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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२१

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२१

श्लैष्मिके ग्रहणीदोषे बलवर्णाग्निवर्धनम् ॥ १७० ॥
एतैरेवौषधैः सिद्धं सर्पिः पेयं समारुते ।
गौल्मिके षट्पलं प्रोक्तं भल्लातकघृतं च यत् ॥ १७१ ॥
(३६) पिप्पली, पिप्पलीमूल, सर्जक्षार, यवक्षार, पाचो नमक (सैन्धव,
सामुद्र, बिड्, सचल और उद्भिद), बिजौरा, हरड, रास्ना, शठी, मरिच
ओर साठ इनको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को गरम
पानी के साथ पीना चाहिये । इससे कफजन्य ग्रहणीदाप मे बल और अग्नि की
वृद्धि होती है ।
(४०) इन्ही ओषधियों न घृत सिद्ध करके वात, कफजन्य ग्रहणी मे पीना
चाहिये । गुल्म रोग मे कथित षट् पल घृत या भल्लातक घृत का सेवन करना
चाहिये ॥ १६६-१७१ ॥
बिडं कालोत्थवणं सर्जकायवशूकजम् ।
सप्तला कण्टकारी च चित्रकं चेति दाहयेत् ॥ १७२ ॥
सप्तकृत्वः स्रुतस्यास्य क्षारस्य द्वयाढकेन तु ।
आढक सर्पिषः पक्त्वा पिबेदग्निविवर्धनम् ॥ १७३ ॥
इति क्षारघृतम् ।
(४१) क्षार घृत—बिड् नमक, काल लवण ओर तुष लवण (पाञ्च
नमक), सर्जक्षार, यवक्षार, सप्तला (चीका खाई), कटेरी ओर चीता इनके
टुकड़े करके जलाना चाहिये । इस राख का पानी मे घोल कर सात बार छान
लेना चाहिये । इस नितरे या छने हुए क्षार के दा आढक लेकर इसमे एक आढक
घृत मिला कर घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत अग्निवर्धक हे ॥१७२-१७३॥
समूला पिप्पली पाठा चव्येन्द्रयवनागरम् ।
चित्रकातिविषे हिङ्गु श्वदंष्ट्रा कटुरोहिणीम् ॥ १७४ ॥
वचा च कार्षिकान् पञ्च लवणाना पलानि च ।
दध्नः प्रस्थद्वये तैलसर्पिषोः कुडवद्वये ॥ १७५ ॥
चूर्णीकृतानि निष्क्वाथ्य शनैरन्तर्गते रसे ।
अन्तर्धूम ततो दग्ध्वा चूर्ण कृत्वा घृताप्लुतम् ॥ १७६ ॥
पिबेत्पाणितलं तस्मिञ्जीर्णे स्यान्मधुराशनः ।
वातश्लेष्मामयान्सर्वान्हन्याद्विषगराश्च सः ॥ १७७ ॥
(४२) पिप्पली, पिप्पलीमूल, पाठा, चविका, इन्द्रजौ, सोंठ, चीता,
अतीस, हींग, गोखरू, कुटकी और वच प्रत्येक वस्तु का चूर्ण एक कर्ष मिलित

६२२ चरकसंहिता [ अ० १५
पाचों नमक एक पल, दही दो प्रस्थ, तैल और घृत मिलित दो कुड़व लेकर एक
पात्र में रख देना चाहिये । ऊपर से इनको ढाप देना चाहिये । फिर इसके
नीचे धीमी धीमी अग्नि जलानी चाहिये । जब दवाइयों का रस सब निकल जाये
और चूर्ण जलने न पाये केवल घृत शेष रह जाये तो उतार लेना चाहिये । इस
चूर्ण को घृत में मिला कर एक कर्ष मात्रा मे पीना चाहिये । इसके जीर्ण होने
पर मधुर पदार्थ खाना चाहिये । यह औषध वात, कफजन्य रोगो को, विष को
तथा गर ( सयोग जन्य ) विष को नष्ट करता है ॥ १७४-१७७ ॥
भल्लातकं त्रिकटुकं त्रिफलां लवणत्रिकम् ।
अन्तर्धूमं द्विपलिकं गोपुरीषाग्निना दहेत् ॥ १७८ ॥
स क्षारः सर्पिषा पीतो भोज्ये चाप्यवचारितः१ ।
हृत्पाण्डुग्रहणीदोषगुल्मोदावर्त्तशूलनुत् ॥ १७६ ॥
( ४३ ) भिलावा, सोठ, मरिच, पिप्पली, हरड़, बहेड़ा, आवला, तीन लवण
( सौवर्चल, सैन्धव और बिड नमक ) प्रत्येक वस्तु दो दो पल लेकर अन्तर्धूम
'अग्नि से पकाना चाहिये । इसमे अरण्ये उपलो की आच देनी चाहिये । इस
क्षार को घी मे मिला कर पीना चाहिये अथवा भोजन मे, दाल, शाक मे डाल
कर खाना चाहिये । हृदयरोग, पाण्डुरोग, ग्रहणीरोग, गुल्म, उदावर्त्त और
शूल को यह क्षार नष्ट करता है ॥ १७६ ॥
दुरालभा करञ्जौ द्वौ सप्तपर्ण सवत्सकम् ।
षड्ग्रन्थां सदनं मूर्वा पाठामागर्वधं तथा ॥ १८० ॥
गोमूत्रेण समांशानि कृत्वा चूर्णानि दाहयेत् ।
दग्ध्वा च तं पिबेत्क्षारं ग्रहणीबलवर्धनम् ॥ १८१ ॥
इति प्रथमः क्षारः ।
( ४४ ) क्षार (१)-दुरालभा, करज और पूति करज, सतवन, कुटज की
छाल (या इन्द्रजौ ), षड्ग्रन्था (वच), मैनफल, मूर्वा, पाठा, अमलतास इनको
परस्पर समान भाग लेकर सबके बराबर गोमूत्र मिला कर इनको जलाना चाहिये
जलाकर इस क्षार का पीना चाहिये, इससे ग्रहणी (अग्नि) का बल बढ़ता है ॥१८१॥
भूनिम्बं रोहिणीं तिक्तां पटोलं निम्बपर्पटम् ।
दहेन्माहिषमूत्रेण क्षार एषोऽग्निवर्धनः ॥ १८२ ॥
इति द्वितीयः क्षारः ।
(४५) क्षार (२) - भूनिम्ब (चिरायता), रोहिणी (रोहेड़ा), तिक्ता (कुटकी),
१. “चाप्यवचूर्णितः” इति च पाठः ।

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२३
पटोल, नीम की छाल, पित्तपापड़ा इनको समान भाग लेकर सब के बराबर भैंस
का मूत्र लेकर जलाना चाहिये यह क्षार अग्निवर्धक है ॥ १८२ ॥
द्वे हरिद्रे वचा कुष्ठं चित्रकः कटुरोहिणी ।
मुस्तं च बस्तमूत्रेण सिद्धः क्षारोऽग्निवर्धनः ॥ १८३ ॥
इति तृतीयः क्षारः ।
(४६) क्षार (३)—दोनो हल्दिया (हरिद्रा और दारुहल्दी), वच,
कूठ, चीता, कुटकी और नागरमोथा इनको समान भाग लेकर सबके बराबर
बकरे का मूत्र लेकर जलाना चाहिये। यह क्षार अग्निवर्धक है ॥ १८३ ॥
चतुष्पलं सुधाकाण्डात्रिपलं लवणत्रयात् ।
वार्त्ताकीकुडवं चार्कादष्टौ द्वे चित्रकात्पले ॥ १८४ ॥
दग्धानि वार्त्ताकुरसे गुलिका भोजनोत्तराः ।
भुक्तं भुक्तं पचन्त्याशु कासश्वासार्शसां हिताः ॥ १८५ ॥
विसूचिकाप्रतिश्यायहृद्रोगशमनाश्च ताः ।
इत्येषा क्षारगुडिका कृष्णात्रेयेण कीर्तिता १ ॥ १८६ ॥
इति क्षारगुडिकाः ।
(४७) सेहुण्ड का डण्डा ४ पल, तीनो नमक (सौवर्चल, विड् और
सैन्धव) मिलित तीन पल, वार्त्ताकी (बेगन) एक कुडव, आक ८ पल, चीता
दो पल इनको जला कर क्षार बना लेना चाहिये। इस क्षार की बेगन के रस मे
गोलिया बाधनी चाहिये। इन गोलियों को भोजन के पीछे खाना चाहिये।
इनके सेवन से खाया हुआ भोजन शीघ्र पच जाता है, ये कास, श्वास और
अर्श-रोग मे हितकारी हैं। इनसे विसूचिका, प्रतिश्याय और हृदयरोग नष्ट होते
हैं। इस क्षार-गुटिका का उपदेश कृष्णात्रेय ने किया है ॥ १८४-१८६ ॥
वत्सकातिविषे पाठा दुःस्पर्शा हिङ्गु चित्रकम् ।
चूर्णीकृत्य पलाशाना क्षारे मूत्रस्रुते पचेत् ॥ १८७ ॥
आयसे भाजने सान्द्रात्तस्मात्कोलं सुखाम्बुना ।
मद्यैर्वा ग्रहणीदोषे शोथार्शः पाण्डुमान् पिवेत् ॥ १८८ ॥
(४८) वत्सक (इन्द्रजौ), अतीस, पाठा की छाल, दुःस्पर्शा (कौच),
हींग और चीता इन सब को समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये। पलाश
(ढाक) को जला कर उसकी भस्म को गोमूत्र मे घोल लेना चाहिये।
फिर इसको छान या नितार लेना चाहिये। अब इस मूत्रयुक्त क्षार में
१ इतिश्लोकार्धः कतिपयपुस्तकेषु न दृश्यते ।

६२४ चरकसंहिता [अ० १५
उपरोक्त चूर्ण को मिला कर लोहे के पात्र मे पकाना चाहिये । जब यह घट्ट
(कठिन) बन जाये तो इसमे से चार मासा मात्रा गरम पानी के साथ खानी
चाहिये । अथवा मद्य के साथ इसको खाना चाहिये । इससे ग्रहणीरोग, शोथ,
अर्श और पाण्डुरोग नष्ट होता है ॥ १८७-१८८ ॥
त्रिफला कटभी चव्यं बिल्वनध्यमयो रजः ।
रोहिणी कटुका मुस्तं कुष्ठं पाठा च हिङ्गु च ॥ १८६ ॥
मधुकं मुष्ककयवक्षारौ त्रिकटुक वचाम् ।
विडङ्गं पिप्पलीमूलं स्वर्जिका निम्बचित्रकौ ॥ १६० ॥
मूर्वाजमोदेन्द्रयवान् गुडूचीं देवदारु च ।
कार्षिकं लवणानां च पञ्चानां पलिकान्पृथक् ॥ १६१ ॥
भागान्दध्नि त्रिकुडवे घृततैलेन मूर्च्छितान् ।
अन्तर्धूमं शनैर्दग्ध्वा तस्मात्पाणितलं पिबेत् ॥ १६२ ॥
सपिषा कफवाताशार्ग्रहणीपाण्डुरोगवान् ।
प्लीहमूत्रग्रहश्वासहिक्काकासक्रिमिज्वरान् ॥ १६३ ॥
शोषातिसारौ श्वयथुं प्रमेहानाहहृद्ग्रहान् ।
हन्यात्सर्वविषं चैव क्षारोऽग्निजननो वरः ॥ १६४ ॥
जीर्णे रसैर्वा मधुरैरश्रीयात्पयसाऽपि वा ।
(४६) हरड़, बहेडा, आंवला, कटभी (वापुवा या अपामार्ग), चविका,
बेलगिरी, लोहभस्म, रोहिणी (रोहेडा), कुटकी, नागरमोथा, कूठ, पाठा,
हींग, मुलहठी, मुष्कक (गुजराती मे मोखो), यवक्षार, त्रिकटु (सोंठ, मरिच,
पिप्पली), वच, बायबिडंग, पिप्पलीमूल, सर्जक्षार, नीम की छाल, चीता, मूर्वा,
अजमोदा, इन्द्रयव, गिलोय और देवदारु प्रत्येक वस्तु एक एक कर्ष ओर
पाचो नमक (सौवर्चल, सामुद्र, सैन्धव, बिड् ओर उद्भिद) पृथक् २ एक एक
पल लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । दधि ३ कुड़व, घृत और तैल मिश्रित ३
कुड़व लेकर अन्तर्धूम से धीरे धीरे पकाना चाहिये । जब यह चूर्ण जल जाये
इसमें से पाणितल अर्थात् कर्ष परिमित मात्रा को घी के साथ पीना चाहिये ।
इससे कफजन्य अर्श, वातजन्य अर्श, ग्रहणी रोग, पाण्डुरोग, प्लीहा, मूत्रग्रह,
श्वास, कास, हिचकी, कृमि रोग, ज्वर, शोष, अतिसार, शोथ, प्रमेह, आनाह,
हृदयग्रह नष्ट होता है । यह क्षार सब विषों को नष्ट करता है, अग्नि को बढ़ाता
है । इसके जीर्ण होने पर मधुर मास-रस के साथ अथवा दूध के साथ अन्न
को खाना चाहिये ॥ १८६-१६४ ॥