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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ८ ] २८ चिकित्सितस्थानम् ४३३

अ० ८ ] २८ चिकित्सितस्थानम् ४३३
प्रायेणोपहताग्नित्वात्सपिच्छमतिसार्यते ।
प्राप्नोत्यास्यस्य वैरस्यं न चान्नमभिनन्दति ॥ १२३ ॥
तस्याग्निदीपनान् योगानतीसारनिबर्हणान् ।
वक्त्रशुद्धिकरन्कुर्यादरुचिप्रतिबाधकान् ॥ १२४ ॥
सनागरानिन्द्रयवान्पिबेद्वा तण्डुलाम्बुना ।
सिद्धां यवागूं जीर्णे च चाङ्गेरीतकदाडिमैः ॥ १२५ ॥
पाठां बिल्वं यवानी च पातव्यं तक्रसंयुतम् ।
दुरालभा शृङ्गवेर पाठा च सुरया सह ॥ १२६ ॥
जम्ब्वाम्रमध्यं बिल्वं च सकपित्थ सनागरम् ।
पेयामण्डेन पातव्यमतीसारनिवृत्तये ॥ १२७ ॥
एतानेव च योगांश्चोन्पाठ ळीन्कारयेत्खडान् ।
स¹सूपधान्यान्स्नेहान्साम्लान्सङ्ग्रहणान्परान् ॥ १२८ ॥
वेतसार्जुनजम्बूना मृणालीकृष्णगन्धयोः ।
श्रीपर्ण्या मदयन्त्याश्च यूथिकायाश्च पल्लवान् ॥ १२९ ॥
²मातुलुङ्गस्य धातक्या दाडिमस्य च कारयेत् ।
स्नेहाम्ललवणोपेतान् खडान् सांग्राहिकान् परान् ॥ १३० ॥
चाङ्गेर्याश्चुक्रिकायाश्च दुग्धिकायाश्च कारयेत् ।
खडान्दधिसरोपेतान्ससर्पिष्कान्सदाडिमान् ॥ १३१ ॥
मासाना लघुपाकाना रसाः सांग्राहिकैर्युताः ।
व्यञ्जनार्थं प्रशस्यन्ते भोज्यार्थं रक्तशालयः ॥ १३२ ॥
स्थिरादिपञ्चमूलेन पाने शस्तं शृतं जलम् ।
तक्रं सुरा सचुक्रिका दाडिमस्याथवा रसः ॥ १३३ ॥
दीपन ग्राहि निर्दिष्ट भेषज भिन्नवर्चसे ।
( १६ ) अग्नि के मन्द होने से प्रायः आँव से युक्त अतिसार हो जाता
है, मुख का स्वाद बदल जाता है, भोजन भी अच्छा नहीं लगता । इसके लिये
अग्नि को बढ़ाने वाले ओर अतिसार नाशक तथा मुख को शुद्ध करने वाले
और अरुचि को नष्ट करने वाले प्रयोगो का व्यवहार करे ।
( १ ) सोंठ ओर इन्द्रजौ के चूर्ण क' चावलो के मण्ड के साथ पीवे ।
औषध के जीर्ण होने पर चांगेरी ( तेपतिया ), छाछ और अनारदाना से सिद्ध
यवागू को पीवे । ( २ ) पाठा, बेलगिरी, अजवायन इनको सम परिमाण मे
१. 'सचक्रधान्यान्' इति पाठः । २ 'अय श्लोकः क्वचिद् न पठ्यते' ।

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लेकर छाछ के साथ पीवे । दुरालभा, अदरक और पाठा इनको सम परिमाण
में लेकर सुरा के साथ पीवे । ( ३ ) जामुन की गुठली, आम की गुठली,
बेलगिरी, कैथ और सोंठ इनको समान भाग लेकर पेया ( यवागू ) के मण्ड
के साथ पिलाने से अतिसार शान्त होता है । ( ४ ) ऊपर कहे पाठा आदि
तीन योगो से खडयूष बनावे । इन खडयूषो को मसूर आदि दाल के योग्य,
धान्य, घी आदि स्नेह से युक्त, चांगेरी छाछ और अनारदाने से खट्टे कर
ले । ये अत्यन्त सांग्राहिक ( मल को बाधनेवाले ) है । ( ५ ) वेतस ( अम्ल-
वेतस ), अर्जुन, जामुन, मृणाली ( वीरणमूल या लामज्जक ), सहजन, श्रीपर्णी
( गम्भारी ), मदयन्ती ( नवमल्लिका या मेहन्दी ), यूथिका ( जूही ), बिजौरा,
धातकी, अनार इनके पत्तो से, घी आदि स्नेह से, कपित्थ आदि अम्ल, लवण
से युक्त खडों को बनावे । ये पदा^१ अत्यन्त सङ्ग्राही हैं । ( ६ ) चागेरी,
चुक्रिका ( इमली ) और दुग्धिका ( गुजराती मे नागला दूधेलो ) इनसे
पृथक् २, दही का सर भाग ( मलाई ), घी और अनारदाने से यथाविधि खड
बनावे । व्यजन के लिये शीघ्र पचाने वाले मासरसो को बेलगिरी आदि सग्राही
वस्तुओ से सिद्ध करके दे वे । भोजन के लिये लाल चावल उत्तम हैं । ( ७ )
पीने के लिये स्थिरा, पञ्चमूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी,
गोखरू ) से सिद्ध जल, छाछ, सुरा, सिरका और अनार का रस दे । अतिसार
से पीड़ित यक्ष्मा रोगी के लिये दीपन और ग्राही औषध कह दी है ॥१२३-१३३-॥
परं मुखस्य वैरस्यनाशनं रोचनं शृणु ॥ १३४ ॥
द्वौ कालौ दन्तपवनं भक्षयेन्मुखधावनम् ।
तद्वत्प्रक्षालयेदास्यं धारयेत्कवलग्रहान् ॥ १३५ ॥
पिबेद् धूमं ततो मृष्टमद्याद्दीपनपाचनम् ।
भेषजं पानमन्नं च हितमिष्टोपकल्पितम् ॥ १३६ ॥
त्वङ्मुस्तमेला धान्यानि मुस्तमामलकं त्वचम् ।
दार्वी त्वचो यवानी च पिप्पल्यस्तेजवत्यपि ॥ १३७ ॥
यवानी तिन्तिडीकं च पञ्चैते मुखधावनाः ।
श्लोकपादेष्वभिहिता रोचना मुखशोधनाः ॥ १३८ ॥
गुटिकां धारयेदास्ये चूर्णैर्वा शोधयेन्मुखम् ।
एषामालोडिताना वा धावयेत्कवलग्रहान् ॥ १३६ ॥
१ वेतस, अर्जुन, जामुन, एक योग, मृणाली, सहजन दूसरा योग और
श्रीपर्णी आदि को पृथक् २ बरते । यह कविराज श्रीजयदेव की सम्मति है !