चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५४३
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५४३
विष के प्रमाथी होने से धातु आदि मे छिपे दोष तथा उन्मार्ग मे पहुचे
दोष समूह पृथक् होकर शीघ्र ही बाहर निकल आते है ।
विष के कारण दोष के बहार निकल आने पर रोगी को शीतल जल से स्नान
कराके दूध या यवागू खाने के लिये देनी चाहिये ।
नशोथ, मण्डूकपर्णी, यवशाक, बथुए का शाक और कालशाक इनको
इन्ही के स्वरस मे बना कर खाने को देना चाहिये । इन शाको मे अम्ल और
लवण न मिला कर कुछ पके और कुछ न पके शाको को एक मास तक बिना
किसी और अन्न के खाना चाहिये । प्यास लगने पर इनका ही स्वरस पीना
चाहिये ॥ १७६-१८१- ॥
एवं विनिहृते दोषे शाकैर्मासात्परं ततः ॥ १८२ ॥
दुर्बलाय प्रयुञ्जीत प्राणभृत्कारभं पयः ।
इस प्रकार से एक मास तक रहने पर शाक द्वारा दोषा के निकल जाने से
निर्बल हुए रोगी का प्राणदायक ऊट का दूध पिलाना चाहिये ॥ १८२- ॥
इदं तु शल्यहर्तॄणा कर्म स्याद् दृष्टकर्मणाम् ॥ १८३ ॥
वामं कुक्षि मापयित्वा नाभ्यधश्चतुरङ्गुलम् ।
मात्रायुक्तेन शस्त्रेण पाटयेन्मतिमान् भिषक् ॥ १८४ ॥
विपाट्यान्त्रं ततः पश्चाद्रीक्ष्य बद्धक्षतान्त्रयोः ।
सर्पिषाऽभ्यज्य केशादीनवमृज्य विमोक्षयेत् ॥ १८५ ॥
(१६) शस्त्र-चिकित्सा—जिन शल्य चिकित्सको ने अनेक बार शस्त्र-कर्म
देखा है, उनको छिद्रोदर और बद्धोदर मे शल्य-कर्म करना चाहिये ।
बुद्धिमान् ओर शस्त्र-कर्म मे कुशल वैद्य बद्ध-गुदोदर और क्षतान्त्रोदर मे
नाभि के नीचे वाम भाग मे चार अगुल परिमित स्थान को बचा कर कर्मोचित
मात्रा मे शस्त्र से चीरा लगाये । इस प्रकार से कुक्षि को चीर कर और आतो
(दोष युक्त आन्त्रभाग) का बाहर निकाल कर इनको देख कर, केश आदि को
दूर करके पुन. आतो को घी से चिकना करके पूर्व की भांति रख देवे ॥१८३-१८५॥
मूर्छनाद्यच्च संमूढमन्त्रं तच्च विमोक्षयेन् ।
आत के सम्मूर्छन (मिलने) से जो बद्धगुदोदर उत्पन्न हुआ हो उसमे
मल या चिकास को हटा कर घी से चिकना करके पृथक् करना चाहिये । बाह्य
व्रण को सी देना चाहिये ।
छिद्राण्यन्त्रस्य तु स्थूलर्दंशयित्वा पिपीलिकैः ॥ १८६ ॥
बहुशः संगृहीतानि ज्ञात्वा छित्वा पिपीलिकान् ।
प्रतियोगैः प्रवेश्यान्त्रं प्रयैः सीव्येद् व्रणं ततः ॥ १८७ ॥
५४४ चरकसंहिता [ अ० १३
छिद्रोदर मे छिद्रयुक्त आतो को निकाल कर इनकी परीक्षा करके शर्करादि
को हटा कर, अन्त स्त्राव का शोधन करके, छिद्रयुक्त स्थान पर बड़ी-बड़ी
चिऊटियो से कटवाना चाहिये । इनके काटने से जगह मिल जायेगी । जिस
समय अच्छी प्रकार से चिऊटिया काट ल ता उनका काट कर बाहर निकाल
देना चाहिये । इनके शिर को वहा लगा रहने देना चाहिये । फिर आतो को
यथास्थान रख कर कुक्षि के बाह्य व्रण को सूई से सी देना चाहिये।
[ चिउटियो या मकाडो को काटने का प्रकार यह है कि आत का जो भाग
चिरा हो उसके चर्म भागो को एक साथ निउटी के खुले चिमटो मे पकड़ादे
और चिउटी का धड काट दे, शिर भाग वहा ही चिपटा रहेगा १ ] ॥१८६-१८७॥
तथा जातोदकं सर्वमुदरं व्यधयेद्भिषक् ।
वामपार्श्वे त्वधो नाभेनार्डी दत्त्वा च गालयेत् ॥ १८८ ॥
निःस्त्राव्य च विमृज्येतद्वेष्टयेद्वाससोदरम् ।
तथा बस्तिविरेकाद्यैर्म्लानं सर्वं च वेष्टयेत् ॥ १८९ ॥
पेट मे पानी भरने पर व्रण का वेधन करना चाहिये । इसके लिये नाभि से
नीचे वाम भाग मे चार अगुल स्थान छोड़ कर वधन करना चाहिये । फिर
नाड़ी लगा कर सब दोषदक का निकाल लेना चाहिये । उदर को मल कर सब
पानी निकाल लेना चाहिय, फिर नाड़ी को निकाल कर उदर को मजबूत वस्त्र
से बाध देना चाहिये । इसी प्रकार बस्ति या विरेचन आदि दोष निःसारक
कार्य से म्लान हुए रोगी के उदर को वस्त्र से बाध देना चाहिये, इससे वायु
अफारा नही करती ॥ १८८-१८६ ॥
निःस्रुते लङ्घितः पेयामस्नेहलवणा पिबेत् ।
अतः परं च षण्मासान् क्षीरवृत्तिर्भवेन्नरः ॥ १९० ॥
त्रीन् मासान् पयसा पेयां पिबेत्त्रींश्चापि भोजयेत् ।
१ सुश्रुत मे विस्तार से विधि दी है यथा—
बद्धगुदे परिस्राविणि च स्निग्धस्विन्नाभ्यक्तस्याधोनाभेर्वामतश्चतुरङ्गुलमपहाय
रोमराज्या उदर पाटयित्वा चतुरङ्गुलप्रमाणान्यन्त्राणि निष्कृष्य निरीक्ष्य बद्ध-
गुदस्य अन्नप्रतिरोधकरमश्मान वाल वाऽपोह्य मलजात वा ततो मधुसर्पिर्भ्यामभ्य-
ज्यान्त्राणि यथास्थान स्थापयित्वा बाह्य व्रणमुदरस्य सीव्येत् ॥ परिस्राविण्यप्येव-
मेव शल्यमुद्धृत्यान्त्रस्त्रावान् संशोध्य सच्छिद्रमन्त्र समाधाय कालपिपीलिकाभिर्दश-
येत् । दष्टे च तासा कायानपहरेत् न शिरांसि। ततः पूर्ववत् सीव्येत् ॥सु०चि०१४॥