वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६६- दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक-शिव-सन्दर्भ
अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त [ ३०७
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽभ्यागाद् वेदवती नाम्ना गन्धर्वकन्यका।<br>पर्जन्यतनया साध्वी घृताचीगर्भसम्भवा॥ ३०<br><br>सा चाभ्येत्य जले पुण्ये स्नात्वा मध्यमपुष्करे।<br>ददर्श कन्यात्रितयमुभयोस्तटयोः स्थितम्॥ ३१<br><br>चित्राङ्गदामथाभ्येत्य पर्यपृच्छदनिष्ठुरम्।<br>कासि केन च कार्येण निर्जने स्थितवत्यसि॥ ३२ | भीतर ही स्थित रहे। उसके बाद वेदवती नामकी गन्धर्व-कन्या वहाँ आयी। वह साध्वी घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई थी एवं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री थी। उसने आकर मध्यम पुष्करतीर्थके पवित्र जलमें स्नान किया और दोनों तटोंपर स्थित (उन) तीनों कन्याओंको देखा। इसके बाद चित्राङ्गदाके समीप जाकर उसने सरलतासे पूछा—तुम कौन हो? और किस कार्यसे इस निर्जन स्थानमें स्थित हो?॥ २९—३२॥ |
| सा तामुवाच पुत्रीं मां विन्दस्व सुरवर्धकेः।<br>चित्राङ्गदेति सुश्रोणि विख्यातां विश्वकर्मणः॥ ३३<br><br>साहमभ्यागता भद्रे स्नातुं पुण्यां सरस्वतीम्।<br>नैमिषे काञ्चनाक्षीं तु विख्यातां धर्ममातरम्॥ ३४<br><br>तत्रागताथ राज्ञाऽहं दृष्टा वैदर्भकेण हि।<br>सुरथेन स कामार्तो मामेव शरणं गतः॥ ३५<br><br>मयात्मा तस्य दत्तश्च सखीभिर्वार्यमाणया।<br>ततः शप्ताऽस्मि तातेन वियुक्तास्मि च भूभुजा॥ ३६ | उस (चित्राङ्गदा)-ने उस (वेदवती)-से कहा—हे सुश्रोणि! मुझे देवशिल्पी विश्वकर्माकी चित्राङ्गदा नामसे प्रसिद्ध पुत्री जानो। भद्रे! मैं नैमिषमें धर्मकी जननी काञ्चनाक्षी नामसे प्रसिद्ध पवित्र सरस्वती नदीमें स्नान करने आयी थी। वहाँ आनेपर विदर्भवंशमें उत्पन्न राजा सुरथने मुझे देखा और कामपीड़ित होकर मेरी शरणमें आया। सखियोंके रोकनेपर भी मैंने उन्हें अपनेको समर्पित कर दिया। उसके बाद पिताजीने मुझे शाप दे दिया और मैं राजासे वियोगिनी हो गयी॥ ३३—३६॥ |
| मर्तुं कृतमतिर्भद्रे वारिता गुह्यकेन च।<br>श्रीकण्ठमगमं द्रष्टुं ततो गोदावरं जलम्॥ ३७<br><br>तस्मादिमं समायाता तीर्थप्रवरमुत्तमम्।<br>न चापि दृष्टः सुरथः स मनोह्लादनः पतिः॥ ३८<br><br>भवती चात्र का बाले वृत्ते यात्राफलेऽधुना।<br>समागता हि तच्छंस मम सत्येन भामिनि॥ ३९<br><br>साब्रवीच्छ्रूयतां याऽस्मि मन्दभाग्या कृशोदरी।<br>यथा यात्राफले वृत्ते समायाताऽस्मि पुष्करम्॥ ४० | भद्रे! मैंने मरनेका विचार किया; परंतु गुह्यकने मुझे रोक दिया। उसके बाद मैं श्रीकण्ठभगवान्का दर्शन करनेके लिये गयी और वहाँसे गोदावर जलके निकट गयी, (और अब) वहाँसे मैं इस श्रेष्ठ उत्तम तीर्थमें आ गयी हूँ। किंतु मनको आनन्दित करनेवाले उन सुरथ पतिको मैंने नहीं देखा। बाले! यात्राफलके समाप्त होनेपर (पर्वकी समाप्ति हो जानेपर) आज यहाँ आनेवाली आप कौन हैं? भामिनि! मुझे सच-सच बतलाओ। उसने कहा—कृशोदरि! मैं मन्दभागिनी कौन हूँ तथा यात्राफलके समाप्त होनेपर पुष्करमें क्यों आयी हूँ, उसे सुनो॥ ३७—४०॥ |
| पर्जन्यस्य घृताच्यां तु जाता वेदवतीति हि।<br>रममाणा वनोद्देशे दृष्टाऽस्मि कपिना सखि॥ ४१<br><br>स चाभ्येत्याब्रवीत् का त्वं यासि देववतीति हि।<br>आनीतास्याश्रमात् केन भूपृष्ठान्मेरुपर्वतम्॥ ४२<br><br>ततो मयोक्तो नैवास्मि कपे देववतीत्यहम्।<br>नाम्ना वेदवतीत्येवं मेरोरपि कृताश्रया॥ ४३ | मैं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री हूँ तथा घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई हूँ। मेरा नाम वेदवती है। सखि! वनप्रदेशमें भ्रमण कर रही मुझको एक बन्दरने देखा। उसने समीपमें आकर मुझसे कहा—तुम कौन हो? कहाँ जा रही हो? (निश्चय ही तुम) देववती हो। पृथ्वीपर रहनेवाले आश्रमसे मेरुपर्वतपर तुम्हें कौन लाया है? इसपर मैंने कहा—कपे! मैं देववती नहीं हूँ, मेरा नाम वेदवती है। मेरुपर्वतपर ही मैंने अपना |
| ३०८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
|---|
| ततस्तेनातिदुष्टेन वानरेण हृषिद्रुता।<br>समारूढास्मि सहसा बन्धुजीवं नगोत्तमम्॥ ४४ | आश्रम बना लिया है। उसके बाद अत्यन्त दुष्ट उस बन्दरसे खदेड़ी जाती हुई मैं बन्धुजीव (गुलदुपहरिया) के उत्तम वृक्षपर शीघ्रतासे चढ़ गयी॥ ४१-४४॥ |
| तेनापि वृक्षस्तरसा पादाक्रान्तस्त्वभज्यत।<br>ततोऽस्य विपुलां शाखां समालिङ्ग्य स्थिता त्वहम्॥ ४५<br><br>ततः प्लवङ्गमो वृक्षं प्राक्षिपत् सागराम्भसि।<br>सह तेनैव वृक्षेण पतितास्म्यहमाकुला॥ ४६<br><br>ततोऽम्बरतलाद् वृक्षं निपतन्तं यदृच्छया।<br>ददृशुः सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ४७<br><br>ततो हाहाकृतं लोकैर्मां पतन्तीं निरीक्ष्य हि।<br>ऊचुश्च सिद्धगन्धर्वाः कष्टं सेयं महात्मनः॥ ४८<br><br>इन्द्रद्युम्नस्य महिषी गदिता ब्रह्मणा स्वयम्।<br>मनोः पुत्रस्य वीरस्य सहस्रक्रतुयाजिनः॥ ४९ | उसने शीघ्र ही पैरके आघातसे उस वृक्षको तोड़ दिया। उसके बाद मैं उस वृक्षकी एक बड़ी डालीको पकड़कर स्थित रही। फिर बन्दरने उस वृक्षको समुद्रके जलमें फेंक दिया। मैं अत्यन्त घबड़ाकर उस वृक्षके साथ ही जलमें गिर पड़ी। उसके बाद चर और अचर सभी प्राणियोंने आकाशसे गिरनेवाले उस वृक्षको देखा। उसके बाद उसीके साथ मुझको भी गिरती हुई देखकर सभी लोग हाहाकार करने लगे। सिद्ध और गन्धर्वलोग कहने लगे—हाय! यह कष्टकी बात है। इसके सम्बन्धमें तो ब्रह्माने स्वयं कहा था कि यह कन्या हजारों यज्ञोंके करनेवाले मनुके वीर पुत्र इन्द्रद्युम्नकी राजरानी होगी (पर यह क्या हो गया!)॥ ४५-४९॥ |
| तां वाणीं मधुरां श्रुत्वा मोहमस्यागता ततः।<br>न च जाने स केनापि वृक्षश्छिन्नः सहस्रधा॥ ५०<br><br>ततोऽस्मि वेगाद् बलिना हृतानलसखेन हि।<br>समानीतास्म्यहमिमं त्वं दृष्टा चाद्य सुन्दरि॥ ५१<br><br>तदुत्तिष्ठस्व गच्छावः पृच्छावः क इमे स्थिते।<br>कन्यके अनुपश्ये हि पुष्करस्योत्तरे तटे॥ ५२<br><br>एवमुक्त्वा वराङ्गी सा तया सुत नुकन्यया।<br>जगाम कन्यके द्रष्टुं प्रष्टुं कार्यसमुत्सुका॥ ५३ | उस मधुर वाणीको सुननेके बाद मुझे मूर्च्छा आ गयी। मैं यह नहीं जानती कि उस वृक्षको किसने सहस्रों टुकड़ोंमें काट डाला। उसके बाद अग्निके सखा बलवान् वायुने मुझे शीघ्रतासे यहाँ ला दिया है। सुन्दरि! तुमको आज मैंने यहाँ देखा है। इसलिये उठो, हम दोनों चलें; और फिर पूछें तथा देखें कि पुष्करतीर्थके उत्तरी तटपर दिखायी देनेवाली ये दोनों कन्याएँ कौन हैं? ऐसा कहकर इस कार्यके करनेमें उत्कण्ठित वह सुन्दरी उस सुन्दर तथा दुर्बल देहवाली कन्याके साथ उस पारकी दोनों कन्याओंको देखने तथा वस्तुस्थिति पूछनेके लिये वहाँ गयी॥ ५०-५३॥ |
| ततो गत्वा पर्यपृच्छत् ते ऊचतुरभे अपि।<br>याथातथ्यं तयोस्ताभ्यां स्वमात्मानं निवेदितम्॥ ५४<br><br>ततस्ताश्चतुरोपीह सप्तगोदावरं जलम्।<br>सम्प्राप्य तीर्थे तिष्ठन्ति अर्चन्त्यो हाटकेश्वरम्॥ ५५<br><br>ततो बहून् वर्षगणान् बभ्रमुस्ते जनास्त्रयः।<br>तासामर्थाय शकुनिर्जाबालिः स ऋतध्वजः॥ ५६<br><br>भारवाही ततः खिन्नो दशाब्दशतिके गते।<br>काले जगाम निर्वेदात् समं पित्रा तु शाकलम्॥ ५७ | उसके बाद वहाँ जाकर उसने उन दोनोंसे पूछा। उन दोनोंने अपनी सच्ची घटना उन दोनोंसे बतायीं। उसके बाद चारों कन्याएँ सप्तगोदावर जलके समीप जाकर हाटकेश्वर भगवान्की पूजा करती हुई तीर्थमें रहने लगीं। इधर शकुनि, जाबालि और ऋतध्वज—ये तीनों व्यक्ति उन कन्याओंके लिये अनेक वर्षोंतक भ्रमण करते रहे। तब एक हजार वर्ष बीत जानेपर भार-वहन करनेवाले (जाबालि) खिन्न होकर पिताके साथ शाकल जनपदमें चले गये॥ ५४-५७॥ |
| अध्याय ६५ ] | गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त | ३०१ |
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| तस्मिन्नरपतिः श्रीमानिन्द्रद्युम्नो मनोः सुतः।<br>समध्यास्ते स विज्ञाय सार्घपात्रो विनिर्ययौ॥ ५८<br><br>सम्यक् सम्पूजितस्तेन सजाबालिर्ऋतध्वजः।<br>स चेक्ष्वाकुसुतो धीमान् शकुनिर्भ्रातृजोऽर्चितः॥ ५९<br><br>ततो वाक्यं मुनिः प्राह इन्द्रद्युम्नमृतध्वजः।<br>राजन् नष्टाऽबलास्माकं नन्दयन्तीति विश्रुता॥ ६०<br><br>तस्यार्थे चैव वसुधा अस्माभिरटिता नृप।<br>तस्मादुत्तिष्ठ मार्गस्व साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ६१<br><br>अथोवाच नृपो ब्रह्मन् ममापि ललनोत्तमा।<br>नष्टा कृतश्रमस्यापि कस्याहं कथयामि ताम्॥ ६२<br><br>आकाशात् पर्वताकारः पतनामो नगोत्तमः।<br>सिद्धानां वाक्यमाकर्ण्य बाणैश्छिन्नः सहस्रधा॥ ६३<br><br>न चैव सा वरारोहा विभिन्ना लाघवान्मया।<br>न च जानामि सा कुत्र तस्माद् गच्छामि मार्गितुम्॥ ६४<br><br>इत्येवमुक्त्वा स नृपः समुत्थाय त्वरान्वितः।<br>स्यन्दनानि द्विजाभ्यां स भ्रातृपुत्राय चार्पयत्॥ ६५<br><br>तेऽधिरुह्य रथांस्तूर्णं मार्गन्ते वसुधां क्रमात्।<br>बदर्याश्रममासाद्य ददृशुस्तपसां निधिम्॥ ६६<br><br>तपसा कर्शितं दीनं मलपङ्कजटाधरम्।<br>निःश्वासायासपरमं प्रथमे वयसि स्थितम्॥ ६७<br><br>तमुपेत्याब्रवीद् राजा इन्द्रद्युम्नो महाभुजः।<br>तपस्विन् यौवने घोरमास्थितोऽसि सुदुश्चरम्॥ ६८<br><br>तपः किमर्थं तच्छंस किमभिप्रेतमुच्यताम्।<br>सोऽब्रवीत् को भवान् ब्रूहि ममात्मानं सुहृत्तया॥ ६९<br><br>परिपृच्छसि शोकार्तं परिखिन्नं तपोऽन्वितम्।<br>स प्राह राजाऽस्मि विभो तपस्विञ्शाकले पुरे॥ ७०<br><br>मनोः पुत्रः प्रियो भ्राता इक्ष्वाकोः कथितं तव।<br>स चास्मै पूर्वचरितं सर्वं कथितवान् नृपः॥ ७१ | वहाँ मनुके पुत्र श्रीमान् राजा इन्द्रद्युम्न निवास कर रहे थे। वे इस समाचारको जानकर अर्घपात्र हाथमें लिये बाहर निकले। उन्होंने विधिपूर्वक सुन्दर रीतिसे जाबालि और ऋतध्वजकी पूजा की तथा उस इक्ष्वाकुनन्दन बुद्धिमान् भतीजे शकुनिकी भी अर्चना की। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने इन्द्रद्युम्नसे कहा—राजन्! हमलोगोंकी नन्दयन्ती नामसे प्रसिद्ध (अयानी) कन्या खो गयी है। राजन्! उसके लिये हमलोगों ने सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया है। इसलिये (कृपया) उठिये, पता लगाइये और हमारी सहायता कीजिये॥ ५८—६१॥<br><br>इसके बाद राजाने कहा—ब्रह्मन्! मेरी भी एक उत्तम लाडिली कन्या खो गयी है। उसे ढूँढ़नेमें मैं परिश्रम कर चुका हूँ। उसके विषयमें मैं किससे कहूँ। सिद्धोंका वचन सुनकर आकाशसे नीचे गिरनेवाले पर्वतके समान श्रेष्ठ वृक्षको मैंने बाणोंसे हजारों टुकड़ोंमें काट डाला। मेरे हस्तकौशलसे उस सुन्दरी कन्याको चोट नहीं लगी। मैं नहीं जानता हूँ कि वह कहाँ है? अतः उसे ढूँढ़नेके लिये मैं (भी) चल रहा हूँ। ऐसा कहनेके बाद वे राजा शीघ्रतासे उठे। उन्होंने उन दोनों ब्राह्मणों तथा अपने भतीजेके लिये रथ दे दिये॥ ६२—६५॥<br><br>वे रथोंपर चढ़कर शीघ्रतासे क्रमशः पृथ्वीपर खोज करने लगे। (इस क्रममें) उन लोगोंने बदरिकाश्रममें जाकर तपस्या करनेसे दुबले और धूल-मिट्टीसे भरे, जटा धारण किये हुए, जोर-जोरसे साँस ले रहे एक तपोमूर्ति युवकको देखा। महाबाहु राजा इन्द्रद्युम्नने उसके पास जाकर कहा—तपस्विन्! यह बतलाओ कि युवा-अवस्थामें ही तुम अत्यन्त दुष्कर कठोर तप क्यों कर रहे हो? यह भी बतलाओ कि तुम्हारी अभिलाषा क्या है? उसने कहा—आप मुझसे यह बतलायें कि चिन्तासे ग्रस्त अत्यन्त दुःखी एवं तपश्चर्यासे युक्त मुझसे प्रेमपूर्वक पूछनेवाले आप कौन हैं? उसने कहा—तपस्विन्! विभो! मैं मनुका पुत्र एवं इक्ष्वाकुका प्रिय भाई शाकलपुरका राजा हूँ। मैंने अपना परिचय कह दिया। उस राजाने भी उनसे पहलेकी सारी कथा कह सुनायी॥ ६६—७१॥ |
३१० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रुत्वा प्रोवाच राजर्षिर्मा मुञ्चस्व कलेवरम्।<br>आगच्छ यामि तन्वङ्गीं विचेतुं भ्रातृजोऽसि मे॥ ७२<br>इत्युक्त्वा सम्परिष्वज्य नृपं धमनिसंततम्।<br>समारोप्य रथं तूर्णं तापसाभ्यां न्यवेदयत्॥ ७३<br>ऋतध्वजः सपुत्रस्तु तं दृष्ट्वा पृथिवीपतिम्।<br>प्रोवाच राजन्नेह्येहि करिष्यामि तव प्रियम्॥ ७४<br>यासौ चित्राङ्गदा नाम त्वया दृष्टा हि नैमिषे।<br>सप्तगोदावरं तीर्थं सा मयैव विसर्जिता॥ ७५ | (ऊपर कही बातोंको) सुनकर राजर्षिने कहा— तुम अपने शरीरका त्याग मत करो। तुम मेरे भतीजे हो। आओ, मैं उस सुन्दरीकी खोज करने जा रहा हूँ। इतना कहकर उन्होंने उभरी शिराओंसे भरे हुए राजाको गले लगाया और उन्हें रथपर चढ़ाकर शीघ्र उन दोनों तपस्वियोंके पास पहुँचा दिया। पुत्रके सहित ऋतध्वजने उन राजाको देखकर कहा—राजन्! आइये! आइये! मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा। आपने नैमिषारण्यमें जिस चित्राङ्गदाको देखा था, उसे मैंने ही सप्तगोदावर नामके तीर्थमें छोड़ दिया था॥ ७२–७५॥ |
| तदागच्छथ गच्छामः सौदेवस्यैव कारणात्।<br>तत्रास्माकं समेष्यन्ति कन्यास्तिस्रस्तथापराः॥ ७६<br>इत्येवमुक्त्वा स ऋषिः समाश्वास्य सुदेवजम्।<br>शकुनिं पुरतः कृत्वा सेन्द्रद्युम्नः सपुत्रकः॥ ७७<br>स्यन्दनेनाश्वयुक्तेन गन्तुं समुपचक्रमे।<br>सप्तगोदावरं तीर्थं यत्र ताः कन्यका गताः॥ ७८<br>एतस्मिन्नन्तरे तन्वी घृताची शोकसंयुता।<br>विचचारोदयगिरिं विचिन्वन्ती सुतां निजाम्॥ ७९ | तो आइये, हमलोग सुदेवके पुत्रके कार्यसे ही वहाँ चलें। वहाँपर हमलोगोंको अन्य तीन कन्याएँ भी मिलेंगी। इस प्रकार कहकर उन्होंने ऋषि सुदेवके पुत्रको सान्त्वना दे करके एवं शकुनिको आगे कर इन्द्रद्युम्न और पुत्रके साथ घोड़े जुते रथसे सप्तगोदावर तीर्थमें जानेकी योजना बनायी—जहाँ वे कन्याएँ गयी थीं। इस बीच दुर्बलाङ्गी घृताची शोकसे चिन्तित होकर अपनी कन्याको ढूँढ़ती हुई उदयगिरिपर विचरण करने लगी॥ ७६–७९॥ |
| तमाससाद च कपिं पर्यपृच्छत् तथाप्सराः।<br>किं बाला न त्वया दृष्टा कपे सत्यं वदस्व माम्॥ ८०<br>तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा स कपिः प्राह बालिकाम्।<br>दृष्टा देववती नाम्ना मया न्यस्ता महाश्रमे॥ ८१<br>कालिन्द्या विमले तीर्थे मृगपक्षिसमन्विते।<br>श्रीकण्ठायतनस्याग्रे मया सत्यं तवोदितम्॥ ८२<br>सा प्राह वानरपते नाम्ना वेदवतीति सा।<br>न हि देववती ख्याता तदागच्छ व्रजावहे॥ ८३ | वहाँ घृताची अप्सराको वह बन्दर मिल गया। घृताची अप्सराने उससे पूछा—कपे! मुझसे सच कहो कि क्या तुमने लड़कीको नहीं देखा है? उसके वचनको सुनकर उस कपिने कहा—मैंने देववती नामकी बालिकाको देखा है और उसे मृगों तथा पक्षियोंसे भरे कालिन्दीके विमलतीर्थमें श्रीकण्ठके मन्दिरके सामने स्थित महाश्रममें रख दिया है। मैंने तुमसे यह सत्य बात कही है। उस (घृताची)-ने कहा—कपिराज! वह वेदवती नामसे विख्यात है, वह देववती नहीं है। तो आओ; हम दोनों वहाँ चलें॥ ८०–८३॥ |
| घृताच्यास्तद्वचः श्रुत्वा वानरस्त्वरितक्रमः।<br>पृष्ठतोऽस्याः समागच्छन्नदीमन्वेव कौशिकीम्॥ ८४<br>ते चापि कौशिकीं प्राप्ता राजर्षिप्रवरास्त्रयः।<br>द्वितयं तापसाभ्यां च रथैः परमवेगिभिः॥ ८५<br>अवतीर्य रथेभ्यस्ते स्नातुमभ्यागमन् नदीम्।<br>घृताच्यपि नदीं स्नातुं सुपुण्यामाजगाम ह॥ ८६<br>तामन्वेव कपिः प्रायाद् दृष्टो जाबालिना तथा।<br>दृष्ट्वैव पितरं प्राह पार्थिवं च महाबलम्॥ ८७ | घृताचीकी उस बातको सुनकर बन्दर शीघ्रतासे पग बढ़ाता हुआ उसके पीछे-पीछे कौशिकी नदीकी ओर चला। वे तीनों श्रेष्ठ राजर्षि भी दोनों तपस्वियों (जाबालि और ऋतध्वज)-के साथ बहुत तेज चलनेवाले रथोंपर चढ़कर कौशिकी नदीके समीप पहुँचे। वे लोग रथसे उतरकर स्नान करनेके लिये नदीके निकट आये। घृताची भी उस परम पवित्र नदीमें स्नान करने आयी। बन्दर भी उनके पीछे ही आ गया। जाबालिने उसे देखा। देखते ही उन्होंने पिता एवं महाबलशाली राजासे कहा— ॥ ८४–८७॥ |
अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त ३११
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| स एव पुनरायाति वानरस्तात वेगवान्।<br>पूर्वं जटास्वेव बलाद्येन बद्धोऽस्मि पादपे॥ ८८<br>तज्जाबालिवचः श्रुत्वा शकुनिः क्रोधसंयुतः।<br>सशरं धनुरदाय इदं वचनमब्रवीत्॥ ८९<br>ब्रह्मन् प्रदीयतां मह्यमाज्ञां तात वदस्व माम्।<br>यावदेनं निहन्म्यद्य शरेणैकेन वानरम्॥ ९०<br>इत्येवमुक्ते वचने सर्वभूतहिते रतः।<br>महर्षिः शकुनिं प्राह हेतुयुक्तं वचो महत्॥ ९१ | तात! यह वही बन्दर फिर तेजीसे (यहाँ) आ रहा है, जिसने पहले मुझे जबरदस्ती जटाजालसे बड़के पेड़में बाँध दिया था। जाबालिके उस वचनको सुनकर अत्यन्त कुपित हुए शकुनिने बाणसहित धनुषको लेकर यह वचन कहा—ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; तात! मुझसे कहिये; क्या मैं एक बाणसे ही इस बन्दरको मार डालूँ? ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंकी भलाईमें लगे रहनेवाले महर्षिने शकुनिसे अत्यन्त युक्तियुक्त वचन कहा— ॥ ८८-९१ ॥ |
| न कश्चित्तात केनापि बध्यते हन्यतेऽपि वा।<br>वधबन्धौ पूर्वकर्मवश्यौ नृपतिनन्दन॥ ९२<br>इत्येवमुक्त्वा शकुनिंमृषिर्वानरमब्रवीत्।<br>एह्येहि वानरास्माकं साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ९३<br>इत्येवमुक्तो मुनिना बाले स कपिकुञ्जरः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत्॥ ९४<br>ममाज्ञा दीयतां ब्रह्मन् शाधि किं करवाण्यहम्॥ ९४<br>इत्युक्ते प्राह स मुनिस्तं वानरपतिं वचः।<br>मम पुत्रस्त्वयोद्बद्धो जटासु वटपादपे॥ ९५ | तात! (वस्तुतः) न तो किसीको कोई बाँधता है और न मारता ही है। नृपतिनन्दन! वध और बन्धन पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंके फलाधीन होते हैं। शकुनिसे इस प्रकार कहकर मुनिने बन्दरसे कहा—बन्दर! आओ, आओ! तुम्हें हमलोगोंकी सहायता करनी चाहिये। बाले! मुनिके ऐसा कहनेपर उस श्रेष्ठ कपिने करबद्ध प्रणाम करते हुए यह कहा—ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; मुझे निर्देश दीजिये कि मैं क्या करूँ? उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस कपिपतिसे यह वचन कहा—तुमने मेरे पुत्रको बड़के पेड़में जटाओंसे बाँध रखा था॥ ९२-९५॥ |
| न चोन्मोचयितुं वृक्षाच्छक्नुयामोऽपि यत्नतः।<br>तदनेन नरेन्द्रेण त्रिधा कृत्वा तु शाखिनः॥ ९६<br>शाखां वहति मत्सूनुः शिरसा तां विमोचय।<br>दशवर्षशतान्यस्य शाखां वै वहतोऽगमन्॥ ९७<br>न च सोऽस्ति पुमान् कश्चिद् यो ह्युन्मोचयितुं क्षमः।<br>स ऋषेर्वाक्यमाकर्ण्य कपिर्जाबालिनो जटाः॥ ९८<br>शनैरुन्मोचयामास क्षणादुन्मोचिताश्च ताः।<br>ततः प्रीतो मुनिश्रेष्ठो वरदोऽभूदृत्तध्वजः॥ ९९ | विशेष यत्न करनेपर भी हमलोग उस पेड़से इसको उन्मुक्त (अलग) नहीं कर सके। इसलिये इस राजाने उस वृक्षके तीन टुकड़े कर दिये। मेरा पुत्र आजतक सिरपर उसकी डालीको ढो रहा है। अब तुम उसे उन्मुक्त कर दो। इस डालीको ढोते हुए उसको एक हजार वर्ष बीत गये हैं। ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो इसे छुड़ानेमें समर्थ हो। उस बन्दरने ऋषिकी बात सुनकर जाबालिकी जटाओंको धीरे-धीरे खोल दिया। वे जटाएँ क्षणभरमें ही खुल गयीं। उसके बाद प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वज वर देनेके लिये तैयार हो गये॥ ९६-९९॥ |
| कपिं प्राह वृणीष्व त्वं वरं यन्मनसेप्सितम्।<br>ऋतध्वजवचः श्रुत्वा इमं वरमयाचत॥ १००<br>विश्वकर्मा महातेजाः कपित्वे प्रतिसंस्थितः।<br>ब्रह्मन् भगवान् वरं मह्यं यदि दातुमिहेच्छति॥ १०१<br>तत्स्वदत्तो महाघोरो मम शापो निवर्त्यताम्।<br>चित्राङ्गदायाः पितरं मां त्वष्टारं तपोधन॥ १०२ | (फिर) उन्होंने बन्दरसे कहा—तुम अपना मनोऽभिलषित वर माँगो। ऋतध्वजकी बात सुनकर कपि-योनिमें स्थित महातेजस्वी विश्वकर्माने यह वर माँगा—ब्रह्मन्! यदि आप मुझे वर देनेके लिये इच्छा कर रहे हैं तो मुझे दिये गये अपने महाघोर शापका निवारण कर दें। तपोधन! चित्राङ्गदाके पिता मुझ त्वष्टाको आप पहचान लें। |
| ३१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
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| अभिजानीहि भवतः शापाद्वानरतां गतम्।<br>सुबहूनि च पापानि मया यानि कृतानि हि॥ १०३<br>कपिचापल्यदोषेण तानि मे यान्तु संक्षयम्।<br>ततो ऋतध्वजः प्राह शापस्यान्तो भविष्यन्ति॥ १०४<br>यदा घृताच्यां तनयं जनिष्यसि महाबलम्।<br>इत्येवमुक्तः संहृष्टः स तदा कपिकुञ्जरः॥ १०५ | आपके शापसे (ही) मैं बन्दर हो गया हूँ। कपिकी (स्वाभाविक) चञ्चलतारूपी दोषसे मैंने जिन बहुत-से पापोंको किया है, वे सभी नष्ट हो जायँ। उसके बाद ऋतध्वजने कहा—जब तुम घृताचीसे महाबलवान् पुत्र उत्पन्न करोगे तब शापका अन्त होगा। तब ऐसा कहनेपर वह कपिश्रेष्ठ अत्यन्त हर्षित हो गया॥ १००—१०५॥ |
| स्नातुं तूर्णं महानद्यामवतीर्णः कृशोदरि।<br>ततस्तु सर्वे क्रमशः स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः॥ १०६<br>जग्मुर्हृष्टा रथेभ्यस्ते घृताची दिवमुत्पतत्।<br>तमन्वेव महावेगः स कपिः प्लवतां वरः॥ १०७<br>ददृशे रूपसम्पन्नां घृताचीं स प्लवङ्गमः।<br>सापि तं बलिनां श्रेष्ठं दृष्ट्वैव कपिकुञ्जरम्॥ १०८<br>ज्ञात्वाऽथ विश्वकर्माणं कामयामास कामिनी।<br>ततोऽनुपर्वतश्रेष्ठे ख्याते कोलाहले कपिः॥ १०९<br>रमयामास तां तन्वीं सा च तं वानरोत्तमम्।<br>एवं रमन्तौ सुचिरं सम्प्राप्तौ विन्ध्यपर्वतम्॥ ११० | कृशोदरि! वह शीघ्र ही महानदीमें स्नान करनेके लिये उतरा। उसके बाद वे सब क्रमशः स्नानकर पितरों और देवोंके तर्पण-अर्चन कर रथसे चले गये एवं घृताची स्वर्गमें उड़ गयी। महावेगशाली श्रेष्ठ कपिने भी उसका अनुसरण किया। उस बन्दरने रूपसे सम्पन्न घृताचीको देखा। उस कामिनी (घृताची)-ने भी बलवानोंमें श्रेष्ठ उत्तम कपिको देखकर एवं उसे विश्वकर्मा जानकर उसकी कामना की। उसके बाद कोलाहल नामसे विख्यात श्रेष्ठ पर्वतपर उस बन्दरने घृताचीके साथ एवं घृताचीने उस श्रेष्ठ बन्दरके साथ आनन्द-क्रीड़ा की। इस प्रकार बहुत दिनोंतक क्रीड़ा करते हुए वे दोनों विन्ध्यपर्वतपर पहुँचे॥ १०६—११०॥ |
| रथैः पञ्चापि तत्तीर्थं सम्प्राप्तास्ते नरोत्तमाः।<br>मध्याह्नसमये प्रीताः सप्तगोदावरं जलम्॥ १११<br>प्राप्य विश्रामहेत्वर्थमवतेरुस्त्वरान्विताः।<br>तेषां सारथयश्चाश्वान् स्नात्वा पीतोदकाप्लुतान्॥ ११२<br>रमणीये वनोद्देशे प्रचारार्थं समुत्सृजन्।<br>शाद्वलाढ्येषु देशेषु मुहूर्त्तादेव वाजिनः॥ ११३<br>तृप्ताः समाद्रवन् सर्वे देवायतनमुत्तमम्।<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषं श्रुत्वा ता योषितां वराः॥ ११४<br>किमेतदिति चोक्त्वैव प्रजग्मुहाटकेश्वरम्।<br>आरुह्य बलभीं तास्तु समुदैक्षन्त सर्वशः॥ ११५ | वे पाँचों श्रेष्ठ व्यक्ति भी उल्लसित होकर रथद्वारा दोपहरके समय सप्तगोदावर जलवाले उस तीर्थमें पहुँचे। वहाँ जाकर वे विश्राम करनेके लिये शीघ्रतासे नीचे उतरे। उनके सारथियोंने भी स्नान किया एवं घोड़ोंको जल पिलाकर तथा नहला-धुलाकर (उन्हें) सुन्दर वन-प्रदेशमें विचरण करनेके लिये छोड़ दिया। मुहूर्तभरमें ही हरियालीसे हरे-भरे स्थानमें वे घोड़े तृप्त हो गये। उसके बाद वे सभी (घोड़े) उत्तम देव-मन्दिरके पास दौड़ने लगे। घोड़ोंके तापका शब्द सुनकर श्रेष्ठ स्त्रियाँ 'यह क्या है' ऐसा कहकर हाटकेश्वर (-के मन्दिरमें) गयीं एवं छतपर चढ़कर सभी ओर देखने लगीं॥ १११—११५॥ |
| अपश्यंस्तीर्थसलिले स्नायमानान् नरोत्तमान्।<br>ततश्चित्राङ्गदा दृष्ट्वा जटामण्डलधारिणम्।<br>सुरथं हसती प्राह संरोहत्पुलका सखीम्॥ ११६ | उन कन्याओंने तीर्थके जलमें स्नान करते हुए उन श्रेष्ठ पुरुषोंको देखा। फिर चित्राङ्गदाने जटा-मण्डल धारण करनेवाले नृपति सुरथको देखा। रोमाञ्चित होकर उसने हँसती हुई सखीसे कहा— |
| योऽसौ युवा नीलघनप्रकाशः<br>संदृश्यते दीर्घभुजः सुरूपः। | नीले मेघके समान वर्ण तथा लम्बी भुजाओंवाला वह जो सुन्दर युवा पुरुष |