चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] २० चिकित्सास्थानम् ३०५
अ० ३ ] २० चिकित्सास्थानम् ३०५
पाक्यं शीतकषायं वा पिबेज्ज्वरहरं नरः ।
मधूकमूस्तमृद्वीकाकाश्मर्याणि परूषकम् ॥ २०६ ॥
त्रायमाणामुशीराणि त्रिफला कटुरोहिणीम् ।
पीत्वा निशिस्थितं जन्तुर्ज्वराच्छीघ्रं विमुच्यते ॥ २०७ ॥
बृहत्यौ वत्सकं मुस्तं देवदारु महौषधम् ।
कोलपल्ली च योगोऽय सन्निपातज्वरापहः ॥ २०८ ॥
जात्यामलकमुस्तानि तद्वद्धन्वयवासकम् ।
विबद्धदोषो ज्वरितः कषाय सगुड पिवेत् ॥ २०९ ॥
त्रिफला त्रायमाणा च मृद्वीका कटुरोहिणीम् ।
पित्तश्लेष्महरस्त्वेषा कषायो ह्यानुलोमिकः ॥ २१० ॥
त्रिवृताशर्करायुक्तः पित्तश्लेष्मज्वरापहः ।
शटी पुष्करमूलं च व्याघ्री शृङ्गी दुरालभा ॥ २११ ॥
गुडूची नागर पाठा किरात कटुरोहिणी ।
एष शट्यादिको वर्गः सन्निपातज्वरापहः ॥ २१२ ॥
कासहृद् ग्रहपार्श्वार्त्तिश्वासतन्द्रासु शस्यते ।
बृहत्यौ पुष्कर भार्गी शटी शृङ्गी दुरालभा ॥ २१३ ॥
वत्सकस्य च बीजानि पटोल कटुरोहिणी ।
बृहत्यादिर्गणः प्रोक्तः संनिपातज्वरापहः ॥ २१४ ॥
कासादिषु च सर्वेषु दद्यात्सोपद्रवेषु च ।
कषायाश्च यवाग्वश्च पिपासाज्वरनाशनाः ॥ २१५ ॥
निर्दिष्टा भेषजाध्याये भिषक्तानपि योजयेत् ।
इसके आगे ज्वरनाशक कषायो का उपदेश करते हे । (१) मोथा,
पित्तपापडा, (पित्त ज्वर मे), २—साठ, पित्तपापडा (पित्त प्रधान ज्वर मे) ।
३—पित्तपापडा और दुरालभा (मन्दाग्नियुक्त पित्त कफ मे) । ४ चिरा-
यता, मोथा, गिलोय और सांठ (शीतप्राय ज्वर मे) । ५-पाठा, उशीर, उदीच्य
नेत्रबाला (दाहप्रधान ज्वर मे) । इनका क्वाथ या शीत कषाय ज्वर की
शान्ति के लिये रोगी को देना चाहिये । १ ये कषाय ज्वरनाशक, अग्निदीपक,
१आचार्य ने कोई भेद नहीं किया है । इसलिये गगाधर सेन तो तीन योग
मानते है । प्रथम योग पूर्व के समान, दूसरा योग सोंठ, पित्तपापड़ा और
दुरालभा तक । तीसरा योग सात द्रव्यो का पाठा-सप्तक है । जतुकर्ण ने चौथे
और पाचवे को एक ही योग माना है। चिरायता आदि को सप्तक माना है ।
३०६ चरकसंहिता [ अ० ३
दोषो को पचाने वाले, तृष्णा अरुचि को नष्ट करते है और मुख की विरसता
को मिटाते है । ( २ ) पाच कषाय - १-इन्द्रजौ, परवल, कुटकी । २-परवल,
सारिवा, नागरमोथा, पाठा, कुटकी । ३-नीम की छाल, परवल, त्रिफला, मुनक्का
नागरमोथा, इन्द्रजौ । ४-चिरायता, गिलोय, लाल चन्दन, सोठ । ५-गिलोय,
आवला और मोथा ये आवे श्लोक पर समाप्त होने वाले पाच कषाय क्रमश
सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक पाचो प्रकार के ज्वरो को नष्ट
करते है । ( ३ ) इन्द्रजौ, अमलतास, पाठा, श्वेत वच, कुटकी, मूवो, अतीस,
नीम, परवल, बमासा, वच, नागरमोथा, खस, मुलहठी, त्रिफला और बला,
इनका क्वाथ या शीत कषाय ज्वरनाशक हे । [ कई आचार्य कुटकी तक एक
योग, बमासा तक दूसरा ओर बला तक तीसरा योग मानते है । षड्ग्रन्था से
श्वेत वच लेनी चाहिये । ] ( ४ ) महुवे के फूल, मोथा, मुनक्का, गम्भारी की
छाल, फालसा, त्रायमाणा, खस, त्रिफला, कुटकी इनको कूट कर रात्रि मे भिगो
देना चाहिये । प्रात काल छानकर पीना चाहिये । इसके पीने से ज्वर शीघ्र
नष्ट होता है । ( ५ ) छोटी और बडी कटेरी दोना, इन्द्रजौ, मोथा, देवदारु,
कोल वल्ली ( चबिका या गज पीपल ) इनका क्वाथ सन्निपात ज्वर को नष्ट
करता है । ( ६ ) जाती ( चमेली के पत्ते ), आवला, मोथा, धमासा इनके
क्वाथ मे गुड डालकर पीने से रुके हुए दोष शान्त होते है । ( ७ ) त्रिफला,
त्रायमाणा ( इन्द्रायण की जड ), मुनक्का, कुटकी, इनका क्वाथ पित्त-कफज्वर
को नष्ट करता है । परन्तु यदि मलावरोध हो तो इस क्वाथ मे निशोथ ओर
मिलाकर क्वाथ करके इसमे शर्करा मिलाकर पीना चाहिये । वह क्वाथ पित्त-
कफज्वर का नाशक तथा मल और वायु का अनुलोमन करता है । ( ८ ) शटी
( कचूर ) पोहकरमूल, छोटी कटेरी, काकडसिंगी, दुरालभा, गिलोय, सोठ,
पाठा, चिरायता, कुटकी यह शट्यादि वर्ग है । इससे सन्निपात ज्वर, कास,
हृदयरोग, पार्श्व-शूल, श्वास, तन्द्रा नष्ट होती है । इसका क्वाथ प्रयोग करना
चाहिये । ( ६ ) बृहत्यादि गण-छोटी और बडी कटेरी दोनो, पोहकरमूल,
भार्गी, कचूर, काकडाशृगी, दुरालभा, इन्द्रजौ, परवल कुटकी इनका क्वाथ
सन्निपात ज्वर का नाशक तथा कास आदि से युक्त ज्वर मे देना चाहिये ।
सूत्रस्थान के भेषजचतुष्क अध्यायो मे पिपासा और ज्वर को नाश करने वाले
जो कषाय और यवागू कहे है, उनका भी विवेचनापूर्वक प्रयोग वैद्य को
करना चाहिये ॥ १६७-२१५ ॥
जैजट ने दो योग माने हैं। चिरायता, मोथा, गिलोय और सोठ को 'चातुर्भद्र'
भी कहते है । इनको पृथक् २ या मिलाकर भी प्रयुक्त कर सकते है ।