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वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
६१- पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, सनत्कुमार-ब्रह्माका प्रसङ्ग, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु-वध
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| २७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५९ ] |
|---|
उनसठवाँ अध्याय
ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>योऽसौ मन्त्रयतां प्राप्तो दैत्यानां शरताडितः।<br>स केन वद निर्भिन्नः शरेण दितिजेश्वरः ॥ १ | नारदने पूछा — आप हमें यह बतलायें कि सलाह करते हुए दैत्योंमेंसे जो वह दैत्य बाणद्वारा बिंध गया था उसे किसने बाणसे विदीर्ण कर दिया था॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>आसीन्नृपो रघुकुले रिपुजिन्महर्षे<br>तस्यात्मजो गुणगणैकनिधिर्महात्मा।<br>शूरोऽरिसैन्यदमनो बलवान् सुहृत्सु<br>विप्रान्धदीनकृपणेषु समानभावः ॥ २<br>ऋतध्वजो नाम महान् महीयान्<br>स गालवार्थे तुरगाधिरूढः।<br>पातालकेतुं निजघान पृष्ठे<br>बाणेन चन्द्रार्धनिभेन वेगात् ॥ ३ | पुलस्त्यजी बोले — महर्षे! रघुकुलमें रिपुजित् नामके एक राजा थे। उनके ऋतध्वज नामका एक पुत्र था। वह सभी गुणोंकी निधि, महात्मा, वीर, शत्रुके सेनाओंका नाश करनेवाला, बली, मित्रों, ब्राह्मणों, अन्धों, गरीबों एवं दयापात्र दीनोंमें समान भाव रखनेवाला था। उसने गालवके लिये घोड़ेपर सवार होकर पातालकेतुकी पीठमें अर्धचन्द्रके सदृश बाणसे बड़ी तेजीसे मारा था॥ २-३॥ |
| नारद उवाच<br>किमर्थं गालवस्यासौ साधयामास सत्तमः।<br>येनासौ पत्रिणा दैत्यं निजघान नृपात्मजः ॥ ४ | नारदने कहा (पूछा) — उस श्रेष्ठ राजपुत्रने जिस कारण बाणसे उस दैत्यको मारा, उससे गालवका कौन-सा कार्य सिद्ध किया?॥ ४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>पुरा तपस्तप्यति गालवर्षि-<br>र्महाश्रमे स्वे सततं निविष्टः।<br>पातालकेतुस्तपसोऽस्य विघ्नं<br>करोति मौढ्यात् स समाधिभङ्गम्॥ ५<br>न चेष्यतेऽसौ तपसो व्ययं हि<br>शक्तोऽपि कर्तुं त्वथ भस्मसात् तम्।<br>आकाशमीक्ष्याथ स दीर्घमुष्णं<br>मुमोच निःश्वासमनुत्तमं हि ॥ ६<br>ततोऽम्बराद् वाजिवरः पपात<br>बभूव वाणी त्वशरीरिणी च।<br>असौ तुरङ्गो बलवान् क्रमेत<br>अह्ना सहस्राणि तु योजनानाम्॥ ७<br>स तं प्रगृह्याश्ववरं नरेन्द्रं<br>ऋतध्वजं योज्य तदात्तशस्त्रम्।<br>स्थितस्तपस्येव ततो महर्षि-<br>र्दैत्यं समेत्य विशिखैर्नृपजो बिभेद ॥ ८ | पुलस्त्यजी बोले — पहले समयकी बात है कि गालव अपने आश्रममें तपस्यामें सदा लीन रहा करते थे। दैत्य पातालकेतु मूर्खताके कारण उनकी तपस्यामें बाधा डाला करता और उनकी समाधि (ध्यान)-को भंग किया करता था। वे उसको जलाकर राख कर देनेमें समर्थ होते हुए भी अपनी तपस्या क्षीण नहीं करना चाहते थे; (क्योंकि तपोबलसे दूसरोंका अनिष्ट करनेपर तपस्या क्षीण हो जाती है।) उन्होंने ऊपरकी ओर देखकर लंबा, गर्म निःश्वास छोड़ा। वह सर्वथा अनुपम था। उसके बाद आकाशसे एक सुन्दर घोड़ा गिरा और अशरीरिणी वाणी—आकाशवाणी हुई कि यह बलवान् अश्व एक दिनमें हजारों योजन जा सकता है। शस्त्रसे सजे हुए उस राजा ऋतध्वजको वह घोड़ा सौंपकर वे महर्षि (पुनः) तपस्या करने लगे। उसके बाद राजपुत्रने दैत्यके पास जाकर उसे बाणसे घायल कर दिया॥ ५-८॥ |
| नारद उवाच<br>केनाम्बरतलाद् वाजी निसृष्टो वद सुव्रत।<br>वाक् कस्याऽदेहिनी जाता परं कौतूहलं मम ॥ ९ | नारदने कहा (पुनः पूछा) — सुव्रत! आप यह बतलायें कि किसने आकाशसे इस अश्वको गिराया था एवं आकाशवाणी किसकी थी? (इस विषयमें) मुझे बड़ी उत्सुकता है॥ ९॥ |
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अध्याय ५९] ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना २७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसुर्नाम महेन्द्रगायनो<br>गन्धर्वराजो बलवान् यशस्वी।<br>निसृष्टवान् भूवलये तुरङ्गं<br>ऋतध्वजस्यैव सुतार्थमाशु॥ १० | पुलस्त्यजी बोले— महेन्द्रका गुणगान करनेवाले बलशाली विश्वावसु नामके यशस्वी गन्धर्वराजने अपनी पुत्रीके लिये ऋतध्वजके हेतु उस समय अश्वको पृथ्वीपर गिराया था॥ १०॥ |
| नारद उवाच<br>कोऽर्थो गन्धर्वराजस्य येनाप्रैषीन्महाजवम्।<br>राज्ञः कुवलयाश्वस्य कोऽर्थो नृपसुतस्य च॥ ११ | नारदने कहा (फिर पूछा)— महान् वेगशाली इस अश्वको भेजनेमें गन्धर्वराजका क्या उद्देश्य था तथा राजपुत्र राजा कुवलयाश्वका इसमें क्या लाभ था? (कृपया इसे भी बतलाइये।)॥ ११॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसोः शीलगुणोपपन्ना<br>आसीत्पुरंध्रीषु वरा त्रिलोके।<br>लावण्यराशिः शशिकान्तितुल्या<br>मदालसा नाम मदालसैव॥ १२<br>तां नन्दने देवरिपुस्तरस्वी<br>संक्रीडतीं रूपवतीं ददर्श।<br>पातालकेतुस्तु जहार तन्वीं<br>तस्यार्थतः सोऽश्ववरः प्रदत्तः॥ १३<br>हत्वा च दैत्यं नृपतेस्तनूजो<br>लब्ध्वा वरोरूमपि संस्थितोऽभूत्।<br>दृष्टो यथा देवपतिर्महेन्द्रः<br>शच्या तथा राजसुतो मृगाक्ष्या॥ १४ | पुलस्त्यजी बोले— विश्वावसुकी मदसे अलसायी-सी मदालसा नामकी एक (भोलीभाली) कन्या थी। वह शील और गुणसे सम्पन्न, त्रिलोककी स्त्रियोंमें उत्तम, सुन्दरताकी खानि और चन्द्रमाकी कान्तिके समान (कोमलकिशोरी) थी। नन्दनवनमें क्रीडा कर रही उस सौन्दर्यशालिनीको देवताओंके शत्रु पातालकेतुने देखा और तुरन्त उसे उठा ले गया। उसीके कारण वह श्रेष्ठ घोड़ा दिया गया था। दैत्यको मारनेके बाद श्रेष्ठ ऊरुवाली स्त्रीको पाकर राजपुत्र निश्चिन्त हो गये। राजपुत्र (उस) मृगनयनीके साथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे शचीके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥ १२—१४॥ |
| नारद उवाच<br>एवं निरस्ते महिषे तारके च महासुरे।<br>हिरण्याक्षसुतो धीमान् किमचेष्टत वै पुनः॥ १५ | नारदने पुनः पूछा— इस प्रकार महान् असुर तारक और महिषके निरस्त—समाप्त हो जानेपर हिरण्याक्षके बुद्धिमान् पुत्र (अन्धक)-ने पुनः क्या किया?॥ १५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>तारकं निहतं दृष्ट्वा महिषं च रणेऽन्धकः।<br>क्रोधं चक्रे सुदुर्बुद्धिर्देवानां देवसैन्यहा॥ १६<br>ततः स्वल्पपरिवारः प्रगृह्य परिघं करे।<br>निर्जगामाथ पातालाद् विचचार च मेदिनीम्॥ १७<br>ततो विचरता तेन मन्दरे चारुकन्दरे।<br>दृष्टा गौरी च गिरिजा सखीमध्ये स्थिता शुभा॥ १८<br>ततोऽभूत् कामबाणार्त्तः सहसैवान्धकोऽसुरः।<br>तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं गिरिराजसुतां वने॥ १९ | पुलस्त्यजी बोले— तारक और महिष दोनोंको संग्राममें मारे गये देखकर देवसेनाके समूहोंका नाश करनेवाला, महामूर्ख अन्धक देवताओंपर कुपित हो गया। उसके बाद थोड़ी-सी सेनाके साथ वह हाथमें परिघ लेकर पातालसे बाहर निकल आया और पृथ्वीपर विचरण करने लगा। उसके बाद घूमते हुए ही उसने सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दर गिरिपर सखियोंके बीचमें गिरिनन्दिनी कल्याणी गौरीको देखा। उस सर्वाङ्गसुन्दरी गिरिराजनन्दिनीको वनमें देखकर अन्धकासुर एकाएक काम-बाणसे पीड़ित हो गया॥ १६—१९॥ |
| अथोवाचासुरो मूढो वचनं मन्मथान्धकः।<br>कस्येयं चारुसर्वाङ्गी वने चरति सुन्दरी॥ २०<br>इयं यदि भवेन्नैव ममान्तःपुरवासिनी।<br>तन्मदीयेन जीवेन क्रियते निष्फलेन किम्॥ २१ | तब कामसे अंधे हुए उस मूर्ख असुर अन्धकने कहा—वनमें भ्रमण कर रही यह सर्वाङ्गसुन्दरी ललना किसकी है? यदि यह मेरे अन्तःपुरमें निवास करनेवाली न हुई तो मेरे इस व्यर्थके जीवनसे क्या लाभ? यदि |
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| २७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदस्यास्तनुमध्याया न परिष्वङ्गवानहम्।<br>अतो धिङ् मां रूपेण किं स्थिरेण प्रयोजनम्॥ २२<br><br>स मे बन्धुः स सचिवः स भ्राता साम्परायिकः।<br>यो मामसितकेशां तां योजयेन्मृगलोचनाम्॥ २३ | इस कृशोदरी सुन्दरी ललनाका आलिङ्गन मुझे प्राप्त न हुआ तो मुझे धिक्कार है! मेरी इस स्थायी सुन्दरतासे क्या लाभ? मेरा वही बन्धु, वही सचिव, वही भ्राता तथा वही संकटकालका साथी है जो इस काले केशवाली मृगनयनी सुन्दरीको मुझसे मिला दे॥ २०—२३॥ |
| इत्थं वदति दैत्येन्द्रे प्रह्लादो बुद्धिसागरः।<br>पिधाय कर्णौ हस्ताभ्यां शिरःकम्पं वचोऽब्रवीत्॥ २४<br><br>मा मैवं वद दैत्येन्द्र जगतो जननी त्वियम्।<br>लोकनाथस्य भार्येयं शङ्करस्य त्रिशूलिनः॥ २५<br><br>मा कुरुष्व सुदुर्बुद्धिं सद्यः कुलविनाशिनीम्।<br>भवतः परदारेयं मा निमज्ज रसातले॥ २६<br><br>सत्सु कुत्सितमेवं हि असत्स्वपि हि कुत्सितम्।<br>शत्रवस्ते प्रकुर्वन्तु परदारावगाहनम्॥ २७ | दैत्यराजके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धिमान् प्रह्लाद दोनों हाथोंसे दोनों कानोंको ढँककर सिर हिलाते हुए बोले—दैत्येन्द्र! इस प्रकार मत कहो। ये तो संसारकी जननी और लोकस्वामी, त्रिशूलधारी शङ्करकी पत्नी हैं। तुम कुलका सद्यः विनाश करनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि मत करो। तुम्हारे लिये ये परस्त्री हैं। अतः रसातलमें मत गिरो; क्योंकि (ऐसा दुष्कर्म) सज्जनोंमें तो अत्यन्त निन्दित है ही, असत् पुरुषोंमें भी निन्दित है। ऐसा दुष्कर्म—परदारा-अभिगमन तुम्हारे शत्रु करें (जिससे उनका विनाश हो जाय)॥ २४—२७॥ |
| किंचित् त्वया न श्रुतं दैत्यनाथ<br>गीतं श्लोकं गाधिना पार्थिवेन।<br>दृष्ट्वा सैन्यं विप्रधेनुप्रसक्तं<br>तथ्यं पथ्यं सर्वलोके हितं च॥ २८<br><br>वरं प्राणास्त्याज्या न च पिशुनवादेष्वभिरति-<br>र्वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतम्।<br>वरं क्लीबैर्भाव्यं न च परकलत्राभिगमनं<br>वरं भिक्षार्थित्वं न च परधनास्वादमसकृत्॥ २९ | दैत्येश! ब्राह्मणकी गौपर प्रसक्त सेनाको देखकर गाधिराजने समस्त जगत्के लिये कल्याणकारी, सत्य एवं उचित जो श्लोक कहा है क्या उसे आपने नहीं सुना है? (उन्होंने कहा है—) प्राणोंका छोड़ देना अच्छा है, परंतु चुगलखोरोंकी बातमें दिलचस्पी लेना उचित नहीं। मौन रहना अच्छा है, किंतु असत्य बोलना ठीक नहीं। नपुंसक होकर रहना ठीक है, परंतु परस्त्रीगमन उचित नहीं। भीख माँगना अच्छा है, किंतु बार-बार दूसरेके धनका उपभोग करना उचित नहीं। |
| स प्रह्लादवचः श्रुत्वा क्रोधान्धो मदनार्दितः।<br>इयं सा शत्रुजननीत्येवमुक्त्वा प्रदुद्रुवे॥ ३०<br><br>ततोऽन्वधावन् दैतेया यन्त्रमुक्ता इवोपलाः।<br>तान् रुरोध बलान्नन्दी वज्रोद्यतकरोऽव्ययः॥ ३१ | प्रह्लादका वचन सुननेके बाद काम-पीड़ित अन्धक क्रोधसे अंधा होकर 'यह वही शत्रु की जननी है'—यह कहते हुए दौड़ पड़ा। उसके बाद दूसरे और दानव भी यन्त्रसे छूटे हुए पत्थरकी गोलीके समान उसके पीछे दौड़ चले। परंतु अव्यय नन्दीने हाथमें वज्र उठाकर बलपूर्वक उन सबको रोक दिया॥ २८—३१॥ |
| मयतारपुरोगास्ते वारिता द्रावितास्तथा।<br>कुलिशेनाहतास्तूर्णं जग्मुर्भीता दिशो दश॥ ३२<br><br>तानर्दितान् रणे दृष्ट्वा नन्दिनाऽन्धकदानवः।<br>परिघेण समाहत्य पातयामास नन्दिनम्॥ ३३<br><br>शैलादिं पतितं दृष्ट्वा धावमानं तथान्धकम्।<br>शतरूपाऽभवद् गौरी भयात् तस्य दुरात्मनः॥ ३४ | वज्रकी मारसे रोक दिये गये और भगाये जाते हुए वे मय एवं तारक आदि सभी दैत्य डरकर दसों दिशाओंमें भाग गये। संग्राममें अन्धकासुरने उन सभीको नन्दीद्वारा पीड़ित देखकर नन्दीको परिघसे मारकर गिरा दिया। नन्दीको गिरा हुआ और अन्धकको दौड़कर आते हुए देखकर गौरी उस दुष्टात्माके भयसे सैकड़ों रूपवाली |
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अध्याय ५९ ] \hfill ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना \hfill २७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः स देवीगणमध्यसंस्थितः<br>परिभ्रमन् भाति महाऽसुरेन्द्रः।<br>यथा वने मत्तकरी परिभ्रमन्<br>करेणुमध्ये मदलोलदृष्टिः॥ ३५ | हो गयीं। उसके बाद देवियोंके बीच घूमता हुआ (वह) दैत्य ऐसा लग रहा था जैसे कि वनमें हथिनियोंके बीच घूमता हुआ मदसे चञ्चल दृष्टिवाला मतवाला हाथी सुशोभित होता है॥ ३२—३५॥ |
| न परिज्ञातवांस्तत्र का तु सा गिरिकन्यका।<br>नात्राश्चर्यं न पश्यन्ति चत्वारोऽमी सदैव हि॥ ३६<br><br>न पश्यतीह जात्यन्धो रागान्धोऽपि न पश्यति।<br>न पश्यति मदोन्मत्तो लोभाक्रान्तो न पश्यति।<br>सोऽपश्यमानो गिरिजां पश्यन्नपि तदान्धकः॥ ३७<br><br>प्रहारं नाददत् तासां युवत्य इति चिन्तयन्।<br>ततो देव्या स दुष्टात्मा शतावर्या निराकृतः॥ ३८<br><br>कुट्टितः प्रवरैः शस्त्रैर्निपपात महीतले।<br>वीक्ष्यान्धकं निपतितं शतरूपा विभावरी॥ ३९<br><br>तस्मात् स्थानादपाक्रम्य गताऽन्तर्धानमम्बिका।<br>पतितं चान्धकं दृष्ट्वा दैत्यदानवयूथपाः॥ ४०<br><br>कुर्वन्तः सुमहाशब्दं प्राद्रवन्त रणार्थिनः।<br>तेषामापततां शब्दं श्रुत्वा तस्थौ गणेश्वरः॥ ४१ | (पर) वह नहीं समझ रहा था कि उनमें वे गिरिनन्दिनी कौन हैं? इसमें (उसके न समझनेमें) कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि संसारमें ये चार प्रकारके व्यक्ति सदा ही (ठीक-ठीक) नहीं देख पाते। जन्मका अन्धा नहीं देखता, प्रेममें अन्धा हुआ नहीं देखता, मदोन्मत्त नहीं देखता एवं लोभसे पराभूत भी नहीं देखता है। अतः अन्धक उस समय देखते हुए भी गिरिजाको नहीं देख पा रहा था। उस दानवने उन सभीको युवती समझकर उनपर आघात नहीं किया, फिर तो शतावरीदेवीने (ही) उस दुष्टात्मापर आघात कर दिया। उत्कृष्ट कोटिके शस्त्रोंसे बिंधकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। अन्धकको गिरा हुआ देखकर शतरूपोंवाली विभावरी अम्बिका उस स्थानसे हटकर अन्तर्हित हो गयीं। अन्धकको गिरा हुआ देख दैत्यों एवं दानवोंके सेनापति युद्धके लिये ललकारते हुए दौड़ पड़े। आक्रमण करनेवाले उन (दैत्यों)-के शब्दको सुनकर गणेश्वर खड़े हो गये॥ ३६–४१॥ |
| आदाय वज्रं बलवान् मघवानिव कोपितः।<br>दानवान् समयान् वीरः पराजित्य गणेश्वरः॥ ४२<br><br>समभ्येत्याम्बिकां दृष्ट्वा ववन्दे चरणौ शुभौ।<br>देवी च ता निजा मूर्तीः प्राह गच्छध्वमिच्छया॥ ४३<br><br>विहरध्वं महीपृष्ठे पूज्यमाना नरैरिह।<br>वसतिर्भवतीनां च उद्यानेषु वनेषु च॥ ४४<br><br>वनस्पतिषु वृक्षेषु गच्छध्वं विगतज्वराः।<br>तास्त्वेवमुक्ताः शैलेय्या प्रणिपत्याम्बिकां क्रमात्॥ ४५<br><br>दिक्षु सर्वासु जग्मुस्ताः स्तूयमानाश्च किन्नरैः।<br>अन्धकोऽपि स्मृतिं लब्ध्वा अपश्यनद्रिनन्दिनीम्।<br>स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा ततः पातालमाद्रवत्॥ ४६<br><br>ततो दुरात्मा स तदान्धको मुने<br>पातालमभ्येत्य दिवा न भुङ्क्ते।<br>रात्रौ न शेते मदनेषुताडितो<br>गौरीं स्मरन्कामबलाभिपन्नः॥ ४७ | क्रुद्ध हुए गणेश्वर इन्द्रके समान वज्र लेकर मयसहित दानवोंको हराकर अम्बिकाके निकट गये और (उन्होंने) उनके शुभ चरणोंमें प्रणाम किया। देवीने भी अपनी उन मूर्तियोंसे कहा—तुम सभी इच्छानुरूप स्थानोंको जाओ और मनुष्योंकी आराधना प्राप्त करती हुई पृथ्वीपर भ्रमण करो। तुम सबका निवास उद्यानों, वनों, वनस्पतियों एवं वृक्षोंमें होगा। अब तुम सभी निश्चिन्त होकर जाओ। पार्वतीके इस प्रकार कहनेपर वे सभी देवियाँ अम्बिकाको प्रणामकर किन्नरोंसे स्तुत होती हुई (दसों) दिशाओंमें चली गयीं। अन्धक भी होशमें आनेके बाद गिरिजाको न देखकर तथा अपनी सेनाको हारी हुई समझकर पातालमें चला गया। मुने! उसके बाद कामबाणसे घायल एवं कामके वेगसे पीड़ित दुष्टात्मा अन्धक पातालमें जाकर गौरीका चिन्तन करता हुआ न दिनमें खाता था और न रातमें सोता था—वह बेचैन-सा हो गया था॥ ४२–४७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५९ ॥
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| २७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६० |
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साठवाँ अध्याय
पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसंग और सनत्कुमारका प्रसंग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>क्व गतः शङ्करो ह्यासीद् येनाम्बा नन्दिना सह।<br>अन्धकं योधयामास एतन्मे वक्तुमर्हसि॥ १ | नारदने कहा (पूछा)— आप मुझे यह बतलायें कि शङ्कर कहाँ चले गये थे, जिससे नन्दिसहित अम्बिकाने अन्धकसे (स्वयं) युद्ध किया॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>यदा वर्षसहस्रं तु महामोहे स्थितोऽभवत्।<br>तदाप्रभृति निस्तेजाः क्षीणवीर्यः प्रदृश्यते॥ २<br>स्वमात्मानं निरीक्ष्याथ निस्तेजोऽङ्गं महेश्वरः।<br>तपोऽर्थाय तथा चक्रे मतिं मतिमतां वरः॥ ३<br>स महाव्रतमुत्पाद्य समाश्वास्याम्बिकां विभुः।<br>शैलादिं स्थाप्य गोप्तारं विचचार महीतलम्॥ ४<br>महामुद्रार्पितग्रीवो महाहिकृतकुण्डलः।<br>धारयाणः कटीदेशे महाशङ्खस्य मेखलाम्॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— वे (शंकरजी) जिस समय एक हजार वर्षतक महामोहमें पड़ गये थे, उस समयसे वे तेजरहित एवं शक्तिहीन-से दिखायी दे रहे थे। मतिमानोंमें श्रेष्ठ महेश्वरने स्वयं अपने अङ्गोंको निस्तेज देखकर तप करनेके लिये निश्चय किया। उन व्यापक शङ्करने महाव्रतका निर्णय करनेके बाद अम्बिकाको धैर्य धारण कराया और वे शैल आदि (नन्दी)-को उनकी रक्षाके लिये नियुक्त कर पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उन्होंने गलेमें तन्त्रानुसार महामुद्रा पहन ली। महासर्पोंके कुण्डल एवं कमरमें महाशङ्खकी मेखला धारण कर ली॥ २–५॥ |
| कपालं दक्षिणे हस्ते सव्ये गृह्य कमण्डलुम्।<br>एकाहवासी वृक्षे हि शैलसानुनदीष्वटन्॥ ६<br>स्थानं त्रैलोक्यमास्थाय मूलाहारोऽम्बुभोजनः।<br>वाय्वाहारस्तदा तस्थौ नववर्षशतं क्रमात्॥ ७<br>ततो वीटां मुखे क्षिप्य निरुच्छ्वासोऽभवद् यतिः।<br>विस्तृते हिमवत्पृष्ठे रम्ये समशिलातले॥ ८<br>ततो वीटा विदार्यैव कपालं परमेष्ठिनः।<br>सार्चिष्मती जटामध्यान्निषण्णा धरणीतले॥ ९ | दाहिने हाथमें कपाल एवं बायें हाथमें कमण्डलु लेकर वे वृक्षोंके नीचे (कभी) पड़े रहते, कभी पहाड़ोंकी चोटियोंपर तथा नदियोंके तटपर चक्कर लगाते रहते। प्रथम (आरम्भमें) मूल-फल खाकर फिर जल पीकर, उसके बाद वायु पीकर (यम-नियमका) व्रत पालन करनेवाले उन्होंने क्रमशः तीनों लोकोंमें नौ सौ वर्ष व्यतीत किये। उसके बाद उन्होंने हिमालयके ऊपर रमणीय तथा समतल पर्वतीय चट्टानपर आसन लगा लिया और अपने मुखमें काष्ठकी बनी गुल्ली डालकर श्वास रोक लिया—कुम्भक प्राणायाम कर लिया। उसके बाद शंकरके कपालको फोड़कर ज्वालामयी वह गुल्ली (उनकी) जटाके बीचसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ६–९॥ |
| वीटया तु पतन्त्याऽद्रिर्दारितः क्ष्मासमोऽभवत्।<br>जातस्तीर्थवरः पुण्यः केदार इति विश्रुतः॥ १० | उस गुल्लीके गिरनेसे पर्वत टूट-फूटकर पृथ्वीके समान (समतल) हो गया और वहाँ केदार नामका प्रसिद्ध तीर्थ बन गया। |
| ततो हरो वरं प्रादात् केदाराय वृषध्वजः।<br>पुण्यवृद्धिकरं ब्रह्मन् पापघ्नं मोक्षसाधनम्॥ ११ | ब्रह्मन्! उसके बाद वृषध्वज महादेवने केदारको पुण्यकी वृद्धि करनेवाले एवं पापके विनाश करनेवाले और मोक्षके साधनका वर दिया तथा |
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| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २७७ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| ये जलं तावके तीर्थे पीत्वा संयमिनो नराः।<br>मधुमांसनिवृत्ता ये ब्रह्मचारिव्रते स्थिताः॥ १२<br><br>षण्मासाद् धारयिष्यन्ति निवृत्ताः परपाकतः।<br>तेषां हृत्पङ्कजेष्वेव मल्लिंगं भविता ध्रुवम्॥ १३ | यह भी वर दिया कि जो संयमी मनुष्य परान्न-भोजनको त्यागकर तथा ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर तुम्हारा जल पीते हुए यहाँ छः महीनेतक निवास करेंगे उनके हृदयकमलमें निश्चय ही मेरे लिङ्गकी सत्ता प्रत्यक्ष प्रकट होगी॥ १०—१३॥ |
| न चास्य पापाभिरतिर्भविष्यति कदाचन।<br>पितॄणामक्षयं श्राद्धं भविष्यति न संशयः॥ १४<br><br>स्नानदानतपांसीह होमजप्यादिकाः क्रियाः।<br>भविष्यन्त्यक्षया नृणां मृतानामपुनर्भवः॥ १५<br><br>एतद् वरं हरात् तीर्थं प्राप्य पुष्णाति देवताः।<br>पुनाति पुंसां केदारस्त्रिनेत्रवचनं यथा॥ १६<br><br>केदाराय वरं दत्त्वा जगाम त्वरितो हरः।<br>स्नातुं भानुसुतां देवीं कालिन्दीं पापनाशिनीम्॥ १७ | उन्हें कभी पापमें अभिरुचि नहीं होगी तथा उनसे किया गया पितरोंका श्राद्ध अक्षय होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है। मनुष्योंद्वारा यहाँ की गयी स्नान, दान, तपस्या, होम एवं जप आदिकी क्रियाएँ अक्षय होंगी तथा इस स्थानपर मनुष्योंके मरनेपर उनका पुनर्जन्म नहीं होगा। महादेवसे इस प्रकारका वर पाकर वह केदारतीर्थ त्रिनेत्र महादेवके वचनके अनुकूल प्राणिवर्गको पवित्र एवं देवताओंका पोषण करने लगा। केदारतीर्थको वर देकर महादेव पापविनाशिनी रवितनया देवी कालिन्दी (यमुना)-में स्नान करनेके लिये शीघ्र चले गये॥ १४—१७॥ |
| तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा जगामाथ सरस्वतीम्।<br>वृतां तीर्थशतैः पुण्यैः प्लक्षजां पापनाशिनीम्॥ १८<br><br>अवतीर्णस्ततः स्नातुं निमग्नश्च महाम्भसि।<br>द्रुपदां नाम गायत्रीं जजापान्तर्जले हरः॥ १९<br><br>निमग्ने शङ्करे देव्यां सरस्वत्यां कलिप्रिय।<br>साग्रः संवत्सरो जातो न चोन्मज्जत ईश्वरः॥ २०<br><br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् भुवनाः सप्त सार्णवाः।<br>चेलुः पेतुर्धरण्यां च नक्षत्रास्तारकैः सह॥ २१ | वहाँ स्नान करके पवित्र होकर भगवान् शंकर सैकड़ों पवित्र तीर्थोंसे घिरी (वृत) और प्लक्षवृक्षसे उत्पन्न पापनाशिनी सरस्वतीके निकट गये। उसके बाद वे स्नान करनेके लिये उसमें उतरे एवं अगाध जलमें भलीभाँति स्नान कर द्रुपदा गायत्रीका जप करने लगे। कलिप्रिय! देवी सरस्वतीके जलमें शङ्करको डुबकी लगाये हुए एक वर्षसे अधिक बीत गया; परंतु भगवान् ऊपर नहीं उठे। ब्रह्मन्! उस समय समुद्रोंसहित सातों भुवन काँपने लगे और ताराओंके साथ नक्षत्र (टूट-टूटकर) भूतलपर गिरने लगे॥ १८—२१॥ |
| आसनेभ्यः प्रचलिता देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>स्वस्त्यस्तु लोकेभ्य इति जपन्तः परमर्षयः॥ २२<br><br>ततः क्षुब्धेषु लोकेषु देवा ब्रह्माणमागमन्।<br>दृष्ट्वोचुः किमिदं लोकाः क्षुब्धाः संशयमागताः॥ २३<br><br>तानाह पद्मसंभूतो नैतद् वेद्मि च कारणम्।<br>तदागच्छत वो युक्तं द्रष्टुं चक्रगदाधरम्॥ २४<br><br>पितामहेनैवमुक्ता देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>पितामहं पुरस्कृत्य मुरारिसदनं गताः॥ २५ | इन्द्र प्रमुख हैं जिनमें, ऐसे देवता अपने-अपने आसनोंसे उचक पड़े और महर्षिगण 'संसारका कल्याण हो'—इस भावनासे जप करने लगे। तत्पश्चात् जगत्के अशान्त हो जानेपर देवगण ब्रह्माके निकट आये और उन्हें देखकर उन लोगोंने पूछा—ब्रह्मन्! संसार अशान्त होकर क्यों सन्देहके झोंके खा रहा है? कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा—मैं इसके कारणको नहीं जान पा रहा हूँ। तुमलोग जाओ, (इसके लिये) चक्र-गदाधारी विष्णुका दर्शन करना उचित है। पितामहके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि सभी देवता पितामहको आगे कर मुरारिलोक (विष्णुलोक)-में गये॥ २२—२५॥ |