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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ३ ] १६ चिकित्सितस्थानम्‌ २८६

अ० ३ ] १६ चिकित्सितस्थानम्‌ २८६
शिरसो लोठनं तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा।
स्वेदमूत्रपुरीषाणां चिराद्दर्शनमल्पशः ॥ १०७॥
कृशत्वं नातिगात्राणां प्रततं कण्ठकूजनम्‌।
कोठानां श्यावरक्तानां मण्डलानां च दर्शनम्‌ ॥ १०८ ॥
मूकत्वं स्रोतसां पाको गुरुत्वमुदरस्य च।
चिरात्पाकश्च दोषाणां सन्निपातज्वराकृतिः ॥ १०९॥
इसके आगे सन्निपात ज्वर के लक्षण कहते है। जैसे—( १३) क्षण मे
दाह, क्षण मे शीत, अस्थि, सन्धि और शिर मे वेदना, नेत्रो से पानी आना,
आखो का मैला या लाल वर्ण और कुटिल¹ होना, कानो मे आवाज होना,
कानों मे पीडा होना, गला शूक (गेहूँ आदि की बाल) की भाति काटो से घिरा
रहता है, तन्द्रा, मोह, प्रलाप, कास, श्वास, अरुचि, भ्रम, जिह्वा का जले हुए
के समान काला, पीला, स्पर्श मे खुरदरा, शरीर का अति शिथिल होना, कफ
मिश्रित रक्त पित्त का थूकना, शिर का लोठन (इधर उधर चलाना, हिलाना
डुलाना), प्यास, निद्रा का न आना, हृदय मे तीव्र पीडा, पसीना मूत्र तथा
मल का देर मे आना और थोडा आना (प्राय. अवरोध रहना), शरीर मे
अधिक निर्बलता का न आना, निरन्तर गले से कराहने का स्वर, कोठ तथा
श्याम-रक्त वर्ण के मण्डलो का देह पर दिखाई देना, मूकता, स्रोतो का (मुख
आदि का) पक जाना, उदर का भारी प्रतीत होना तथा दोषो का देर मे परि-
पक्व होना ये सन्निपात ज्वर के लक्षण² है ॥ १०४–१०६ ॥
१ निर्भुग्न का ‘कुटिल, विस्तारित तथा अन्दर को घुसा रहना’ यह अर्थ
आचार्यों ने किया है।
२ सुश्रुत मे अभिन्यास-ज्वर के लक्षण इस प्रकार दिये है। जैसे—
नात्युष्णशीतोऽल्पसञ्ज्ञो भ्रान्तप्रेक्षी हतप्रभ ।
खरजिह्व शुष्ककण्ठ स्वेदविण्मूत्रवर्जित ॥
साश्रुनिर्भुग्ननयनो भक्तद्वेषी हतस्वरः।
श्वसन्निपतित शेते प्रलापापद्रवान्वित ॥
अभिन्यास तु त प्राहुर्हंतौजसमथापरे।
सन्निपातज्वर कृच्छ्रमसाध्यमथवा परे ॥
न बहुत उष्ण, न बहुत शीत, थोड़ी चेतना हो, भौंचका सा देखे, कान्ति
नष्ट हो, जिह्वा खरदरी हो, गला सूखा, पसीना, पाखाना और मूत्र न होता हो,
आँसू आवे, आँखे टेढी हों जांय, भाजन से द्वेष हो, स्वर मारा जाय, सांस

२६० चरकसंहिता [ अ० ३
दोषे विबद्धे नष्टेऽग्नौ सर्वसम्पूर्णलक्षणः ।
सन्निपातज्वरोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यस्त्वतोऽन्यथा ॥ ११०॥
सन्निपात ज्वर की साध्य-असाध्यता—यदि दोष (वातादि और मल)
शरीर के अन्दर ही रुक जाये, अग्नि मन्द हो, सन्निपात ज्वर के सम्पूर्ण लक्षण
दिखाई देते हो तो सन्निपात ज्वर असाध्य है । यदि सम्पूर्ण लक्षण दिखाई न
दे, दोष बाहर आते हो, अग्नि भी प्रबल हो तो रोग कष्टसाध्य होता है ॥११०॥
निदाने त्रिविधा प्रोक्ता या पृथग्ज्वराकृतिः ।
संसर्गसन्निपाताना तथा चोक्तं स्वलक्षणम् ॥ १११ ॥
ज्वरनिदान-स्थान मे वर्णित पृथक् पृथक् दोषो से उत्पन्न होने वाले
ज्वरो के तीन प्रकार के लक्षण, द्वन्द्वज ज्वरो तथा सन्निपातज ज्वरो के लक्षण
मिला कर सात प्रकार के ज्वर कह दिये है ॥ १११ ॥
आगन्तुरष्टमो यस्तु स निर्दिष्टश्चतुर्विधः ।
अभिघाताभिषङ्गाभ्यामभिचाराभिशापतः ॥ ११२ ॥
आठवाँ आगन्तुज ज्वर चार प्रकार का है । जैसे—अभिघातजन्य, अभि-
षग्जन्य, अभिचारजन्य और अभिशापजन्य ॥ ११२ ॥
शस्त्रलोष्टकशाकाष्ठमुष्ट्यरत्नितलद्विजैः ।
तद्विधैश्च हते गात्रे ज्वरः स्यादभिघातजः ॥ ११३ ॥
तत्राभिघातजे वायुः प्रायो रक्तं प्रदूषयन् ।
सव्यथाशोफवैवर्ण्यं करोति सरुजं ज्वरम् ॥ ११४ ॥
इनमे अभिघातजन्य ज्वर—शस्त्र, ढेला, कशा, लकडी, मुक्का, अरत्नि,
हाथ पैर के तले, दाँत तथा अन्य इसी प्रकार के कारणो से देह या अगो पर
चोट लगने से उत्पन्न होता है । अभिघातजन्य ज्वर मे प्रायः करके वायु रक्त
को दूषित कर पीडा, सूजन, विवर्णता (रग परिवर्त्तन), वेदना तथा ज्वर
उत्पन्न करता है ॥ ११३-११४ ॥
कामशोकभयक्रोधैरभिषक्तस्य यो ज्वरः ।
सोऽभिषङ्गज्वरो ज्ञेयो यश्च भूताभिषङ्गजः ॥ ११५ ॥
कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं त्रयो मलाः ।
भूताभिषङ्गात्कुप्यन्ति भूतसामान्यलक्षणाः ॥ ११६ ॥
भूताधिकारे व्याख्यातं तदष्टविधलक्षणम् ।
धौंकनी के तुल्य हो, गिर पडे, सो जाय, बके, उसे अभिन्यास ज्वर कहते है ।
यह सन्निपात-ज्वर असाध्य है ।