे सामने आवें. जिस महान्
पाप से मरुद्गण नाराज होते हैं, वह पाप हम अपने स्तोत्र द्वारा नष्ट कर देंगे. (५)
प्र सा वाचि सुष्टुतिर्मघोनामिदं सूक्तं मरुतो जुषन्त.
आराच्चिद्द्वेषो वृषणो युयोत यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हमने धनस्वामी मरुतों की शोभनस्तुति इस स्तोत्र में गाई है. वे उसे स्वीकार करें. हे
अभिलाषापूरक मरुतो! तुम शत्रुओं को दूर से ही अलग कर दो. तुम अपने कल्याणसाधनों
द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (६)
सूक्त—५९ देवता—मरुद्गण
यं त्रायध्व इदमिदं देवासो यं च नयथ.
तस्मा अग्ने वरुण मित्रार्यमन्मरुतः शर्म यच्छत.. (१)
हे देवो! स्तोता को भय से बचाओ. हे मरुतो! तुम अग्नि, वरुण, मित्र और अर्यमा जिसे
अच्छे मार्ग पर ले आते हो, उसे सुख दो. (१)
युष्माकं देवा अवसाहनि प्रिय ईजानस्तरति द्विषः.
प्र स क्षयं तिरते वि महीरिषो यो वो वराय दाशति.. (२)
हे देवो! तुम्हारे द्वारा रक्षित प्रियदिन में जो यज्ञ करता है, जो शत्रुओं पर आक्रमण
करता है, जो अपने निवासस्थान को बढ़ाता है, वह तुम्हें अधिक हव्य इसलिए देता है कि
तुम्हें दूसरी जगह जाने से रोक सके. (२)
नहि वश्चरमं चन वसिष्ठः परिमंसते.
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