वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६०- पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थ-की उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसङ्ग और सनत्कुमारका प्रसङ्ग
| २६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| तवान्तिकमनुप्राप्तः प्रसादं कर्तुमर्हसि।<br>तच्छ्रुत्वा चान्धको वाक्यं प्राह मेघस्वनं वचः॥ ४५ | आपके पास आ गया हूँ। आप मेरे ऊपर अनुग्रह कीजिये। यह बात सुनकर अन्धकने बादलकी गर्जनध्वनिमें यह वचन कहा—॥ ४१–४५॥ |
| न भेतव्यं त्वया तस्मात् सत्यं गोप्ताऽस्मि दानव।<br>महिषस्तारकश्चोभौ बाणश्च बलिनां वरः॥ ४६<br>अनाख्यायैव ते वीरास्त्वन्धकं महिषादयः।<br>स्वपरिग्रहसंयुक्ता भूमिं युद्धाय निर्ययुः॥ ४७<br>यत्र ते दारुणाकारा गणाश्चक्रुर्महास्वनम्।<br>तत्र दैत्याः समाजग्मुः सायुधाः सबला मुने॥ ४८<br>दैत्यानापततो दृष्ट्वा कार्तिकेयगणास्ततः।<br>अभ्यद्रवन्त सहसा स चोग्रो मातृमण्डलः॥ ४९ | दानव! तुम्हें उससे डरना नहीं चाहिये। मैं तुम्हारा सच्चा रक्षक हूँ। उसके बाद महिष और तारक—ये दोनों तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ बाण—ये सभी अन्धकसे बिना पूछे ही अपने अनुगामियोंके साथ युद्ध करनेके लिये पृथ्वीपर निकल आये। मुने! जिस स्थानपर भयंकर आकारवाले गण गर्जन कर रहे थे, उसी स्थानपर हथियारोंसे सजे-धजे दल-बलके साथ दैत्य भी आ गये। इसके बाद दैत्योंको आक्रमण करते हुए देखकर कार्तिकेयके गण तथा उग्र मातृकाएँ (उनपर) सहसा टूट पड़ीं॥ ४६–४९॥ |
| तेषां पुरस्सरः स्थाणुः प्रगृह्य परिघं बली।<br>निषूदयत् परबलं क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव॥ ५०<br>तं निघ्नन्तं महादेवं निरीक्ष्य कलशोदरः।<br>कुठारं पाणिनादाय हन्ति सर्वान् महासुरान्॥ ५१<br>ज्वालामुखो भयंकरः करेणादाय चासुरम्।<br>सरथं सगजं साश्वं विस्तृते वदनेऽक्षिपत्॥ ५२<br>दण्डकश्चापि संक्रुद्धः प्रासपाणिर्महासुरम्।<br>सवाहनं प्रक्षिपति समुत्पाट्य महार्णवे॥ ५३ | उन सबमें सबसे आगे बलशाली स्थाणु भगवान् लोहेकी बनी गदा लेकर क्रोधसे भरकर पशुओंके तुल्य शत्रुओंके सैन्य-बलका संहार करने लगे। असुरोंको मारते हुए महादेवजीको देखकर कलशोदर (भी) हाथमें कुल्हाड़ा लेकर सभी बड़े असुरोंका विनाश करने लगा। भय उत्पन्न कर देनेवाला ज्वालामुख रथ, हाथी और घोड़ोंके साथ असुरोंको हाथसे पकड़-पकड़कर अपने फैलाये हुए मुखमें झोंकने लगा। हाथमें बर्छी लिये हुए दण्डक भी क्रुद्ध होकर महासुरोंको उनके वाहनोंसहित उठाकर समुद्रमें फेंकने लगा॥ ५०–५३॥ |
| शङ्कुकर्णश्च मुसली हलेनाकृष्य दानवान्।<br>संचूर्णयति मन्त्रीव राजानं प्रासभृद् वशी॥ ५४<br>खड्गचर्मधरो वीरः पुष्पदन्तो गणेश्वरः।<br>द्विधा त्रिधा च बहुधा चक्रे दैतेयदानवान्॥ ५५<br>पिङ्गलो दण्डमुद्यम्य यत्र यत्र प्रधावति।<br>तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते राशयः शावदानवैः॥ ५६<br>सहस्रनयनः शूलं भ्रामयन् वै गणाग्रणीः।<br>निजघानासुरान् वीरः सवाजिसथकुञ्जरान्॥ ५७ | मुसल एवं प्रास लिये हुए जितेन्द्रिय शङ्कुकर्ण दानवोंको हलसे खींच-खींचकर इस प्रकार मटियामेट करने लगा, जैसे मन्त्री (अनाचारी-अविचारी) राजाको नष्ट करता जाता है। तलवार और ढाल धारण करनेवाला गणोंका स्वामी वीर पुष्पदन्त भी दैत्यों एवं दानवोंमें किसीको दो-दो, किसीको तीन-तीन टुकड़ोंमें काट डालता तथा किसी-किसीको तो अनेक खण्डोंमें कर डालता था। पिङ्गल दण्डको उठाकर जहाँ-जहाँ दौड़ता, वहाँ-वहाँ दैत्योंके शवका ढेर दिखलायी पड़ने लगता। गणोंमें श्रेष्ठ वीर सहस्रनयन शूल घुमाते हुए घोड़े, रथ और हाथियोंसहित असुरोंको मार रहा था॥ ५४–५७॥ |
| भीमो भीमशिलावर्षैः स पुरस्सरतोऽसुरान्।<br>निजघान यथैवेन्द्रो वज्रवृष्ट्या नगोत्तमान्॥ ५८ | भीम भयङ्कर शिलाओंकी वर्षासे सामने आ रहे असुरोंको इस भाँति मार रहा था, जिस प्रकार इन्द्र वज्रकी वृष्टिसे उत्तम पर्वतोंको ध्वस्त करते हैं। |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रौद्रः शकटचक्राक्षो गणः पञ्चशिखो बली।<br>भ्रामयन् मुद्गरं वेगान्निजघ्नान् बलाद् रिपून्॥ ५९<br><br>गिरिभेदी तलेनैव सारोहं कुञ्जरं रणे।<br>भस्म चक्रे महावेगो रथं च रथिना सह॥ ६०<br><br>नाडीजङ्घोऽङ्घ्रिपातैश्च मुष्टिभिर्जानुनाऽसुरान्।<br>कीलाभिर्वज्रतुल्याभिर्जघान बलवान् मुने॥ ६१ | भयङ्कर शकटचक्राक्ष और बलवान् पञ्चशिख नामक गण तेजीसे मुद्गर घुमाते हुए बलपूर्वक शत्रुओंका संहार कर रहे थे। प्रबल वेगवान् गिरिभेदी युद्धमें थप्पड़ोंके भीषण आघातसे ही सवारके साथ हाथीको एवं रथीके सहित रथको चूर्ण-विचूर्ण करने लगा। मुने! बलवान् नाडीजङ्घ पैरों, मुक्कों, घुटनों एवं वज्रके समान कोहनियोंके प्रहारसे असुरोंको मारने लगा॥ ५८—६१॥ |
| कूर्मग्रीवो ग्रीवयैव शिरसा चरणेन च।<br>लुण्ठनेन तथा दैत्यान् निजघान सवाहनान्॥ ६२<br><br>पिण्डारकस्तु तुण्डेन शृङ्गाभ्यां च कलिप्रिय।<br>विदारयति संग्रामे दानवान् समरोद्धतान्॥ ६३<br><br>ततस्तत्सैन्यमतुलं वध्यमानं गणेश्वरैः।<br>प्रदुद्रावाथ महिषस्तारकश्च गणाग्रणीः॥ ६४<br><br>ते हन्यमानाः प्रमथा दानवाभ्यां वरायुधैः।<br>परिवार्य समन्तात् ते युयुधुः कुपितास्तदा॥ ६५ | कूर्मग्रीव ग्रीवा, सिर एवं पैरोंके प्रहारोंसे तथा धक्का देकर वाहनोंके साथ दैत्योंको मारने लगा। नारदजी! पिण्डारक अपने मुख तथा दोनों सींगोंसे गर्वीले दानवोंको छिन्न-भिन्न करने लगा। इसके बाद गणेश्वरोंद्वारा उस असीम सेनाके दलोंको मारा जाता देख गणनायक महिष एवं तारक दौड़े। उन दोनों दानवोंद्वारा उत्तम-से-उत्तम आयुधोंसे संहारे जा रहे वे सभी प्रमथगण अधिक क्रुद्ध होकर चारों ओरसे घेरकर युद्ध करने लगे॥ ६२—६५॥ |
| हंसास्यः पट्टिशेनाथ जघान महिषासुरम्।<br>षोडशाक्षस्त्रिशूलेन शतशीर्षो वरासिना॥ ६६<br><br>श्रुतायुधस्तु गदया विशोको मुसलेन तु।<br>बन्धुदत्तस्तु शूलेन मूर्ध्नि दैत्यमताडयत्॥ ६७<br><br>तथान्यैः पार्षदैर्युद्धे शूलशक्त्युष्टिपट्टिशैः।<br>नाकम्पत् ताड्यमानोऽपि मैनाक इव पर्वतः॥ ६८<br><br>तारको भद्रकाल्या च तथोलूखलया रणे।<br>वध्यते चैकचूड़ाया दार्यते परमायुधैः॥ ६९ | हंसास्य पट्टिशसे, षोडशाक्ष त्रिशूलसे और शतशीर्ष श्रेष्ठ तलवारसे महिषासुरको मारने लगा। श्रुतायुधने गदासे, विशोकने मुसलसे तथा बन्धुदत्तने शूलसे उस दैत्यके मस्तकपर मारा। वैसे ही अन्य पार्षदोंद्वारा शूल, शक्ति, ऋष्टि एवं पट्टिशोंसे मार खाते रहनेपर भी वह मैनाकपर्वतके समान तनिक भी विकम्पित नहीं हुआ। रणमें भद्रकाली, उलूखला एवं एकचूड़ाने श्रेष्ठ आयुधोंसे तारकके ऊपर प्रहार किया॥ ६६—६९॥ |
| तौ ताड्यमानौ प्रमथैर्मातृभिश्च महासुरौ।<br>न क्षोभं जग्मतुर्वीरौ क्षोभयन्तौ गणानपि॥ ७०<br><br>महिषो गदया तूर्णं प्रहारैः प्रमथानथ।<br>पराजित्य पराधावत् कुमारं प्रति सायुधः॥ ७१<br><br>तमापतन्तं महिषं सुचक्राक्षो निरीक्ष्य हि।<br>चक्रमुद्यम्य संक्रुद्धो रुरोध दनुनन्दनम्॥ ७२<br><br>गदाचक्राङ्कितकरौ गणासुरमहारथौ।<br>अयुध्येतां तदा ब्रह्मन् लघु चित्रं च सुष्ठु च॥ ७३ | वे दोनों महान् असुर प्रमथों और मातृशक्तियोंसे मारे जाते हुए होनेपर भी (स्वयं) अक्षुब्ध रहकर गणोंको क्षुब्ध कर रहे थे। उसके बाद आयुधसहित महिषासुर गदाकी बार-बार मारसे प्रमथोंको शीघ्र पराजितकर कुमारकी ओर झपटा। उस महिषको झपटते देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हुए सुचक्राक्षने चक्र उठाकर (उस) दनुनन्दनको (बीचमें ही) रोक दिया। ब्रह्मन्! हाथोंमें गदा और चक्र धारण किये हुए असुर और गण दोनों महारथी उस समय आपसमें कभी तेज, कभी अद्भुत, कभी निपुण (इस प्रकार विविध प्रकारकी) लड़ाई करने लगे॥ ७०—७३॥ |
| गदां मुमोच महिषः समाविध्य गणाय तु।<br>सुचक्राक्षो निजं चक्रममुत्ससर्जासुरं प्रति॥ ७४ | महिषने गदा घुमाकर सुचक्राक्षके ऊपर मारा और सुचक्राक्षने अपने चक्रको उस असुरकी ओर चलाया। |
| २६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गदां छित्त्वा सुतीक्ष्णारं चक्रं महिषमाद्रवत् ।<br>तत उच्चुक्रुशुर्दैत्या हा हतो महिषस्त्विति ॥ ७५<br><br>तच्छ्रुत्वाऽभ्यद्रवद् बाणः प्रासमाविध्य वेगवान् ।<br>जघान चक्रं रक्ताक्षः पञ्चमुष्टिशतेन हि ॥ ७६<br><br>पञ्चबाहुशतेनापि सुचक्राक्षं बबन्ध सः।<br>बलवानपि बाणेन निष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥ ७७ | अत्यन्त तीक्ष्ण अरोंसे युक्त वह चक्र गदाको टूक-टूक काट कर महिषके ऊपर चल पड़ा। उसके बाद दैत्यलोग यह कहते हुए जोरसे चिल्ला उठे कि हाय ! महिष मारा गया। उसे सुननेके बाद लाल-लाल आँखोंवाला बाणासुर प्रास लेकर वेगपूर्वक दौड़ा और पाँच सौ मुष्टियोंसे चक्रपर प्रहार किया तथा पाँच सौ बाहुओंसे सुचक्राक्षको बाँध लिया। बलवान् होते हुए भी सुचक्राक्ष बाणासुरके द्वारा प्रयत्नशून्य कर दिया गया॥ ७४-७७॥ |
| सुचक्राक्षं सचक्रं हि बद्धं बाणासुरेण हि ।<br>दृष्ट्वाद्रवद्गदापाणिर्मकराक्षो महाबलः ॥ ७८<br><br>गदया मूर्ध्नि बाणं हि निजघान महाबलः।<br>वेदनार्त्तो मुमोचाथ सुचक्राक्षं महासुरः।<br>स चापि तेन संयुक्तो व्रीडायुक्तो महामनाः ॥ ७९<br><br>स संग्रामं परित्यज्य सालिग्राममुपाययौ ।<br>बाणोऽपि मकराक्षेण ताडितोऽभूत्पराङ्मुखः ॥ ८०<br><br>प्रभज्यत बलं सर्वं दैत्यानां सुरतापस ।<br>ततः स्वबलमीक्ष्यैव प्रभग्नं तारको बली।<br>खड्गोद्यतकरो दैत्यः प्रदुद्राव गणेश्वरान् ॥ ८१ | फिर, बाणासुरके द्वारा सुचक्राक्षको चक्रसहित बँधा हुआ देखकर महाबली मकराक्ष हाथमें गदा लेकर दौड़ा। महाबली मकराक्षने गदासे बाणके मस्तकपर प्रहार किया। उसके बाद कष्टसे दुःखी बाणने सुचक्राक्षको छोड़ दिया और वह मनस्वी उससे छूटकर लज्जित होता हुआ युद्ध छोड़कर सालिग्रामके समीप चला गया। बाण भी मकराक्षसे चोट खाकर युद्धसे मुख मोड़ लिया। नारदजी! दैत्योंकी सारी सेना छिन्न-भिन्न हो गयी। उसके बाद अपनी सेनाको नष्ट हुआ देख बलवान् दैत्य तारक हाथमें तलवार लेकर गणेश्वरोंकी ओर दौड़ा॥ ७८-८१॥ |
| ततस्तु तेनाप्रतिमेन सासिना<br>ते हंसवक्त्रप्रमुखा गणेश्वराः।<br>समातरश्चापि पराजिता रणे<br>स्कन्दं भयार्त्ताः शरणं प्रपेदिरे ॥ ८२<br><br>भग्नान् गणान् वीक्ष्य महेश्वरात्मज-<br>स्तं तारकं सासिनमापतन्तम्।<br>दृष्ट्वैव शक्त्या हृदये बिभेद<br>स भिन्नमर्मा न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ८३<br><br>तस्मिन्हते भ्रातरि भग्नदर्पो<br>भयातुरोऽभून्महिषो महर्षे ।<br>संत्यज्य संग्रामशिरो दुरात्मा<br>जगाम शैलं स हिमाचलाख्यम् ॥ ८४<br><br>बाणेऽपि वीरे निहतेऽथ तारके<br>गते हिमाद्रिं महिषे भयार्त्ते ।<br>भयाद् विवेशोग्रमपां निधानं<br>गणैर्बले वध्यति सापराध ॥ ८५ | उसके बाद खड्ग धारण करनेवाले उस बेजोड़ वीरने उन मातृकाओंसहित हंसवक्त्र आदि गणेश्वरोंको हरा दिया। वे सभी डरकर स्कन्दकी शरणमें गये। महेश्वरके पुत्र कुमारने अपने गणोंको निरुत्साह तथा खड्गधारी तारकासुरको आते हुए देखकर शक्तिके प्रहारसे उसका हृदय विदीर्ण कर डाला। हृदय फट जानेके कारण वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। महर्षे! उस भाईके मर जानेपर महिषासुरका अभिमान चूर हो गया। वह दुष्टात्मा डरसे व्याकुल होकर युद्धभूमिसे भागकर हिमालय पर्वतपर चला गया। वीर तारकके मारे जाने, डरकर महिषके हिमालयपर भाग जाने एवं गणोंद्वारा अपराधी सेनाका संहार किये जानेपर बाण भी डरके कारण अगाध समुद्रमें प्रवेश कर गया॥ ८२-८५॥ |
| हत्वा कुमारो रणमूर्ध्नि तारकं<br>प्रगृह्य शक्तिं महता जवेन।<br>मयूरमारुह्य शिखण्डमण्डितं<br>ययौ निहन्तुं महिषासुरस्य ॥ ८६ | युद्धभूमिमें तारकका संहार कर कुमारने शक्ति उठा ली और वे शिखण्डयुक्त मोरपर चढ़ गये। फिर अत्यन्त शीघ्रतासे महिषासुरको मारने चले। हाथमें श्रेष्ठ शक्ति लिये हुए मयूरध्वज (मोरछापकी पताकावाले) कार्तिकेयको |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध [ २६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स पृष्ठतः प्रेक्ष्य शिखण्डिकेतनं<br>समापतन्तं वरशक्तिपाणिनम्।<br>कैलासमुत्सृज्य हिमाचलं तथा<br>क्रौञ्चं समभ्येत्य गुहां विवेश॥ ८७<br>दैत्यं प्रविष्टं स पिनाकिसूनु-<br>र्जुगोप यत्नाद् भगवान् गुहोऽपि।<br>स्वबन्धुहन्ता भविता कथं त्वहं<br>संचिन्तयन्नेव ततः स्थितोऽभूत् ॥ ८८<br>ततोऽभ्यगात् पुष्करसम्भवस्तु<br>हरो मुरारिस्त्रिदशेश्वरश्च।<br>अभ्येत्य चोचुर्महिषं सशैलं<br>भिन्दस्व शक्त्या कुरु देवकार्यम्॥ ८९ | पीछे आते देख वह महिषासुर कैलास एवं हिमालयको छोड़कर क्रौञ्चपर्वतपर चला गया और उसकी गुफामें प्रवेश कर गया। महादेवके पुत्र भगवान् गुह (कार्तिकेय) पर्वतकी गुफामें प्रविष्ट हुए दैत्यकी (अब) प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे। वे सोचने लगे कि मैं अपने (ममेरे) बन्धुका विनाशकर्ता कैसे होऊँ! वे (कुछ क्षण) स्तब्ध हो गये। उसके बाद ही कमलजन्मा ब्रह्मा, भगवान् शंकर, विष्णु और इन्द्र वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने कहा कि शक्तिके द्वारा पर्वतसहित महिषको विदीर्ण कर दो और देवताओंका कार्य पूरा करो ॥ ८६—८९ ॥ |
| तत् कार्तिकेयः प्रियमेव तथ्यं<br>श्रुत्वा वचः प्राह सुरान् विहस्य।<br>कथं हि मातामहनेप्तृकं वधे<br>स्वभ्रातरं भ्रातृसुतं च मातुः॥ ९०<br>एषा श्रुतिश्चापि पुरातनी किल<br>गायन्ति यां वेदविदो महर्षयः।<br>कृत्वा च यस्या मतमुत्तमायाः<br>स्वर्गं व्रजन्ति त्वतिपापिनोऽपि ॥ ९१<br>गां ब्राह्मणं वृद्धमथाप्तवाक्यं<br>बालं स्वबन्धुं ललनामदुष्टाम्।<br>कृतापराधा अपि नैव वध्या<br>आचार्यमुख्या गुरवस्तथैव ॥ ९२<br>एवं जानन् धर्ममग्र्यं सुरेन्द्रा<br>नाहं हन्यां भ्रातरं मातुलेयम्।<br>यदा दैत्यो निर्गमिष्यद् गुहान्त-<br>स्तदा शक्त्या घातयिष्यामि शत्रुम् ॥ ९३ | इस प्रिय-तथ्य वचनको सुनकर हँसते हुए कार्तिकेय देवताओंसे बोले—मैं नानाके नाती, माताके भतीजे और अपने ममेरे भाईको कैसे मारूँ? (इस विषयमें) यह (इनको न मारनेकी) प्राचीन श्रुति भी है, जिसे वेदज्ञाता महर्षिगण गाया करते हैं। (इसी प्रकार) गौ, ब्राह्मण, वृद्ध, यथार्थवक्ता, बालक, अपना सम्बन्धी, दोषरहित स्त्री तथा आचार्य आदि गुरुजन अपराध करनेपर भी अवध्य होते हैं। इस उत्तम श्रुतिके अनुसार आचरण करनेवाले महान् पापी भी स्वर्गलोकको जाते हैं। सुरश्रेष्ठो! मैं इस श्रेष्ठ धर्मको जानते हुए (ऐसी दशामें—गुफामें छिपी अवस्थामें) अपने भाईको नहीं मार सकूँगा। जब दैत्य गुहाके भीतरसे बाहर निकलेगा तब मैं शक्तिसे उस (देव-) शत्रुका संहार करूँगा (तब हमें धर्मबाधा नहीं होगी) ॥ ९०—९३ ॥ |
| श्रुत्वा कुमारवचनं भगवान्महर्षे<br>कृत्वा मतिं स्वहृदये गुहमाह शक्रः।<br>मत्तो भवान् न मतिमान् वदसे किमर्थं<br>वाक्यं शृणुष्व हरिणा गदितं हि पूर्वम् ॥ ९४<br>नैकस्यार्थे बहून् हन्यादिति शास्त्रेषु निश्चयः।<br>एकं हन्याद् बहुभ्योऽर्थे न पापी तेन जायते॥ ९५<br>एतच्छ्रुत्वा मया पूर्वं समयस्थेन चाग्रिज।<br>निहतो नमुचिः पूर्वं सोदरोऽपि ममानुजः॥ ९६<br>तस्माद् बहूनामर्थाय सक्रौञ्चं महिषासुरम्।<br>घातयस्व पराक्रम्य शक्त्या पावकदत्तया ॥ ९७ | महर्षे! कुमारका वचन सुननेके बाद इन्द्रने अपने हृदयमें विचारकर गुहसे कहा—आप मुझसे अधिक मतिमान् नहीं हैं। आप (ऐसा) क्यों बोल रहे हैं। पहले समयमें भगवान् श्रीहरिकी कही हुई बातको सुनिये। शास्त्रोंमें यह निश्चय किया गया है कि एक व्यक्तिकी रक्षाके लिये बहुतोंका संहार नहीं करना चाहिये। परंतु बहुतोंके कल्याणके लिये एकका वध करनेसे मनुष्य पापी नहीं होता। अग्निपुत्र! इस शास्त्रनिर्णयको सुनकर पहले समयमें मैंने मेल रहनेपर भी अपने सहोदर छोटे भाई नमुचिको मार दिया। अतः बहुतोंके कल्याणके लिये तुम क्रौञ्चसहित महिषासुरका संहार अग्निद्वारा दी हुई शक्तिसे बलपूर्वक कर डालो ॥ ९४—९७ ॥ |
| श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
|---|---|
| २७० |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुरन्दरवचः श्रुत्वा क्रोधादारक्तलोचनः।<br>कुमारः प्राह वचनं कम्पमानः शतक्रतुम्॥ ९८<br>मूढ किं ते बलं बाह्वोः शारीरं चापि वृत्रहन्।<br>येनाधिक्षिपसे मां त्वं ध्रुवं न मतिमानसि॥ ९९<br>तमुवाच सहस्त्राक्षस्त्वत्तोऽहं बलवान् गुह।<br>तं गुहः प्राह एहोहि युद्ध्यस्व बलवान् यदि॥ १००<br>शक्रः प्राहाथ बलवान् ज्ञायते कृत्तिकासुत।<br>प्रदक्षिणं शीघ्रतरं यः कुर्यात् क्रौञ्चमेव हि॥ १०१ | इन्द्रकी बात सुनकर कुमारकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। आवेशमें काँपते हुए कुमारने इन्द्रसे कहा—मूढ़ वृत्रारि ! तुम्हारी बाहुओं और शरीरमें कितनी शक्ति है, जिसके बलपर तुम मेरे ऊपर (मतिमन्द कहकर ) आक्षेप कर रहे हो। तुम निश्चय ही बुद्धिमान् नहीं हो। हजार आँखोंवाले इन्द्रने उनसे कहा—गुह ! मैं तुमसे शक्तिशाली हूँ। गुहने इन्द्रसे कहा—यदि तुम शक्तिशाली हो तो आओ, युद्ध कर देख लो। तब इन्द्रने कहा—कृत्तिकानन्दन ! हम दोनोंमें जो पहले क्रौञ्च-पर्वतकी प्रदक्षिणा कर सकेगा वही शक्तिशाली समझा जायगा॥ ९८—१०१॥ |
| श्रुत्वा तद्वचनं स्कन्दो मयूरं प्रज्झय वेगवान्।<br>प्रदक्षिणं पादचारी कर्तुं तूर्णतरोऽभ्यगात्॥ १०२<br>शक्रोऽवतीर्य नागेन्द्रात् पादेनाथ प्रदक्षिणम्।<br>कृत्वा तस्थौ गुहोऽभ्येत्य मूढं किं संस्थितो भवान्॥ १०३<br>तमिन्द्रः प्राह कौटिल्यं मया पूर्वं प्रदक्षिणः।<br>कृतोऽस्य न त्वया पूर्वं कुमारः शक्रमब्रवीत्॥ १०४<br>मया पूर्वं मया पूर्वं विवदन्तो परस्परम्।<br>प्राप्योचतुर्महेशाय ब्रह्मणे माधवाय च॥ १०५ | उस बातको सुनकर स्कन्द अपने वाहन मयूरको छोड़कर पैदल प्रदक्षिणा करनेके लिये शीघ्रतासे चल पड़े। इन्द्र भी गजराजसे उतरकर पैदल ही प्रदक्षिणाकर वहाँ आ गये। स्कन्दने उनके पास जाकर कहा—मूढ़ ! क्यों बैठे हो? इन्द्रने उन कौटिल्य (कुटिलाके पुत्र स्कन्द)-से कहा—मैंने तुमसे पहले ही इसकी प्रदक्षिणा कर ली है। कुमारने इन्द्रसे कहा—तुमने पहले नहीं की है। 'मैंने पहले की है, मैंने पहले की है।' इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए उन दोनोंने शंकर, ब्रह्मा एवं विष्णुके पास जाकर कहा॥ १०२-१०५॥ |
| अथोवाच हरिः स्कन्दं प्रष्टुमर्हसि पर्वतम्।<br>योऽयं वक्ष्यति पूर्वं स भविष्यति महाबलः॥ १०६<br>तन्माधववचः श्रुत्वा क्रौञ्चमभ्येत्य पावकः।<br>पप्रच्छाद्रिमिदं केन कृतं पूर्वं प्रदक्षिणम्॥ १०७<br>इत्येवमुक्तः क्रौञ्चस्तु प्राह पूर्वं महामतिः।<br>चकार गोत्रभित् पश्चात्त्वया कृतमथो गुह॥ १०८<br>एवं ब्रुवन्तं क्रौञ्चं स क्रोधात्प्रस्फुरिताधरः।<br>बिभेद शक्त्या कौटिल्यो महिषेण समं तदा॥ १०९ | इसके बाद विष्णुने स्कन्दसे कहा कि तुम पर्वतसे पूछ सकते हो। वह जिसे पहले आया हुआ बतलायेगा, वही महाशक्तिशाली मान्य होगा। माधवकी उन बातोंको सुनकर अग्निनन्दने क्रौञ्चपर्वतके पास जाकर उससे यह पूछा कि प्रदक्षिणा पहले किसने की है? इस बातको सुनकर चतुर क्रौञ्चने कहा—कार्तिकेय ! पहले इन्द्रने प्रदक्षिणा की; इसके बाद तुमने की है। इस प्रकार कहनेवाले क्रौञ्चको क्रोधसे ओठ काँपते हुए उस कुटिलानन्दन कुमारने शक्तिकी मारसे महिषासुरके साथ ही विदीर्ण कर दिया॥ १०६-१०९॥ |
| तस्मिन् हतेऽथ तनये बलवान्<br> सुनाभो वेगेन भूमिधरपार्थिवजस्तथागात्।<br>ब्रह्मेन्द्ररुद्रमरुदश्विवसुप्रधाना<br> जग्मुर्दिवं महिषमीक्ष्य हतं गुहेन॥ ११०<br>स्वमातुलं वीक्ष्य बली कुमारः<br> शक्तिं समुत्पाट्य निहन्तुकामः।<br>निवारितश्चक्रधरेण वेगा-<br> दालिङ्ग्य दोर्भ्यां गुरुरित्युदीर्य॥ १११ | उस पुत्रके मार दिये जानेपर पर्वतराजपुत्र बलवान् सुनाभ शीघ्र ही वहाँ आ गये। ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, वायु, अश्विनीकुमार, वसु आदि देवता गुह (कार्तिकेय)-के द्वारा महिषको मारा गया देखकर स्वर्ग चले गये। अपने मामाको देखनेके बाद बलवान् कुमारने शक्ति लेकर (उन्हें) मारना चाहा। परंतु विष्णुने शीघ्रतासे उन्हें बाहुओंसे आलिङ्गित करते हुए 'ये गुरु हैं' ऐसा कहकर |
| अध्याय ५८ ] | सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध | २७१ |
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| संस्कृत मूल | हिन्दी अनुवाद |
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| सुनाभमभ्येत्य हिमाचलस्तु<br>प्रगृह्य हस्तेऽन्यत एव नीतवान्।<br>हरिः कुमारं सशिखण्डिनं नय-<br>द्वेगाद्दिवं पन्नगशत्रुपुत्रः॥ ११२<br>ततो गुहः प्राह हरिं सुरेशं<br>मोहेन नष्टो भगवन् विवेकः।<br>भ्राता मया मातुलजो निरस्त-<br>स्तस्मात् करिष्ये स्वशरीरशोषम्॥ ११३ | रोक दिया। हिमालय सुनाभके निकट आये और उनका हाथ पकड़कर दूसरी ओर ले गये तथा गरुडवाहन विष्णु मयूरसहित कुमारको जल्दीसे स्वर्गमें लिये चले गये। इसके बाद गुहने सुरेश्वर हरिसे कहा—भगवन्! मोहसे मेरी विचार-शक्ति नष्ट हो गयी और मैंने अपने ममेरे भाईका संहार कर दिया है। अतः (प्रायश्चित्तमें) मैं अपने शरीरको सुखा डालूँगा॥ ११०—११३॥ |
| तं प्राह विष्णुर्व्रज तीर्थवर्यं<br>पृथूदकं पापतरोः कुठारम्।<br>स्नात्वौघवत्यां हरमीक्ष्य भक्त्या<br>भविष्यसे सूर्यसमप्रभावः॥ ११४<br>इत्येवमुक्तो हरिणा कुमार-<br>स्त्वभ्येत्य तीर्थं प्रसमीक्ष्य शम्भुम्।<br>स्नात्वार्च्य देवान् स रविप्रकाशो<br>जगाम शैलं सदनं हरस्य॥ ११५ | विष्णुने उनसे कहा—कुमार! तुम पापरूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदकमें जाओ। वहाँ ओघवतीके जलमें स्नानकर भक्तिपूर्वक महादेवका दर्शन करनेसे तुम (निष्पाप होकर) सूर्यके समान कान्तियुक्त हो जाओगे। हरिके इस प्रकार कहनेपर कुमार (पृथूदक) तीर्थमें गये और उन्होंने महादेवका दर्शन किया। स्नान करनेके बाद देवताओंकी पूजा करके वे सूर्यके समान तेजस्वी होकर महादेवके निवासस्थल पर्वतपर चले गये। |
| सुचक्रनेत्रोऽपि महाश्रमे तप-<br>श्चचार शैले पवनाशनस्तु।<br>आराधयानो वृषभध्वजं तदा<br>हरोऽस्य तुष्टो वरदो बभूव॥ ११६<br>देवात् स वव्रे वरमायुधार्थे<br>चक्रं तथा वै रिपुबाहुषण्डम्।<br>छिन्द्याद्यथा त्वप्रतिमं करेण<br>बाणस्य तन्मे भगवान् ददातु॥ ११७ | सुचक्रनेत्र भी केवल वायु पीकर पर्वतके महान् आश्रममें शंकरकी आराधना करता हुआ तपस्या करने लगा। तब प्रसन्न होकर शंकरने उसे वर देनेका वचन दिया। उसने अस्त्र-प्राप्तिके हेतु वर माँगा—हे भगवन्! शत्रुकी भुजाओंको काटनेवाला ऐसा अनुपम चक्र मुझे दें, जिससे मैं हाथसे ही बाणासुरकी भुजाओंको काट सकूँ॥ ११४—११७॥ |
| तमाह शम्भुर्व्रज दत्तमेतद्<br>वरं हि चक्रस्य तवायुधस्य।<br>बाणस्य तद्बाहुबलं प्रवृद्धं<br>संछेत्स्यते नात्र विचारणाऽस्ति॥ ११८<br>वरे प्रदत्ते त्रिपुरान्तकेन<br>गणेश्वरः स्कन्दमुपाजगाम।<br>निपत्य पादौ प्रतिवन्द्य हृष्टो<br>निवेदयामास हरप्रसादम्॥ ११९ | महादेवजीने उससे कहा—जाओ! तुमने चक्रके निमित्त जो वर माँगा, उसे मैंने दे दिया। यह बाणासुरके अत्यन्त बढ़े हुए बाहुबलको निःसन्देह काट डालेगा। त्रिपुरको मारनेवाले महेश्वरके वर देनेपर गणेश्वर (सुचक्रनेत्र) स्कन्दके निकट गया और (उसने) उनके चरणोंमें गिरकर वन्दना की। उसके बाद उनसे प्रसन्नतापूर्वक महादेवकी कृपाका वर्णन किया॥ ११८-११९॥ |
| एवं तवोक्तं महिषासुरस्य<br>वधं त्रिनेत्रात्मजशक्तिभेदात्।<br>क्रौञ्चस्य मृत्युः शरणागतार्थं<br>पापापहं पुण्यविवर्धनं च॥ १२० | इस प्रकार मैंने (पुलस्त्यने) तुमसे शंकरके पुत्रके द्वारा शक्तिसे महिषासुरके संहार किये जानेका वर्णन किया। शरणागतके हेतु क्रौञ्चकी मृत्यु हुई। यह आख्यान पापका विनाश एवं पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है॥ १२०॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५८॥