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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०१

पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २०१
चाहिये। गुठलीरहित हरड़ आवले का प्रयोग और परिमाण जानना चाहिये।
श्रेष्ठ हिमालय पर्वत ही औषधियों के लिये उत्कृष्ट भूमि है। इसलिये अपनी
ऋतु में उत्पन्न मौसमी फलो को हिमालय पर्वत से समय समय पर लेना चाहिये।
ये फल रस और वीर्य से परिपुष्ट होने चाहियें। ये फल सूर्य, वायु, छाया, पानी
से तृप्त व हरे-भरे होने चाहिये। जो फल कृमि आदि से न खाये हों सड़े न
हों, जिन पर चोट न लगी हो, रंग रहित हों, उन फलों का प्रयोग और उत्तम
कर्मों का अब उपदेश करूंगा ॥ ३५-३६ ॥
पञ्चानां पञ्चमूलानां भागानेकदशपलोन्मितान् ।
हरितकीसहस्रं च त्रिगुणामलकं नवम् ॥ ४० ॥
विदारिगन्धा बृहतीं पृश्निपर्णीं निदिग्धिकाम् ।
विद्याद्विदारिगन्धाद्यं श्वदंष्ट्रापञ्चमं गणम् ॥ ४१ ॥
बिल्वाग्निमन्थस्योनाकं काश्मर्यमथ पाटलाम् ।
पुनर्नवां शूर्पपर्ण्यौ बलामैरण्डमेव च ॥ ४२ ॥
जीवकर्षभकौ मेदा जीवन्तीं सशतावरीम् ।
शरेक्षुदर्भकाशानां शालीनां मूलमेव च ॥ ४३ ॥
इत्येषा पञ्चमूलानां पञ्चानामुपकल्पयेत् ।
भागान्यथोक्तांस्तत्सर्वं साध्यं दशगुणेऽम्भसि ॥ ४४ ॥
दशभागावशेषं तु पूतं तं ग्राहयेद्रसम् ।
हरीतकीश्च ताः सर्वाः सर्वाण्यामलकानि च ॥ ४५ ॥
तानि सर्वाण्यनस्थीनि फलान्यापोथ्य कूर्चनैः ।
विनीय तस्मिन्निर्यूहे चूर्णानीमानि दापयेत् ॥ ४६ ॥
मण्डूकपर्ण्याः पिप्पल्याः शङ्खपुष्प्याः प्लवस्य च ।
मुस्तानां सविडङ्गानां चन्दनागुरुणोस्तथा ॥ ४७ ॥
मधुकस्य हरिद्राया वचायाः कनकस्य च ।
भागांश्चतुष्पलान् कृत्वा सूक्ष्मेलायास्त्वचस्तथा ॥ ४८ ॥
सितोपलासहरुं च चूर्णितं तुल्याऽधिकम् ।
तैलस्य द्वयाढकं तत्र दद्यात् त्रीणि च सर्पिषः ॥ ४९ ॥
साध्यमौदुम्बरे पात्रे तत्सर्वं मृदुनाऽग्निना ।
ज्ञात्वा लेहमदग्धं च शीतं क्षौद्रेण ससृजेत् ॥ ५० ॥
क्षौद्रप्रमाणं स्नेहार्धं तत्सर्वं घृतभाजने ।
तिष्ठेत्सम्मूछितं तस्य मात्रा काले प्रयोजयेत् ॥ ५१ ॥

२०२ चरकसंहिता [ अ० १
या नोपरुन्ध्यादाहारमेतं मात्रां जरां प्रति ।
षष्टिकः पयसा चात्र जीर्णे भोजनमिष्यते ॥ ५२ ॥
ब्राह्म रसायन—पाचों पंच मूलो के पृथक् पृथक् दस पल ( एक पल = ८
तोले के ) लेने चाहिये । हरड़ एक हजार, नया आवला तीन हजार लेने
चाहियें । पाच पचमूल पहला ( १ ) पचमूल विदारिगन्धा ( शालपर्णी ),
( २ ) वृहती ( बड़ी कटेरी ), ( ३ ) पृश्निपर्णी, ( ४ ) निर्दिग्धका ( छोटी
कटेरी ) और ( ५ ) गोखरू ये पाच विदारोगन्वादि पचमूल है । इसको क्षुद्र
पचमूल भी कहते हैं ।
( २ ) दूसरा पचमूल—बिल्व ( बेल ), अग्निमन्य ( अरणी ), स्योनाक
( सोनापाठा ), काश्मरा ( गम्भारी ) और पाटला इसे महा-पञ्चमूल कहते हैं ।
( ३ ) तीसरा पचमूल—पुनर्नवा, शूर्पपर्णी, ( मुद्गपर्णी और माषपर्णी ),
बळा और एरण्ड ।
( ४ ) चौथा पचमूल ऋषभक, जीवक, मेदा, जीवन्ती और शतावरी ।
( ५ ) पाचवा पचमूल—शर, इक्षु, दर्भ, काश तथा शाली की जड़ ।
उपरोक्त औषधियों को दस गुणे जल में डाल कर क्वाथ करना चाहिये
और जल का दसवा भाग शेष रहने पर निर्मल वस्त्र से छान लेवे । हरड़ और
आवलों को निकाल कर इनकी गुठलियों को बाहर कर देना चाहिये । फिर
कुचल कर कूर्चनों से इनके रेशे बाहर कर लेने चाहियें । ✤ रेशे निकल जाने
पर हरड़ और आंवले की पिठ्ठी को क्वाथ में डाल देना चाहिये । साथ में
निम्न वस्तुओं का चूर्ण भी क्वाथ में मिला देना चाहिये । यथा—मण्डूकपर्णी,
पिप्पली, शखपुष्पी, प्लव ( केवटी मोथा ), मोथा, बायविडग, लालचन्दन,
अगरु, मुलहठी, हल्दी, वच, कनक ( नाग केसर ), छोटी इलायची और
दालचीनी, प्रत्येक चार पल, मिश्री १००० पल, तैल २ आढक, घी ३
✤ ( १ ) आवल और हरड़ के रेशे निकालने के लिये कूर्चनों का उपयोग
करते हैं । एक लकड़ी में तीन चार सूइया लगी रहती हैं। उन को इन पर
फेरने से रेशे इन में फस जाते हैं। हरड़ और आवले मे सूत होते हैं, इसलिये
लकड़ी के कूर्चनो का उपयोग करना चाहिये ' अथवा हरड़ और आंवले को
कपड़े में मथ कर निकालना चाहिये । इससे रेशे ऊपर रह जाते हैं ।