चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२७
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३२७
निवृत्तेऽपि ज्वरे तस्माद्यथावस्थं यथाबलम् ।
यथाप्राणं हरेद्दोषं प्रयोगैर्वा शमं नयेत् ॥ ३३९ ॥
मृदुभिः शोधनैः शुद्धिर्यापना वस्तयो हिताः ।
हिताश्च लघवो यूषा जाङ्गलामिषजा रसाः ॥ ३४० ॥
अभ्यङ्गोद्वर्त्तनस्नानधूपनाभ्यञ्जनानि च ।
हितानि पुनरावृत्ते ज्वरे तिक्तघृतानि च ॥ ३४१ ॥
गुर्व्यभिष्यन्द्यसात्म्यानां भोजनात्पुनरागते ।
लङ्घनोष्णोपचारादिः क्रमः कार्यश्च पूर्ववत् ॥ ३४२ ॥
किराततिक्तं तिक्ता मुस्तं पर्पटकोऽमृता ।
घ्नन्ति पीतानि चाभ्यासात्पुनरावर्तकं ज्वरम् ॥ ३४३ ॥
तस्यां तस्यामवस्थायां ज्वरितानां विचक्षणः ।
ज्वरक्रियाक्रमापेक्षी कुर्यात्तत्र चिकित्सितम् ॥ ३४४ ॥
रोगराट् सर्वभूतानामन्तकृद्दारुणो ज्वरः ।
तस्माद्विशेषतस्तस्य यतेत प्रशमं भिषक् ॥ ३४५ ॥ इति ।
( ३ ) ज्वर से मुक्त पुरुष के लक्षण—क्लम ( थकान ) और सन्ताप से
रहित, व्यथा से रहित, प्रसन्न इन्द्रियों वाले, स्वाभाविक मन वाले पुरुष को ज्वर
से मुक्त समझना चाहिये ।
( ४ ) ज्वर वाले और ज्वर से मुक्त दोनो पुरुषो को चाहिये कि विदाही,
गुरु, असात्म्य अन्नपान और विरुद्ध भोजन का परित्याग कर दे । इसी प्रकार से
व्यवाय ( स्त्रीसंग ), अधिक चलना-फिरना, स्नान, अधिक खाना
इनका भी परित्याग करे । इस प्रकार करने से ज्वर शान्त हो जाता है और
फिर दुबारा नहीं होता । ( ५ ) ज्वर से उठे रोगी जब तक बलवान् न हो तब
तक व्यायाम, मैथुन, स्नान और घूमना-फिरना परित्याग कर देवे । ज्वर से मुक्त
निर्बल व्यक्ति यदि इनका सेवन करे, तो ज्वर पुनः लौट आता है । (६) दोषों
के भली प्रकार बाहर न निकलने पर जो ज्वर शान्त हो जाता है, वह थोडे से
भी मिथ्या आहार-विहार से पुन आ जाता है । पुन लोट कर आया ज्वर देर
से पीडित, निर्बल, कमजोरमन वाले, पुरुष को शीघ्र.ही मार देता है । (७) अथवा
अवशिष्ट दोष ज्वर का पुन न करके धातुओ मे धीरे वीरे पकते रहते है । वे
ज्वर को उत्पन्न करके अन्य हानियाँ करते है । जैसे—दीनता, शोथ, ग्लानि,
पाण्डुता, भोजन मे अनिच्छा, कण्डू ( खाज ), कोठ, पिडकाये और मन्दाग्नि
करते है । ( ८ ) इसी प्रकार से दोषो के सम्पूर्ण न निकलने पर जो रोग एक
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बार नष्ट हो चुकते है, वे अहिताचरण से पुन हो जाते है। (६) इसलिये
ज्वर के उतर जाने पर भी अवस्था, बल और श क के अनुसार दोषो का
सशोधन अथवा प्रयोगो द्वार। इनका शमन करे। इसके लिये मृदु सशोधनो से
शुद्धि, मुस्तादि यापना वस्तियाँ, लघु गुणवाले यूष, जाँगल पशु पक्षियो का
मास-रस हितकारी है। इसी प्रकार अभ्यग, उबटन, स्नान, धूपन, अजन और
तिक्त द्रव्यो से सावित या पञ्चतिक्त घृत ज्वर के पुन होजाने पर हितकारी है।
(१०) जो ज्वर गुरु, अभिष्यन्दी और असात्म्य भोजन के सेवन से पुनः हुआ
हो उसके लिये लङ्घन और उष्ण उपचार आदि प्रथम कहा हुआ क्रम पूर्व की
भाँ ति बरते। (११) चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, पित्त पापड़ा और गिलोय
इनका कषाय कुछ दिनो तक लगातार पीने से बार बार लौट कर आने वाला
ज्वर नष्ट हो जाता है। ज्वराक्रान्त रोगी की उस उस अवस्था मे ज्वर-चिकित्सा-
क्रम के अनुसार वैसी वैसी चिकित्सा कर । ज्वर रोगो का राजा है, सब प्राणियो
का अन्त करने वाला है, वह कष्टदायक है। इसलिये वैद्य इसकी शान्ति मे
विशेषतः प्रयत्न करे ॥३२६-३४५॥
तत्र श्लोकः—यथाक्रमं यथाप्रश्नमुक्त ज्वरचिकित्सितम् ।
अत्रिजेनाग्निवेशाय भूताना हितमिच्छता ॥ ३४६ ॥
भगवान् आत्रेय ने प्राणियो की हितकामना से अग्निवेश के प्रश्नो के क्रम से
ज्वर की चिकित्सा का वर्णन कर दिया है ॥ ३४६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
तृतीयोऽध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
ज्वर के सताप से रक्त-पित्त उत्पन्न होता है, इसलिये ज्वर के पीछे रक्त-
पित्त की चिकित्सा के लिये इस अध्याय का अवतरण करते है।
अथातो रक्तपित्तचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम 'रक्त-पित्त चिकित्सित' की व्याख्या करते है भगवान् आत्रेय ने ऐसा
उपदेश किया है ॥ १-२ ॥