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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1099 of 1855

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Page 1099

जल को छूने वाले मरुत् सत्य को प्राप्त करते हैं. शुद्ध जल वाले एवं शुद्ध मरुद्गण दूसरों को
भी शुद्ध करते हैं. (१२)
अंसेष्वा मरुतः खादयो वो वक्षःसु रुक्मा उपशिश्रियाणाः.
वि विद्युतो न वृष्टिभी रुचाना अनु स्वधामायुधैर्ऋच्छमानाः.. (१३)
हे मरुतो! तुम्हारे कंधों पर खादि नामक अलंकार तथा सीनों पर उत्तम हार विराजमान
हैं. जैसे वर्षा करने वाले मेघों के साथ बिजली शोभा देती है, उसी प्रकार जल प्रदान के समय
तुम भी अपने आयुधों से सुशोभित होते हो. (१३)
प्र बुध्न्या व ईरते महांसि प्र नामानि प्रयज्यवस्तिरध्वम्.
सहस्त्रियं दम्यं भागमेतं गृहमेधीयं मरुतो जुषध्वम्.. (१४)
हे मरुतो! अंतरिक्ष में उत्पन्न होने वाले तुम्हारे तेज विशेषरूप से गति करते हैं. हे विशेष
यज्ञपात्र मरुतो! तुम जलों को बढ़ाओ. हे मरुतो! गृहस्वामियों द्वारा दिए गए घर में उत्पन्न एवं
हजार संख्या वाले यज्ञ का एक भाग सेवन करो. (१४)
यदि स्तुतस्य मरुतो अधीथेत्था विप्रस्य वाजिनो हवीमन्.
मक्षू रायः सुवीर्यस्य दात नू चिद्यमन्य आदभद्रावा.. (१५)
हे मरुतो! तुम अन्नयुक्त मेधावी स्तोता के हव्यसहित स्तोत्र को जानते हो. इसलिए उस
शोभनपुत्र वाले को शीघ्र धन दो. शत्रु उस धन को नष्ट न करें. (१५)
अत्यासो न ये मरुतः स्वञ्चो यक्षदृशो न शुभयन्त मर्याः.
ते हर्म्येष्ठाः शिशवो न शुभ्रा वत्सासो न प्रक्रीळिनः पयोधाम.. (१६)
जो मरुद्गण सतत गतिशील घोड़े के समान शोभनगति वाले, उत्सव देखने वाले,
मनुष्यों के समान शोभाशाली एवं घर में रहने वाले बच्चों के समान शोभित हैं, वे खेलते हुए
बालकों के समान एवं जल धारणकर्त्ता हैं. (१६)
दशस्यन्तो नो मरुतो मृळन्तु वरिवस्यन्तो रोदसी सुमेके.
आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु सुम्नेभिरस्मे वसवो नमध्वम्.. (१७)
संपत्तियां देते हुए एवं अपनी महिमा से सुंदर द्यावा-पृथिवी को पूर्ण करते हुए मरुद्गण
हमें सुखी करें. हे मरुतो! तुम्हारा मानवनाशक एवं गोनाशक आयुध हमसे दूर रहे. हे
वासदाता मरुतो! तुम सुखों के साथ हमारे सामने आओ. (१७)
आ वो होता जोहवीति सत्त: सत्राचीं रातिं मरुतो गृणानः.
य ईवतो वृष्णो अस्ति गोपाः सो अद्वयावी हवते व उक्थैः.. (१८)
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