सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३७

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४३७
रोगी सूख रहा हो और जिसका मास क्षीण होता जा रहा हो, उसको मास खाने
वाले प्राणियो का मास देवे । क्योकि इस प्रकार के प्राणियो का मास अति
पुष्टिकारक होता है ।
( १ ) यक्ष्मारोगी को मार का मास देवे । गीध, उल्लू, चाषपक्षी के मास
को विधिपूर्वक पकाकर रोगी का मोर का मास कहकर देवे । [ ज्ञात होने पर
वह शायद घृणा से न खाये, इसलिये मोर के नाम से देवे ] ।
( २ ) इसी प्रकार से कौआ का मास तीतर के नाम से, सापो का वर्मि
( मछली विशेष ) के नाम से, भूने हुए गिण्डोयो को मछली की आते कहकर
देवे । लोमड़ी, बडे नेवले, नल्ली, गीदड के बच्चो के मास को विधिवत् बनाकर
शशक का मास कहकर देवे । सिंह, भालू, तरक्षु, ( लकडबग्घा ), व्याघ्र
( बघेरा ), अन्य इसी प्रकार के मास खाने वाले प्राणियो के मासो को मृग का
मास कहकर मास की वृद्धि के उद्देश्य से देवे । मास की वृद्धि के लिये
हाथी, गैडा, घोडा, इनके मासों से वेशवार बनाकर उनको भैंसे का मास
बतला कर देवे ॥ १४६-१५४ ॥
मासेनोपचिताङ्गाना मांसं मासकरं परम् ।
तीक्ष्णोष्णलाघवाच्छस्तं विशेषान्मृगपक्षिणाम् ॥ १५५ ॥
मासानि यान्यनभ्यासादनिष्टानि प्रयोजयेत् ।
तेषूपधा सुखं भोक्तुं तथा शक्यानि तानि हि ॥ १५६ ॥
जानञ्जुगुप्सन्नैवाद्याज्जग्धं वा पुनरुल्लिखेत् ।
तस्माच्छद्मोपसिद्धानि मासान्येतानि दापयेत् ॥ १५७ ॥
बर्हितित्तिरिदक्षाणा हसाना शूकरोष्ट्रयोः ।
खरगोमहिषाणा च मास मासकरं परम् ॥ १५८ ॥
योनिरष्टविधा चोक्ता सांगनामन्नपानिके ।
ता परीक्ष्य भिषग्विद्वान्दद्यान्मासानि शोपिणे ॥ १५६ ॥
मास से पुष्ट अगो वाले प्राणियो का मास विशेषत मास को बढाता है ।
तीक्ष्ण, उष्ण और लघु होने से विशेषकर पशु-पक्षियो का मास श्रेष्ठ है । जिसने
जो मास कभी प्रथम खाया नही इसलिये उसे वह अच्छा न लगे तो सुख से
खिलाने के लिये छिपाकर देना होता है । क्योकि यदि रोगी जान जाये तो
खाने से इन्कार कर देगा अथवा खाकर घृणा से वमन कर देगा । इसलिये
धोखे से छिपाकर इन मासो को देवे । मोर, तीतर, मुर्गा, हस, सुअर, ऊ ट,
गधा, गाय, और भैस इनका मास विशेषतः मास का बढाता है । अन्नपानाध्याय

४३८ चरकसंहिता [ अ० ८
मे मांसो के प्राप्तिस्थान ( योनि ) आठ प्रकार के बतलाए हैं । वैद्य को चाहिये
कि विवेचनापूर्वक यक्ष्मा के रोगी को उन मांसो का प्रयोग करावे ॥१५५-१५६॥
प्रसह्या भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः ।
आहारार्थं प्रदातव्या मात्रया वातशोषिणे ॥ १६० ॥
प्रतुदा विष्किराश्चैव धन्वजाश्च मृगद्विजाः ।
कफपित्तपरीतानां प्रयोज्याः शोषरोगिणाम् ॥ १६१ ॥
विधिवत्सूपसिद्धानि मनोज्ञानि मृदूनि च ।
रसवन्ति सुगन्धीनि मांसान्येतानि भक्षयेत् ॥ १६२ ॥
मासमेवाश्नतः शोषो माध्वीकं पिबतोऽपि च ।
नियतान्ल्पचित्तस्य चिरं काये न तिष्ठति ॥ १६३ ॥
जो यक्ष्मा का रोगी वात-प्रधान हो उसको प्रसह्य, भूशय, आनूप, जलज
और जलचर पशु-पक्षियो का मास मात्रा मे भोजन के लिये देना चाहिये ।
जिस यक्ष्मा-रोग मे कफ और पित्त प्रबल हो उसका प्रतुद, विष्किर और धन्वज
( जाङ्गल ) पशु पक्षियो का मास देवे । विधिपूर्वक तैयार किये, मन को लुभाने
वाले मृदु, शुभ रस और सुगन्धि से युक्त इन मांसो का रोगी खावे । मास का
आहार करते हुए और माध्वीक को पीते हुए उदारचित्त [ जो चिन्ता नहीं
करता ] रोगी के शरीर मे यक्ष्मा देर तक नहीं रहता ॥१६०-१६३॥
वारुणीमण्डनित्यस्य बहिर्मार्जनसेविनः ।
अविधारितवेगस्य यक्ष्मा न लभतेऽन्तरम् ॥ १६४ ॥
प्रसन्ना वारुणी शीधुमरिष्टानासवान्मधु ।
यथार्हमनुपानार्थं पिबेन्मांसानि भक्षयेत् ॥ १६५ ॥
मद्यं तैक्ष्ण्योष्ण्यवैशद्यसूक्ष्मत्वात्स्रोतसा मुखम् ।
प्रमथ्य विवृणोत्याशु तन्मोक्षात्सप्त धातवः ॥ १६६॥
पुष्यन्ति धातुपोषाच्च शीघ्र शोषः प्रशाम्यति ।
जो मनुष्य प्रतिदिन वारुणी-मण्ड का सेवन करता है, शरीर का बहि -
शोधन करता है, उपस्थित वेगो को नही रोकता उसको यक्ष्मा रोग पीडित नही
कर सकता । प्रसन्ना, वारुणी, शीधु, अरिष्ट, आसव, मधु इनमे से जो पदार्थ
रोगी को योग्य लगे उसे अनुपान के रूप मे पान करे ओर मास खावे । मद्य
तीक्ष्ण, उष्ण, विशद और सूक्ष्म होने से बलात् स्रोतों के मुखो को शीघ्र खोल
देता है, मुखों के खुल जाने से रस आदि सातो धातुओ का पोषण होता है ।
धातुओ के पोषण होने से यक्ष्मा रोग शीघ्र शान्त हो जाता है ॥१६४-१६६॥