चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २९३
अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २९३
१मनस्यभिहते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा बलम् ।
ज्वरः प्राप्नोति वाताद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ १२८ ॥
काम आदि द्वारा मन के आक्रान्त होने पर उत्पन्न ज्वर प्रथम अधिक
बलवान् नहीं होता । परन्तु जब शरीर के वातादि दोषों में मिल जाता है, तब
अधिक बलवान् हो जाता है ॥ १२८ ॥
संसृष्टाः सन्निपतिताः पृथग्वा कुपिता मलाः ।
रसाख्यं धातुमन्वेत्य पक्ति स्थानान्निरस्य च ॥ १२९ ॥
स्वेन तेनोष्मणा चैव कृत्वा देहोष्मणो बलम् ।
स्रोतांसि रुद्ध्वा सम्प्राप्ताः केवलं देहमुल्बणाः ॥ १३० ॥
सन्तापमधिकं देहे जनयन्ति नरस्तदा ।
भवत्यत्युष्णसर्वाङ्गो ज्वरितस्तेन चोच्यते ॥ १३१ ॥
स्रोतसां संनिरुद्धत्वात्स्वेदं ना नाधिगच्छति ।
स्वस्थानात्प्रच्युते चाग्नौ प्रायस्तरुणे ज्वरे ॥ १३२ ॥
ज्वर—पृथक् पृथक्, द्वन्द्व रूप में या सन्निपात रूप में कुपित वातादि
दोष रस नामक धातु का सहारा लेकर अग्नि को उसके असली स्थान से (आमा-
शय से) निकाल कर, अपनी गरमी से देह की गरमी को बढ़ाकर, स्रोतों को
बन्द करके, देह में फैलकर शरीर में अधिक (मात्रा से अधिक) सन्ताप उत्पन्न
कर देते हैं । उससे मनुष्य का ज्वर उत्पन्न हो जाता है । उसके सब अंग गरम
हो जाते हैं, इस अवस्था का 'ज्वर' कहते हैं । स्रोतों के रुक जाने से और
अग्नि के अपना स्थान छोड़ देने के कारण तरुण (नूतन) ज्वर में पसीना
नहीं आता ॥ १२९-१३२ ॥
अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च।
हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चाऽऽलस्यमेव च ॥ १३३ ॥
ज्वरोऽविसर्गी बलवान दोषाणामप्रवर्तनम् ।
लालाप्रसेको हृल्लासो क्षुन्नाशो विरस मुखम् ॥ १३४ ॥
स्तब्धमुग्रगुरुत्वं च गात्राणां बहुमूत्रता ।
न निङ्गीर्णा न च ग्लानिर्ज्वरस्याऽऽमस्य लक्षणम् ॥ १३५ ॥
आमज्वर के लक्षण—अरुचि, अविपाक, पेट में भारीपन, हृदय (आमा-
शय) का साफ न होना, तन्द्रा, आलस्य, निरन्तर ज्वर का बना रहना, ज्वर
१ मनस्यभिद्रुते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा बलम् ।
ज्वर प्राप्नोति कामाद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ इति गंगाधरसम्मतः पाठः ।
२६४ चरकसंहिता [अ० ३
का बलवान् होना, मल वा दोषों का बाहर न निकलना, मुख से लार बहना,
जी मचलाना, भूख का न लगना, मुख का स्वाद बदल जाना (विरसता),
गात्रो मे जडता, सुप्तता और भारीपन, बार बार थोडा २ मूत्र का आना, कच्चे
मल का आना और ग्लानि ये आमज्वर के लक्षण है ॥ १३३-१३५ ॥
ज्वरवेगोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः ।
मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ १३६ ॥
पच्यमान ज्वर के लक्षण—ज्वर का अधिक बढना, प्यास, प्रलाप, सास
का जोर से चलना, चक्कर आना, मल की प्रवृत्ति, उत्क्लेश (वमन की अभिरुचि),
ये पच्यमान ज्वर के लक्षण है ॥ १३६ ॥
क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् ।
दोषप्रवृत्तिरष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ १३७॥
निराम ज्वर—भूख का लगना, शरीर मे हल्कापन, ज्वर का घट जाना,
मल-मूत्र स्वेद का बाहर निकलना, तथा आठवे दिन तक दोष का रहना ये
निराम ज्वर के लक्षण है । [ साधारणत आठवे दिन मे दोषो का परिपाक हो
जाता है। परन्तु कई बार दोष आठ दिन से पूर्व भी पच जाते है और कई
बार इससे भी अधिक देर मे पचते है । इसलिये लक्षणा को देख कर पक्व दोष
की परीक्षा करे । जब ज्वर आप से आप कम हो जावे, देह हलका हो, मल
विचलित हो, तब दोषो का पाक हुआ जाने ] ॥ १३७ ॥
नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गान्नमैथुनम् ।
क्रोधप्रवातव्यायामकषायांश्च विवर्जयेत् ॥ १३८ ॥
नवज्वर मे अपथ्य—दिन मे साना, स्नान करना, मालिश, मैथुन, क्रोध,
प्रवात (वायु का सीधा आना ), व्यायाम और कषाय रसवाले (कषाय
स्तम्भक होने से) सेवन नही करने चाहिये । [ कषाय शब्द से कपाय रस
वाले क्वाथ तथा अन्य कषाय कल्पना का भी निषेध है । परन्तु इस अवस्था
मे साधन कषाय न देकर, पाचक, मधुर कषाय दे सकते है। सोल्ह गुण जल
मे चतुर्थ भाग शेष करने से 'कषाय' बनता है। यह कषाय तरुण ज्वर मे न
देना चाहिये ] ॥ १३८ ॥
ज्वरे लङ्घनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् ।
क्षयानिलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥ १३६ ॥
लङ्घनेन क्षयं नीते दोषे संधुक्षितेऽनले ।
विज्वरत्वं लघुत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते ॥ १४० ॥