चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पा० ४] चिकित्सितस्थानम् २७१
पा० ४] चिकित्सितस्थानम् २७१
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चाहता हो वह सोलह वर्ष से पूर्व और सत्तर साल के पीछे स्त्री के साथ सहवास
न करे। क्योंकि सोलह वर्ष से पूर्व छोटी अवस्था में धातुओं के असम्पूर्ण,
कच्ची अवस्था में होने से सम्भोग करने पर थोडे पानी वाले तालाब की भाँति
सूख जाता है, क्षीण हो जाता है। जिस प्रकार से थोड़े पानी वाला तालाब
ज़रा सी गरमी से खुश्क हो जाता है, इसी प्रकार थोड़े से ही शुक्र क्षय से पुरुष
भी क्षीण हो जाता है और यदि सत्तर वर्ष की आयु का वृद्ध पुरुष स्त्री-सहवास
करता है, तो वह सूखा, रूखा (स्नेह रहित), जिस प्रकार कि सूखी, जर्जरित
घूण से खाई लकड़ी छूने से गिर जाती है, इसी प्रकार वह वृद्ध पुरुष भी
सहवास के झटके को सह नहीं सकता, गिर पडता है ॥ ४०-४२ ॥
जरया चिन्तया शुक्र व्याधिभिः कर्मकर्षणात् ।
क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणा चातिनिषेवणात् ॥ ४३ ॥
निम्न कारणों से शुक्र का क्षय होता है—बुढापे से, चिन्ता से, रोगों से,
अति शारीरिक या मानसिक श्रम से, भोजन न करने से और स्त्रियों के अति
सेवन से शुक्र क्षय होता है ॥ ४३ ॥
क्षयाद्भयादविश्रम्भाच्छाकात्स्त्रीदोषदर्शनात् ।
नारीणामरसज्ञत्वादभिचागादसेवनात् ॥ ४४ ॥
तृप्तस्यापि स्त्रियो गन्तु न शक्तुरुपजायते ।
देहसत्त्वबलापेक्षी हर्षः शक्तिश्च हर्षजा ॥ ४५ ॥
रस इक्षौ यथा दध्नि सर्पिस्तैलं तिले यथा ।
सर्वत्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पर्शने तथा ॥ ४६ ॥
तत्स्त्रीपुरुषसंयोगे चेष्टासंकल्पपीडनात् ।
शुक्र प्रच्यवते स्थानाज्जलमार्द्रात्पटादिव ॥ ४७ ॥
निम्न अवस्थाओं में शुक्र प्रवृत्त नहीं होता—धातुओं के (विशेष रूप से
शुक्र के) क्षय से, भय से, विश्वास (निश्चिन्तता) न होने से, शोक से, स्त्री
में दोष देखने से, स्त्रियों के फूहड़ (अरसज्ञ) होने से, सकल्प अर्थात् मनोयोग
न होने से, सहवास न करने से, मैथुन से तृप्त होने से, शुक्र उत्पन्न नहीं होता।
हर्ष (उत्तेजना) शरीर और मन तथा बल की अपेक्षा रखती है। शक्ति (मैथुन,
सामर्थ्य) हर्ष से उत्पन्न होती है। जिस प्रकार कि रस सम्पूर्ण गन्ने में रहता
है, घी सम्पूर्ण दही के कण कण में व्याप्त है, तैल तिल के अणु अणु में भरा
होता है, इसी प्रकार से शुक्र भी शरीर की त्वक्-इन्द्रिय में, स्पर्शज्ञान-युक्त
स्थानों में रहता है, वह सर्वत्र व्याप्त है।
२७२ चरकसंहिता [ अ० २
शुक्र नहीं है। परन्तु जब इनकी वृद्धि और ह्रास होता है तो शुक्र का होना
भी निश्चित है। शरीर का कोई भी अङ्ग ऐसा नहीं जहा वीर्य न हो ] । यह
शुक्र स्त्री और पुरुष के सयोग होने पर, चेष्टा, सकल्प तथा परस्पर पीड़न
( सम्मूर्छन, दबाने ) के कारण अपने वास्तविक स्थान से पृथक् होकर झरने
लगता है, जिस प्रकार कि गीले कपड़े से पानी टपकने लगता है ॥४४-४७॥
हर्षात्तर्षात्सरत्वाच्च पैच्छिल्याद् गौरवादपि ।
अणुप्रवणभावाच्च द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ४८ ॥
अष्टाभ्य एभ्यो हेतुभ्यः शुक्रं देहात्प्रसिच्यते ।
निम्न आठ कारणों से शुक्र सम्पूर्ण शरीर से मथा जाकर प्रवृत्त होता है ।
हर्ष से, तर्ष ( उपभोग की इच्छा ) से, सर गुण होने से ( बहने का स्वभाव
होने से ), पिच्छिल ( चिकना ) होने से, गौरव ( गुरु ) होने से, अणु (सूक्ष्म)
होने से, प्रवण ( बाहर निकलने का स्वभाव होने से ),१ वायु के शीघ्रगामी होने
से वीर्य बाहर आता है२ ॥ ४८- ॥
१. कावराज गगाधर सन ने 'हृषात्सरत्वासोक्ष्म्याच्च' यह पाठ दिया है।
इसी प्रकार 'अणु-प्रवण-भावाच्च' के स्थान पर 'अनुप्लवनभावाच्च' यह पाठ
पढ़ा है। 'अनुप्लवन' का अर्थ शिश्न को मास पेशियों का रह रह कर संकोच
होना बताया है। इन सकोचों के कारण वीर्य झटकों के साथ बाहर आता है।
वीर्य का क्षरण वात पर निर्भर है। यह केन्द्र मस्तिष्क और मेरुदण्ड में है।
“सुप्रसन्न मनस्तत्र हर्षणे हेतुरुच्यते ।” सुश्रुत
२. साधारणत. जब कामेच्छा उत्पन्न होती है उस समय शरीर के अवयवों
में परिवर्त्तन आरम्भ हो जाता है। यह परिवर्त्तन मुख्य रूप से श्वास का तेज
होना, गालों में लालिमा का दौड़ना, किसी काम में दिल न लगना, शिश्न में
हर्ष, छाती में कम्पन होता है। इस अवस्था में रक्तसचार में भी अन्तर आ
जाता है। रक्तसचार की गति बढ जाती है। इतना ही नही, रक्त के अन्दर
स्वय परिवर्त्तन आ जाता है। इसका प्रभाव माता के दूध पर भी पड़ जाता
है। कामेच्छा के समय पिलाया दूध शिशु को हानि करता है। इन परिवर्त्तनों
के कारण पुरुष के अण्ड अपना अन्तः स्राव को उत्पन्न करने का कार्य बन्द
करके, बहिःस्राव पैदा करने लगते हैं। इस वीर्य के गाढ़ा होने के कारण यह
शिश्न तक पहुँच जाये इसलिये इसमें पौरुष ग्रन्थि तथा शिश्न में मूत्र मार्ग की
दिवारों मे रहने वाली ग्रन्थिया अपना अपना रस मिला देती हैं। यदि यह रस
बहुत मिल जाये तो वीर्य पतला हो जाता है।