चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५८६
अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५८६
पञ्चदशोऽध्यायः
अथातो ग्रहणीचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ग्रहणी-चिकित्सा की व्याख्या करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
आयुर्वर्णो बलं स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा ।
ओजस्तेजोऽग्नयः प्राणाश्चोक्ता देहाग्निहेतुकाः ॥ ३ ॥
आयु, वर्ण, बल, स्वास्थ्य, उत्साह, उपचय (पुष्टि), प्रभा, ओज, तेज,
अग्निया और प्राण इन सब की स्थिति का कारण देह की जाठर अग्नि ही है १॥३॥
शान्तेऽग्नौ म्रियते युक्ते चिरं जीवत्यनामयः ।
रोगी स्याद्विकृते मूलमग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ४ ॥
अग्नि के शान्त होने पर प्राणी मर जाता है और अग्नि के युक्त अर्थात्
समभाव मे रहने पर प्राणी देर तक नीरोग रह कर जीता है। अग्नि के विकृत
होने (मन्द या तीक्ष्ण अथवा विषम हो जाने) पर मनुष्य रोगी हो जाता है।
इसलिये देहाग्नि को आयु, वर्ण, बल आदि का प्रधान कारण कहा जाता है ॥४॥
यदन्नं देहधात्वोजोबलवर्णादिपोषकम् ।
तत्राग्निर्हेतुराहारान्न ह्यपक्वाद्रसादयः ॥ ५ ॥
जो अन्न (भुक्त द्रव्य) देह के धातु, ओज, बल, वर्ण आदि का पोषक
है, वहा पर भी यही अग्नि कारण है। क्योकि बिना पचे आहार से रस-आदि
धातुओं की उत्पत्ति नही होती ॥ ५ ॥
अन्नमादानकर्मा तु प्राणः कोष्ठं प्रकर्षति ।
तद्द्रवैर्भिन्नसंघातं स्नेहेन मृदुतां गतम् ॥ ६ ॥
समानेनावधूतोऽग्निरुदीर्यः पवनेन तु ।
काले भुक्तं समं सम्यक् पचत्यायुर्विवृद्धये ॥ ७ ॥
आहार की परिपाक-विधि—आदान (ग्रहण करना) कर्म वाला प्राण
वायु अन्न को कोष्ठ (आमाशय) मे ले जाता है। यह अन्न द्रव-समूहों से
(क्लेदक कफ के द्रव भाग से) मिल कर छिन्न भिन्न होकर टुकड़े २ हो जाता
१. गीता—अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥
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है और स्नेह द्वारा ( क्लेदक-कफ के स्निग्ध भाग के कारण ) यह अन्न कोमल
हो जाता है । उचित काल मे समयोग अर्थात् उचित मात्रा मे खाये हुए इस
मृदु आहार को समान नामक वायु से प्रज्वलित जाठर अग्नि आयु की वृद्धि के
लिये भली प्रकार से पचाता है १ ॥ ६-७ ॥
एवं रसमलायान्नामाशयस्थमधःस्थितः ।
पचत्यग्निर्यथा स्थाल्यामोदनायाम्बुतण्डुलम् ॥ ८ ॥
अन्नस्य भुक्तमात्रस्य षड्रसस्य प्रपाकतः ।
मधुरात्प्राक् कफोद्भावात्फेनभूत उदीर्यते ॥ ९ ॥
परं तु पच्यमानस्य विदग्धस्याम्लभावतः ।
आशयाच्च्यवमानस्य पित्तमच्छमुदीर्यते ॥ १० ॥
जिस प्रकार पतीली मे रक्खे जल और चावलो को नीचे जलती हुई अग्नि
पका कर भात मे बदल देती है, उसी प्रकार यह जाठराग्नि आमाशय मे स्थित
आहार को पका कर ( जीर्ण करके ) रस और मल मे बदल देती है । आहार
के प्रसाद भाग से रस बनता और शेष मल बन जाता है २ ।
खाते समय ही छ. रस वाले अन्न के प्रथम पाक काल मे सबसे पूर्व मधुर
रस ( माधुर्य ) उत्पन्न होता है । [ थूक का 'टाईलीन' भोजन के निशास्ता
भाग को शर्करा मे बदल देता है ] । इससे झाग के समान कफ उत्पन्न होता
है । पीछे से पचता हुआ यह अन्न विदग्ध होकर ( आमाशय मे पहुच कर
आमाशयिक रस की क्रिया होने पर ) अम्ल-भाव मे परिणत हो जाता है ।
यह अम्लभूत अन्न जब आमाशय से निकल कर पच्यमानाशय ( ग्रहणी के
आन्त्र भाग ) में आता है तब स्वच्छ पित्त बढता है ३ ॥ ८-१० ॥
१. आहारपरिणामकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा ऊष्मा वायुः क्लेद
स्नेहः काल. समयोगश्चेति ( चक्र० ) ।
२. कई आचार्य अन्न के पाक से तीन भागों की उत्पत्ति मानते हैं, स्थूल,
सूक्ष्म और मल-भाग । जिस प्रकार गन्ने के रस को पकाने से उस पर बार-बार
मलाई आती है, इसी प्रकार धातुओं के अग्नि द्वारा परिपाक होने पर अन्न के
तीन भाग हो जाते हैं । ( १ ) सूक्ष्म भाग अगली धातु मे जाता है और
( २ ) स्थूल भाग उसी धातु का पोषण करता है । ( ३ ) मल भाग बाहर हो
जाता है । अन्त मे शुक्राग्नि के पाक से स्थूल और सूक्ष्म दो ही भाग बनते हैं
मल भाग नही रहता है ।
३. पच्यमानाशय में आहार रस की क्रिया क्षारीय बन जाती है । इसमे