ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1106 of 1855
Read in contextदेखता है. (३)
उद्द्वां पृक्षासो मधुमन्तो अस्थुरा सूर्यो अरुहच्छुक्रमर्णः.
यस्मा आदित्या अध्वनो रदन्ति मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः.. (४)
हे मित्र व वरुण! तुम दोनों के लिए अन्न एवं मीठे पुरोडाश तैयार किए गए थे. सूर्य
दीप्तिशाली अंतरिक्ष में आरोहण करते हैं एवं मित्र, अर्यमा व वरुण समान प्रीति वाले होकर
उनके लिए मार्ग निश्चित करते हैं. (४)
इमे चेतारो अनृतस्य भूरेर्मित्रो अर्यमा वरुणो हि सन्ति.
इम ऋतस्य वावृधुर्दुरोणे शग्मासः पुत्रा अदितेरदब्धाः.. (५)
ये मित्र, वरुण और अर्यमा अधिक पाप के नाशक हैं. सुखकारक, अपराजित एवं
अदितिपुत्र ये सब यज्ञभवन में वृद्धि प्राप्त करते हैं. (५)
इमे मित्रो वरुणो दूळभासोऽचेतसं चिच्चितयन्ति दक्षैः.
अपि क्रतुं सुचेतसं वतन्तस्तिरश्चिदंहः सुपथा नयन्ति.. (६)
ये आदित्य, मित्र और वरुण किसी से हारने वाले नहीं हैं. ये अपनी शक्ति से ज्ञानरहित
को भी ज्ञानी बना देते हैं एवं यज्ञकर्त्ता तथा शोभनज्ञान वाले के पास पहुंचकर उसके पाप का
नाश करते हुए उत्तम मार्ग पर ले जाते हैं. (६)
इमे दिवो अनिमिषा पृथिव्याश्चिकित्वांसो अचेतसं नयन्ति.
प्रव्राजे चिन्नद्यो गाधमस्ति पारं नो अस्य विष्पितस्य पर्षन्.. (७)
ये मित्रादि पृथ्वी एवं अंतरिक्ष के प्राणियों को सर्वदा जानते हुए अज्ञानी व्यक्तियों को
यज्ञकर्म में प्रेरित करते हैं. इनकी सामर्थ्य से नदी के नीचे गहराई में भी धरातल होता है. ये
हमें विस्तृत यज्ञकर्म के पार पहुंचाते हैं. (७)
यद् गोपावददितिः शर्म भद्रं मित्रो यच्छन्ति वरुणः सुदासे.
तस्मिन्ना तोकं तनयं दधाना मा कर्म देवहेळनं तुरासः.. (८)
अर्यमा, मित्र एवं वरुण हव्यदाता यजमान को रक्षासाधनों से युक्त एवं कल्याणकारी
सुख देते हैं, उसी सुख के साथ हम पुत्र-पौत्रों को धारण करते हुए कोई ऐसा कर्म न करें जो
तुम शीघ्रता करने वाले देवों को नाराज कर दे. (८)
अव वेदिं होत्राभिर्यजेत रिपः काश्चिद्दरुणधृतः सः.
परि द्वेषोभिरर्यमा वृणक्तूरुं सुदासे वृषणा उ लोकम्.. (९)
हे देवो! हमसे द्वेष रखने वाला जो व्यक्ति यज्ञवेदी पर कर्म करता हुआ देवों की स्तुति
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